आज अनिल दा ( अनिल बिश्वास) को गये पाँच बरस पूरे हो गये। आपने हिन्दी फिल्मों के गीत संगीत के लिये जो कुछ किया वह अविस्मरणीय है। आज अनिल दा पुण्य तिथी पर मैं अपने पाठकों को आपका ही गाया हुआ आरजू फिल्म का गीत सुनवाकर आपको श्रद्धान्जलि अर्पित करता हूँ...
लीजिये आज एक बार फिर शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक खूबसूरत गीत.. फिल्म नया ज़माना (1957)। यह गाना राग हंसकंकिनी/कंकिनी पर आधारित है। इस गीत की सबसे बढ़िया बातें है वो है स्व. प्रेम धवन का एकदम बढ़िया गीत और उतना ही बढ़िया कनु घोष का संगीत।
यह गीत फिल्म नया जमाना का है, जिसमें मुख्य भूमिकायें माला सिन्हा और प्रदीप कुमार ने निभाई थी। इस गीत को गाया है लता जी ने। लीजिये आनन्द उठाईये इस मधुर गीत का।
कहाँ जाते हो, टूटा दिल, हमारा देखते जाओ किए जाते हो हमको बेसहारा देखते जाओ कहाँ जाते हो... करूँ तो क्या करूँ अब मैं तुम्हारी इस निशानी को अधूरी रह गई अपनी तमन्ना देखते जाओ कहाँ जाते हो... कली खिलने भी ना पाई बहारें रूठ कर चल दी दिया क़िस्मत ने कैसा हमको धोखा देखते जाओ कहाँ जाते हो... तमन्ना थी की दम निकले हमारा तेरी बाहों में हमारी ख़ाक में मिलती तमन्ना देखते जाओ कहाँ जाते हो..
स्व. अनिल दा संगीत का भी कमाल होता है कुछ गीत तो (बकौल यूनुस भाई) इतने संक्रामक है कि एक बार सुनना शुरु करने के बाद दस बीस बार सुनने पर भी चैन नहीं आता। लीजिये आज प्रस्तुत है लता जी की आवाज में एक ऐसा ही मधुर गीत, मिला कर टूटा जा रहा है। यह गीत सुनने के बाद हम अन्जाने में यह गीत गुनगुनाते रहते हैं, और हमें पता ही नहीं होता।
यह गीत फिल्म फ़रेब 1953 का है , इस फिल्म के मुख्य कलाकार हैं किशोर कुमार और शकुन्तला। गीतकार हैं मजरूह सुल्तानपुरी। फ़रेब फिल्म का; किशोर कुमार और लताजी का गाया हुआ एक गीत आ मुहब्बत की बस्ती बसायेंगे हम....आप पहले सुन चुके हैं, और यह गीत भी आपको बहुत पसन्द आया था।
मिला दिल मिलके टूटा जा रहा है नसीबा बन के फूटा जा रहा है.. नसीबा बन के फूटा जा रहा है दवा-ए-दर्द-ए-दिल मिलनी थी जिससे वही अब हम से रूठा जा रहा है अँधेरा हर तरफ़, तूफ़ान भारी और उनका हाथ छूटा जा रहा है दुहाई अहल-ए-मंज़िल की, दुहाई मुसाफ़िर कोई लुटा जा रहा है
मैने पिछ्ली बार महफ़िल में सहगल साहब का गीत "राजा का बेटा" प्रस्तुत था जिसकी आप सभी ने काफ़ी सराहना की । आपकी टिप्पणियाँ हमारे सर माथे पर । आज भी मैं सहगल साहब का ही एक गीत आपको सुनवा रहा हूँ । गीत १९३९ की फ़िल्म दुश्मन का है, इस फ़िल्म के संगीतकार श्री पंकज मलिक जी हैं ।
आज सुनने वालों से एक छोटी से पहेली भी पूछता हूँ । आपको बताना है कि ये गीत शास्त्रीय संगीत के किस राग पर आधारित है ।
प्रीत में है जीवन झोकों कि जैसे कोल्हू में सरसों प्रीत में है जीवन जोखों
भोर सुहानी चंचल बालक, लरकाई (लडकाई) दिखलाये, हाथ से बैठा गढे खिलौने, पैर से तोडत जाये ।
वो तो है, वो तो है एक मूरख बालक, तू तो नहीं नादान,
आप बनाये आप बिगाडे ये नहीं तेरी शान, ये नहीं तेरी शान
लुट गया दिन रात का आराम क्यूं- ए मुहब्बत तेरा ये अंजाम क्यूं
महफिल में आज सुनिये 1949 में बनी फिल्म लेख का एक मधुर और बहुत कम सुना जाने वाला गीत, लुट गया..। इस फिल्म के गायक है स्व. मुकेश और फिल्म के गीतकार- संगीतकार क्रमश: कमर जलालाबादी और कृष्ण दयाल हैं। फिल्म के मुख्य कलाकार हैं मोतीलाल, सुरैया, सितारादेवी और कुक्कू।
लुट गया दिन रात का आराम क्यूं ऐ मुहब्बत तेरा ये अंजाम क्यूं
हमने मांगी थी मुहब्बत की शराब लाई किस्मत आंसुओं का जाम क्यूं..लुट गया
दिल समझता है के तू है बेवफ़ा आ रहा है लब पे तेरा नाम क्यूं..
लुट गया दिन रात का आराम क्यूं ऐ मुहब्बत तेरा ये अंजाम क्यूं
रफी साहब का गाया हुआ यह गैर फिल्मी गीत आज तक नहीं सुना था। आज सुबह मेल खोलते ही सबसे पहले रफीमूर्ति साहब की मेल मिली और उसमें था रफी साहब का गाया हुआ अनमोल गैर फिल्मी गीत.. इस दिल से तेरी याद भुलाई नहीं जाती- ये प्यार की दौलत है लुटाई नहीं जाती।
अन्तर्जाल पर इस गीत के बारे में बहुत खोजने पर भी कोई जानकारी नहीं मिली, कि किस संगीतकार ने इस गीत की संगीत रचना की है और कौन गीतकार हैं। आप के पास अगर कोई जानकारी हो तो जरूर बतायें।
तब तक आप सुनिये यह मधुर गीत..
और धन्यवाद मूर्ति साहब, एक और अनमोल नग्मा भेजने के लिये।
कुछ महीनों पहले मैने महफिल में आपसे एक प्रश्न पूछा था कि क्या आपने मुबारक बेगम का यह गाना सुना है ? साथ ही मुबारक बेगम का गाना देवता तुम हो मेरा सहारा सुनवाया था। उस समय मेरे पास सिर्फ मुबारक बेगम का गाया हुआ हिस्सा ही था।
हैदराबाद में मेरे एक मित्र हैं रफीमूर्ति साहब! आपका नाम तो है ए. मूर्ति और बैंक ऑफ इण्डिया में ऑफिसर हैं पर रफी साहब के परम भक्त हैं। मूर्ति साहब रफी फाउंडेशन से जुड़े हैं और रफी साहब पर ब्लॉग भी लिखते हैं,। मूर्ति साहब ने मुझे एक मेल फॉरवर्ड की जिसमें देवता तुम हो मेरा सहारा वाला पुरा गीत था।
तो आप सबके लिये प्रस्तुत है मुबारक बेगम के साथ स्व. मोहम्मद रफी साहब का गाया दायरा (1953) फिल्म का यह यह गीत।
मिर्जा गालिब की गज़ल मित्रों को बहुत पसंद आई और साइडबार के सी बॉक्स में एक मित्र प्रहलाद यादव ने आग्रह किया कि आप कुछ शास्त्रीय रचनायें भी हमें सुनायें। खुद मेरी भी कई दिनों से इच्छा हो रही थी कि कोई शास्त्रीय रचना महफिल पर सुनाऊं।
शास्त्रीय रचनायें इतनी सारी है कि उनमें से एक अनमोल को चुनना बड़ा मुश्किल है। परन्तु बड़ी मेहनत के बाद मैने एक गीत आपके लिये पसंद किया है जो लगभग बहुत दुर्लभ सा है। एक जमाने का यह बहुत प्रसिद्ध गीत अब कहीं भी सुनने को नहीं मिलता।
प्रेम धवन के लिखे और फिल्म हमदर्द (1953 ) के इस गीत की सबसे बड़ी खासियत है कि अनिल बिश्वास ने इस गीत को शास्त्रीय संगीत के चार रागों में ढ़ाला है। ये चार राग क्रमश: राग गौड़ सारंग, राग गौड़ मल्हार, जोगिया और बहार है।
यह चारों राग चार अलग -अलग ऋतुओं पर आधारित है, जैसे गर्मी (जेठ महीने) के लिये राग गौड़ सारंग, वर्षा/ बरखा के लिये गौड़ मल्हार, पत्तझड़ के लिये जोगिया और इसी तरह बंसत बहार ऋतु के लिये राग बहार।
लता जी के एक साक्षात्कार में एक बार सुना था कि अनिल दा ने इस गीत के लिये मन्नाडे और लता जी को लगातार १४ दिनों तक रियाज करवाया! परिणाम हम देख सकते हैं। इस जोड़ी ने ने एक अमर कृति की रचना करदी। यह गीत उस जमाने में बहुत ही लोकप्रिय हुआ। अब आपको ज्यादा बोर नहीं करना चाहूंगा बस आप इस बहुत ही सुंदर गीत को सुनिये। मेरा विश्वास है शास्त्रीय संगीत के प्रशंषक इस गीत को सुन कर झूम उठेंगे।
लेख लिखते समय जल्दबाजी में एक दो बातें कहनी रह गई थी और एक बात जो पता नहीं थी वह संजय भाई पटेल ने बताई और मैं यहाँ उन्हीं के शब्दों को पेस्ट कर रहा हूँ -
संजय पटेल: आई ऋतु में लता-मन्ना दा के साथ एक और गायक है...सारंगी जिसे बजाया है पं.रामनारायणजी ने देखिये तो किस कमाल के साथ तार स्वर बन गए हैं।
और दूसरी बात जो मुझसे लिखनी रह गई वह नीचे संजय भाई की टिप्पणी में है।
इस गीत का वीडियो देखिये। शेखर और श्यामा निम्मी गा रहे हैं और गीत में शायद नलिनी जयवंत यशोधरा कात्जु दिख रहे हैं। श्यामा निम्मी ने अपनी खूबसूरत आँखों से कितना सुंदर अभिनय कर गीत में जान डाल दी है।
राग गौड़ सारंग ऋतु आए ऋतु जाए सखी री मन के मीत न आए जेठ महीना जिया घबराए पल पल सूरज आग लगाए दूजे बिरहा अगन लगाए करूँ मैं कौन उपाय ऋतु आए ऋतु जाए सखी री
राग गौड़ मल्हार बरखा ऋतु बैरी हमार जैसे सास ननदिया पी दरसन को जियरा तरसे अँखियन से नित सावन बरसे रोवत है कजरा नैनन का बिंदिया करे पुकार बरखा ऋतु बैरी हमार
राग जोगिया पी बिन सूना जी पतझड़ जैसा जीवन मेरा मन बिन तन ज्यूँ जल बिन नदिया ज्यों मैं सूनी बिना साँवरिया औरों की तो रैन अँधेरी पर है मेरा दिन भी अँधेरा पी बिन सूना जी
बहार आई मधुर ऋतु बसंत बहार री फूल फूल पर भ्रमर गूँजत सखी आए नहीं भँवर हमार री आई मधुर ऋतु बसंत बहार री कब लग नैनन द्वार सजाऊँ दीप जलाऊँ दीप बुझाऊँ कब लग करूँ सिंगार रे आई मधुर ऋतु बसंत बहार री आई मधुर ऋतु बसंत बहार री, बहार री, बहार री
रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गये धोये गये हम ऐसे कि बस पाक हो गये
आपने लता मंगेशकर निर्मित लेकिन फिल्म का गाना सुनियो जी एक अरज म्हारी सुना होगा यह फिल्म सन 1990 में बनी थी और पंडित हृदयनाथ मंगेशकर और लताजी की भाई बहन की जोड़ी ने संगीत के मामले में कमाल किया था।
अभी पिछले दिनों मैने मिर्जा गालिब की एक गज़ल रोने से और इश्क में बेबाक हो गये......सुनी जो सन 1969 में लताजी ने हृदयनाथजी के संगीत निर्देशन में गाई थी। खास बात यह थी कि इस गज़ल का संगीत बिल्कुल सुनियो जी एक अरज...जैसा था, यों या कहना चाहिये कि सुनियो जी का संगीत बिल्कुल रोने से इश्क में ... जैसा है। हृदयनाथजी ने 21 साल बाद अपने ही संगीत को वापस अपनी फिल्म में दूसरे गीत के लिये कितनी खूबसूरती से उपयोग किया!
लीजिये सुनिये मिर्ज़ा असदुल्ला बेग खान مرزا اسد اللہ خان या मिर्ज़ा गालिब की यह सुन्दर गज़ल।