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Saturday 26 January 2008

लताजी का यह गाना शायद आपने नहीं सुना होगा!

महफिल में मैने शुरू से कोशिश की है कि अनाम कलाकारों के बढ़िया गानों को सुनवा सकूं। आज इस कड़ी में लताजी के एक गाये को प्रस्तुत कर रहा हूँ।

यह गाना एक बहुत कम चर्चित फिल्म Filmstrip चार पैसे (1959) का है। इस फिल्म के मुख्य कलाकार किशोर कुमार, रूपमाला और निम्मी थे। फिल्म के निर्देशक एन के ज़िरी और संगीत निर्देशक थे वी डी बर्मन जिनका एस डी दा से कोई रिश्ता नहीं था। वीडी बर्मन के बारे में बहुत खोजने पर और कोई जानकारी नहीं मिली।

इस गीत को लिखा है सरताज ने जिनके बारे में भी कहीं कोई अन्य जानकारी उप्लब्ध नहीं है। अगर किसी श्रोता /पाठक को इन कलाकारों के बारे में कोई जानकारी हो तो हमें जरूर बतायॆं।

फिलहाल आप सुनिये इस मधुर गीत Note को जिसके बोल हैं "माझी मेरी नैया को जी चाहे जहाँ ले चल" यह गीत निम्मी पर फिल्माया गया है।

माझी नेरी नैया को जी चाहे जहाँ ले चल
ले चल... ले चल.. माझी
मेरी नैया को जी चाहे जहाँ ले चल..
ले चल...
चांद तारों के नगर में ले चल अपने साथ
मेरी किस्मत मेरा जीवन अब है तेरे हाथ
ले चल ... ले चल.. माझी
जिंदगी के दो किनारे साहिल या मंझधार
इक तरफ है सारी दुनियाँ एक तरफ प्यार
ले चल.. ले च... माझी
मेरी नैया को जी चाहे जहाँ ले चल माझी



अपनी ब्लॉग पोस्ट में स्माईली कैसे लगायें

Wednesday 23 January 2008

दीकरो मारो लाडकवायो: एक सुंदर गुजराती लोरी

मनहर उधास गुजराती गज़लों के बादशाह माने जाते हैं। उन्होने बहुत बढ़िया गज़लें गाई है। मनहर उधास की गाई हुई एक गज़ल "नयन ने बंध राखी  ने में ज्यारे तमने जोया छे" तो इतनी प्रसिद्ध हुई कि आज गुजरात का बच्चा बच्चा इस गज़ल को सुन कर झूमने लगता है।
उन्हीं की गाई हुई एक लोरी इतनी प्रसिद्ध हुई कि जब भी इसे गाते हैं श्रोता वन्स मोर  वन्स मोर चिल्लाने लगते हैं और उन्हें इसे कई बार तो तीन तीन बार श्रोताओं की फरमाईश को पूरी करनी पड़ती है। आज में आपको उसी लोरी को सुनवा रहा हूँ।
प्रस्तुत लोरी गुजरात के सुप्रसिद्ध कवि/शायर कैलाश पंडित ने लिखी है। मैने लाल अक्षरों में इस लोरी का  अनुवाद करने की कोशिश की है ताकि आपको भी समझ में आ सके।

दीकरो मारो लाडकवायो, देव नो दीधेल छे
मुन्ना मेरा लाडला, देव का दिया हुआ है
वायरा जरा धीरा वाजो, ए नींद मां पोढेल छे
ए हवा तू जरा धीरे से बह वो नींद में सोया हुआ है
रमशुं दड़े काले सवारे, जई नदी ने तीर
कल खेलेंगे हम गेंद से जा के नदी के तीर
काळवी गाय ना दूध नी पछी रांधशुं मीठी खीर
काली गाय के दूध से बनायेंगे हम मीठी खीर
आपवा तने मीठी मीठी आंबली राखेल छे
देने के लिये तुझे मीठी मीठी इमली रखी है
केरीओ काची तोड़शी अने चाखशुं मीठा बोर
तोड़ेंगे हम कच्ची केरी  और चखेंगे मीठे बेर
छायड़ाओं थी झूलशुं घड़ी, थाशे त्यां बपोर
छाया में झूलेंगे हम तब तक हो जायेगी दोपहर
सीमवचाळे वडळा डाळे हींचको बांधेल छे
किनारे के बीच में बरगद की डाली पर झूला बांधा है
फूल नी सुगंध , फूल नो पवन, फूल ना जेवु स्मित
फूल की सुगंध, फूल की हवा फूल के जैसी मुस्कान
लागणी तारी लागती जाणे गाय़ छे फूलों गीत
स्नेह तेरा यों लगे मानो  गा रहे हों फूल गीत
आम तो तारी आजु बाजु कांटा उगेल छे
यों तो तेरी आस पास भी काँटे उगे हैं
हालकडोलक थाय छे पांपण मरक्या करे छे होठ
पलकें तेरी हिल रही है, मुस्करा रहे हैं होंठ
शमणे आवी वात करे छे राजकुमारी कोक
सपने में आकर बातें कर रही है राजकुमारी कोई
रमता रमता हमणा एणे आंखड़ी मीचेल छे
खेलते खेलते इसने अभी तो आंखे मीची है
दीकरो मारो लाडकवायो देव नो दीधेल छे
मुन्ना मेरा लाडला, देव का दिया हुआ है

Monday 21 January 2008

दुनिया ये दुनिया, तूफान मेल -- हिन्दी और बांग्ला में सुनिये

हिन्दी फिल्मों का रेल से नाता बहुत गहरा है, कई फिल्मों में कहानियाँ रेल में बनी है। पाकीजा फिल्म में नायक रेल में नायिका के पाँव  देख कर एक कागज पर लिखता है "आपके पाँव बहुत खूबसूरत है, इन्हें जमीं पर मत उतारियेगा वरना मैले हो जायेंगे"। सोहलवा साल का नायक देवानन्द  अपनी नायिका वहीदा रहमान को  प्रभावित करने के लिये रेल में गाना गाता  है- "है अपना दिल तो आवारा..."

अशोक कुमार का गाया "रेल गाड़ी" जैसे कई गाने तो बहुत ही प्रसिद्ध हुये। परन्तु रेल पर या रेल के लिये फिल्माये गानों में सबसे प्रसिद्ध गानों में एक है  कानन देवी का गाया गाना तूफान मेल..

तो आज आप सुनिये  मशहूर गायिका  कानन देवी का गाया हुआ यह गाना। हिन्दी और बंग्ला दोनो ही भाषाओं  में हिन्दी में। हिन्दी में यह गीत फिल्म जवाब( Jawab 1942) से है, और बंग्ला में फिल्म शेष उत्तर (Shesh Uttara 1942) से। दोनों ही फिल्म में संगीत कमल दास गुप्ता का है।

पहले सुनते हैं हिन्दी में

1942 Kanan Devi··...

 

तूफान मेल
दुनिया ये दुनिया, तूफान मेल
इसके पहिये ज़ोर से चलते
और अपना रस्ता तय करते
स्याने इस से काम निकाले
बच्चे समझे खेल....तूफान मेल 
दुनिया ये  दुनिया

कोई कहीं का टिकट कटाता
एक आता है एक है जाता
सभी मुसाफ़िर बिछड़ जायेंगे
पल भर का है मेल.. तूफान मेल 

जो जितनी पूँजी है रखते
उसी मुताबिक़ सफ़र वो करते
जीवन का है भेद बताती
ज्ञानी को ये रेल....तूफान

बंग्ला

Thursday 10 January 2008

श्याम म्हाने चाकर राखोजी- तीन स्वरों में मीरां का एक भजन

आज मैं आपको मीरा बाई  का एक भजन सुनवा रहा हूँ जो तीन अलग अलग स्वरों में है। एक स्वर है लता जी का दूसरा वाणी जयराम का और तीसरा भारत रत्न और भारत कोकिला  एम एस सुबलक्ष्मी का।

एक ही भजन को इन तीनों ही गायिकाओं ने बहुत ही खूबसूरती से गाया है, अगर आप पुराने गीतों के प्रशंषक हैं तो आप इन तीनों ही गीतों को सुनकर झूम उठेंगे। तूफान और दिया(1956) फिल्म में गाये इस भजन का संगीत दिया है वसंत देसाई ने, वाणी जयराम के गाये  भजन (मीरां- 1979) को संगीत दिया है  भारत रत्न पंडित रविशंकर ने और एम एस सुबलक्ष्मी के गाये भजन ( फिल्म मीरा 1945) को  संगीत दिया है एस वी वेंकटरमण ने। मीरा के इस भजन को तीनों गायिकाओं ने अलग अलग अंतरे गाये हैं, मैने तीनों ही गीतों की  यहाँ लिख दिया है ताकि आप सुनने के साथ  साथ गुनगुना भी सकें।

प्रस्तुत भजन में मीरां बाई भगवान श्री कृष्ण से  अनुरोध कर रही है कि आप मुझे अपना चाकर ( दासी- नौकर) बना लीजिये  ताकि मैं नित्य आपके दर्शन कर सकूं।

तूफान और दिया- लता जी- वसंत देसाई- मीरां बाई

गिरिधारी मने चाकर राखो जी
मने चाकर राखो, चाकर राखो, चाकर राखो जी
म्हाने चाकर राको, चाकर राखो, चाकर राखो.. गिरिधारी चाकर रहसूं बाग लगासूं
नित उठ दर्सन पासूं
वृंदावन की कुंज गलिन में गोविन्द लीला गासूं
ऊंचे ऊंचे महल बनाऊं
किस बिच राखूं बारी
सावंरिया के दरसन पाऊं-२
पहिर कसूंबी सारी
गिरधारी...
मीरां के प्रभु गहिर गंभीरा 
हृदय रहो जी धीरा
आधी रात प्रभु दरसन दीन्हो
प्रेम ना देखे पीड़ा

वाणी जयराम- पंडित रविशंकर- मीरां

श्याम मने चाकर राखो जी
चाकर रहसूं बाग लगासूं
नित उठ दर्सन पासूं

वृंदावन की कुंज गलिन में तेरी लीला गासूं
चाकरी में दरसन पाऊं सुमिरन पाऊं खरची
भाव भगत जा तेरी पाऊं, तीनों बातां करसी
श्याम मने..

मोर मुकुट पीतांबर सोहे,गल बैजंती माला
वृंदावन में धेनु चरावे मोहन मुरली वाला
मीरां के प्रभु गहिर गंभीरा,सदा रहो जी धीरा
आधी रात प्रभु दरसन दीन्ही
प्रेम ना देखे पीड़ा

 

एम एस सुबलक्ष्मी- मीरां

श्याम मने चाकर राखो जी
चाकर रहसूं बाग लगासूं
नित उठ दर्सन पासूं
श्याम मने..
मोर मुकुट पीतांबर सोहे,गल बैजंती माला
वृंदावन में धेनु चरावे मोहन मुरली वाला
चाकर राखो जी

योगी आया योग करन को, तप करने सन्यासी
प्रभुजी  योगी आया.. तप करने  सन्यासी
हरिभजन को साधू आया, वृंदावन के वासी
तेरे वृंदावन के वासी

मने चाकर राखो जी
मने चाकर..
मीरां के प्रभु गहर गंभीरा, सदा रहो जी धीरा
आधी रात प्रभु दरसन देवे, प्रेम ना देखे पीड़ा
मने चाकर राखो जी

 

 

Tuesday 8 January 2008

आ मुहब्बत की बस्ती बसायेंगे हम

किशोर कुमार और लता जी का गाये सबसे मधुर गीतों में से एक!

आज मैं आपको मेरे सबसे पसंदीदा गीतों में से एक सुनवा रहा हूँ। यह गाना है आ मुहब्बत की बस्ती बसायेंगे हम. यह गीत फिल्म फरेब (1953) का है और फिल्म के गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी और संगीतकार मेरे सबसे पसंदीदा संगीतकारों में से एक अनिल बिश्‍वास हैं। फिल्म के निर्देशक है शाहिद लतीफ और इस फिल्म की लेखिका है इस्मत आपा यानि इस्मत चुगताई।

इस गाने में किशोर दा का साथ दिया है लता जी ने।


किशोर कुमार:
आ मुहब्बत की बस्ती बसायेंगे हम
इस ज़मीं से अलग, आसमानों से दूर
मुहब्ब्त की बस्ती

लता जी
मैं हूं धरती तू आकाश है ओ सनम
देख धरती से आकाश है कितनी दूर
तू कहाँ-मैं कहाँ, है यही मुझको गम
देख धरती


किशोर कुमार:
दूर दूनिया से कोई नहीं है जहाँ
मिल रहे हैं वहां पर ज़मीं-आसमां
छुप के दुनिया से फिर क्यूं ना मिल जायें हम
इस ज़मीं से अलग आसमानों से दूर
लताजी:
तेरे दामन तलक हम तो क्या आयेंगे
यूं ही हाथों को फैला के रह जायेंगे
कोई अपना नहीं बेसहारे हैं हम
देख धरती से आकाश है कितनी दूर


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