पिछली पोस्ट में मीराबाई काली घटाओ को देखकर कह रही थी बादल देख डरी!! सम्राट पृथ्वीराह चौहान की नायिका का दुख: भी कुछ ऐसा ही है वह तो बादलों को बरसने से भी मना कर रही है।
बिरहिनी नायिका के नयनों से जल बारिश की तरह बरस रहा है, उसका मन मोर घायल है। आज उसे बारिश की बूंदें भी नहीं सुहा रही,, आईये सम्राट चन्द्र गुप्त फिल्म का राग मल्हार में बना, वसंत देसाई का संगीतबद्ध और लताजी का गाया हुआ यह मधुर गीत सुनते हैं, और हाँ यह गीत रचा है भरत व्यास ने।
ना ना ना बरसो बादल आज बरसे नैन से जल आज मन का मोर घायल ना ना ना...
आज बरखा है दीवानी नयन जल खोये बादलों के ही बहाने बिरहिणी रोये बुंदनियों की छुम छन न न न-२ बाजे रे पायल , बाजे रे पायल ना ना
श्याम बिन श्यामल घटा मन को नहीं भाए पिया बिन बिजली हिया में अगन सुलगाए नीले नयनो के गगन से-२ झरे रे काजल , झरे रे काजल..
लीजिये आज एक बार फिर शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक खूबसूरत गीत.. फिल्म नया ज़माना (1957)। यह गाना राग हंसकंकिनी/कंकिनी पर आधारित है। इस गीत की सबसे बढ़िया बातें है वो है स्व. प्रेम धवन का एकदम बढ़िया गीत और उतना ही बढ़िया कनु घोष का संगीत।
यह गीत फिल्म नया जमाना का है, जिसमें मुख्य भूमिकायें माला सिन्हा और प्रदीप कुमार ने निभाई थी। इस गीत को गाया है लता जी ने। लीजिये आनन्द उठाईये इस मधुर गीत का।
कहाँ जाते हो, टूटा दिल, हमारा देखते जाओ किए जाते हो हमको बेसहारा देखते जाओ कहाँ जाते हो... करूँ तो क्या करूँ अब मैं तुम्हारी इस निशानी को अधूरी रह गई अपनी तमन्ना देखते जाओ कहाँ जाते हो... कली खिलने भी ना पाई बहारें रूठ कर चल दी दिया क़िस्मत ने कैसा हमको धोखा देखते जाओ कहाँ जाते हो... तमन्ना थी की दम निकले हमारा तेरी बाहों में हमारी ख़ाक में मिलती तमन्ना देखते जाओ कहाँ जाते हो..
मिर्जा गालिब की गज़ल मित्रों को बहुत पसंद आई और साइडबार के सी बॉक्स में एक मित्र प्रहलाद यादव ने आग्रह किया कि आप कुछ शास्त्रीय रचनायें भी हमें सुनायें। खुद मेरी भी कई दिनों से इच्छा हो रही थी कि कोई शास्त्रीय रचना महफिल पर सुनाऊं।
शास्त्रीय रचनायें इतनी सारी है कि उनमें से एक अनमोल को चुनना बड़ा मुश्किल है। परन्तु बड़ी मेहनत के बाद मैने एक गीत आपके लिये पसंद किया है जो लगभग बहुत दुर्लभ सा है। एक जमाने का यह बहुत प्रसिद्ध गीत अब कहीं भी सुनने को नहीं मिलता।
प्रेम धवन के लिखे और फिल्म हमदर्द (1953 ) के इस गीत की सबसे बड़ी खासियत है कि अनिल बिश्वास ने इस गीत को शास्त्रीय संगीत के चार रागों में ढ़ाला है। ये चार राग क्रमश: राग गौड़ सारंग, राग गौड़ मल्हार, जोगिया और बहार है।
यह चारों राग चार अलग -अलग ऋतुओं पर आधारित है, जैसे गर्मी (जेठ महीने) के लिये राग गौड़ सारंग, वर्षा/ बरखा के लिये गौड़ मल्हार, पत्तझड़ के लिये जोगिया और इसी तरह बंसत बहार ऋतु के लिये राग बहार।
लता जी के एक साक्षात्कार में एक बार सुना था कि अनिल दा ने इस गीत के लिये मन्नाडे और लता जी को लगातार १४ दिनों तक रियाज करवाया! परिणाम हम देख सकते हैं। इस जोड़ी ने ने एक अमर कृति की रचना करदी। यह गीत उस जमाने में बहुत ही लोकप्रिय हुआ। अब आपको ज्यादा बोर नहीं करना चाहूंगा बस आप इस बहुत ही सुंदर गीत को सुनिये। मेरा विश्वास है शास्त्रीय संगीत के प्रशंषक इस गीत को सुन कर झूम उठेंगे।
लेख लिखते समय जल्दबाजी में एक दो बातें कहनी रह गई थी और एक बात जो पता नहीं थी वह संजय भाई पटेल ने बताई और मैं यहाँ उन्हीं के शब्दों को पेस्ट कर रहा हूँ -
संजय पटेल: आई ऋतु में लता-मन्ना दा के साथ एक और गायक है...सारंगी जिसे बजाया है पं.रामनारायणजी ने देखिये तो किस कमाल के साथ तार स्वर बन गए हैं।
और दूसरी बात जो मुझसे लिखनी रह गई वह नीचे संजय भाई की टिप्पणी में है।
इस गीत का वीडियो देखिये। शेखर और श्यामा निम्मी गा रहे हैं और गीत में शायद नलिनी जयवंत यशोधरा कात्जु दिख रहे हैं। श्यामा निम्मी ने अपनी खूबसूरत आँखों से कितना सुंदर अभिनय कर गीत में जान डाल दी है।
राग गौड़ सारंग ऋतु आए ऋतु जाए सखी री मन के मीत न आए जेठ महीना जिया घबराए पल पल सूरज आग लगाए दूजे बिरहा अगन लगाए करूँ मैं कौन उपाय ऋतु आए ऋतु जाए सखी री
राग गौड़ मल्हार बरखा ऋतु बैरी हमार जैसे सास ननदिया पी दरसन को जियरा तरसे अँखियन से नित सावन बरसे रोवत है कजरा नैनन का बिंदिया करे पुकार बरखा ऋतु बैरी हमार
राग जोगिया पी बिन सूना जी पतझड़ जैसा जीवन मेरा मन बिन तन ज्यूँ जल बिन नदिया ज्यों मैं सूनी बिना साँवरिया औरों की तो रैन अँधेरी पर है मेरा दिन भी अँधेरा पी बिन सूना जी
बहार आई मधुर ऋतु बसंत बहार री फूल फूल पर भ्रमर गूँजत सखी आए नहीं भँवर हमार री आई मधुर ऋतु बसंत बहार री कब लग नैनन द्वार सजाऊँ दीप जलाऊँ दीप बुझाऊँ कब लग करूँ सिंगार रे आई मधुर ऋतु बसंत बहार री आई मधुर ऋतु बसंत बहार री, बहार री, बहार री
रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गये धोये गये हम ऐसे कि बस पाक हो गये
आपने लता मंगेशकर निर्मित लेकिन फिल्म का गाना सुनियो जी एक अरज म्हारी सुना होगा यह फिल्म सन 1990 में बनी थी और पंडित हृदयनाथ मंगेशकर और लताजी की भाई बहन की जोड़ी ने संगीत के मामले में कमाल किया था।
अभी पिछले दिनों मैने मिर्जा गालिब की एक गज़ल रोने से और इश्क में बेबाक हो गये......सुनी जो सन 1969 में लताजी ने हृदयनाथजी के संगीत निर्देशन में गाई थी। खास बात यह थी कि इस गज़ल का संगीत बिल्कुल सुनियो जी एक अरज...जैसा था, यों या कहना चाहिये कि सुनियो जी का संगीत बिल्कुल रोने से इश्क में ... जैसा है। हृदयनाथजी ने 21 साल बाद अपने ही संगीत को वापस अपनी फिल्म में दूसरे गीत के लिये कितनी खूबसूरती से उपयोग किया!
लीजिये सुनिये मिर्ज़ा असदुल्ला बेग खान مرزا اسد اللہ خان या मिर्ज़ा गालिब की यह सुन्दर गज़ल।
शकील बदायूँनी और नौशाद साहब ने १९५२ में बैजू बावरा फ़िल्म को अपने संगीत से अमर बना दिया था । १९५४ में इसी जोडी ने शबाब फ़िल्म में बेह्द मधुर संगीत दिया । मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर, शमशाद बेगम, हेमन्त कुमार और मन्ना डे की आवाजों से नौशाद साहब ने शकील बदायूँनी के शब्दों के इर्द गिर्द एक संगीत का तिलिस्म सा बना दिया था । नौशाद साहब और शकील बदायूँनी की इसी जोडी ने मुगल-ए-आजम में भी संगीत का परचम लहराया था । इस कडी में आप सुनेंगे शबाब फ़िल्म के तीन सच्चे मोती ।
पहला गीत "आये न बालम वादा करके" मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज में है ।
आये न बालम वादा करके, -२ थक गये नैना धीरज धर के, धीरज धर के आये न बालम वादा करके-२
छुप गया चंदा लुट गयी ज्योति, तारे बन गये झूठे मोती, पड गये फ़ीके रंग नजर के, आये न बालम वादा करके-२
आओ के तुम बिन आँखो में दम है, रात है लम्बी जीवन कम है, देख लूँ तुमको मैं जी भरके, आये न बालम वादा करके-२
दूसरा गीत मन्नाडे जी की आवाज में एक भजन है, "भगत के बस में है भगवान"
भगत के बस में है भगवान मांगो मिलेगा सब को दान
भेद अनोखे तोरे दाता, न्यारे तोरे धन्धे कन्हैया, न्यारे तोरे धन्धे मूरख बुद्धिमान बने है, आंखो वाले अंधे दे तू इनको ज्ञान..
भगत के बस में है भगवान मांगो मिलेगा सब को दान
मोहे पुकारे सब सन्सारी, और मैं तोहे पुकारूँ, कन्हैया आज लगी है लाज की बाजी जीता दाँव न हारू भगती का रख मान,
भगत के बस में है भगवान मांगो मिलेगा सब को दान
तू ही मारे तू ही जिलाये गोवर्धन गिरधारी आज दिखा दे संगीत की शक्ति रख ले लाज हमारी निर्जीव को दे जान
जय जय सीताराम, निर्जीव को दे जान जय जय राधेश्याम जय जय सीताराम, जय जय राधेश्याम...
तीसरा गीत लताजी की आवाज में है, "मर गये हम जीते जी, मालिक तेरे संसार में"
मर गये हम जीते जी, मालिक तेरे संसार में, चल दिया हम को खिवईया छोडकर मझधार में, मालिक तेरे संसार में, मर गये हम...
उनका आना उनका जाना खेल था तकदीर का, ख्वाब थे वो जिन्दगी के दिन जो गुजरे प्यार में, मालिक तेरे संसार में, मर गये हम...
ले गये वो साथ अपने साज भी आवाज भी, रह गया नग्मा अधूरा दिल के टूटे तार में, मालिक तेरे संसार में, मर गये हम...
हिन्दी फिल्मों में महफिल (कोठे)में गाये एक से एक खुबसूरत गीतों और गज़लों की लम्बी फेहरिस्त है। मजबूर नायिका जब कोठे पर तवायफ बन कर गज़ल गाती है, तो दर्शकों की आंखे नम हो जाती है। आम बोल चाल की भाषा में इन्हें मुजरा कहा जाता है। वैसे मुजरा एक प्रकार की नृत्य शैली का नाम है। कुछ प्रसिद्ध मुजरा इस प्रकार हैं नजर लागी राजा तोरे बंगले पर, फिल्म जहाँआरा में जब जब तुम्हे भुलाया,तुम और याद आये। फिल्म उमराव जान की दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिये.. फिल्म निराला में महफिल में जल उठी शमा परवाने के लिये और .. भी बह्त सारे इस तरह के मुजरा है जिनकी सूचि बहुत लम्बी है। प्रदीप कुमार और नरगिस की फिल्म अदालत (1958) में कई (गीत) गज़लें हैं जो नायिका नरगिस पर फिल्माई और लता जी की गाई गज़ल- उनको ये शिकायत है कि हम कुछ नहीं कहते और यूं हसरतों के दाग मुहब्बत में धो लिये और जा जा रे साजना काहे सपनों में आये प्रमुख हैं। पिछले दिनों पारुल जी ने मदन मोहन का संगीतबद्ध एक खूबसूरत मुजरा हमें सुनवाया साथ ही मुजरे के बारे में जानकारी भी दी आज मैं आपको एक खूबसूरत मुजरा गज़ल सुनवा रहा हूँ जो फिल्म चुनरिया (1948) में लता जी ने हंसराज बहल के संगीत निर्देशन में गाई है।
एक बार कहीं पढ़ा था कि मोहम्मद रफी साहब ने एक साक्षात्कार में कहा था कि "आप रफी को सुनते हैं और रफी मन्ना डे को सुनता है।" ऐसे महान गायक जिनकी तारीफ करें और जिनके प्रशंषक हों वह कितने महान होंगे?
मन्ना डे को हम एक महान शास्त्रीय गायक के रूप में जानते हैं। पर क्या आप जानते हैं कि मन्ना डे एक कुशल संगीतकार भी हैं? मन्ना डे ने कुछ फिल्मों में संगीत भी दिया है। दो फिल्मों के नाम मेरे ध्यान में है एक तो तमाशा और दूसरी चमकी ( दोनों 1952) परन्तु मन्ना दा एक गायक के रूप में ही ज्यादा पहचाने जाते हैं।
आज महफिल में आपके लिये प्रस्तुत है शास्त्रीय संगीत के इन विद्वान कलाकार मन्ना डे का संगीतबद्ध गीत जो फिल्म तमाशा में गाया है लता मंगेशकर ने और इसे लिखा है भरत व्यास ने। इस फिल्म के मुख्य कलाकार हैं अशोक कुमार, मीना कुमारी और देवानंद।
अब आपको ज्यादा नहीं तड़पायेंगे लीजिये सुनिये और गुनगुनाईये इस सुन्दर गीत को।
क्यों अखियाँ भर आई फिर कोई याद आया क्यों अखियाँ भर आई
भूल सके न हम तुम्हें और तुम तो जाके भूल गये रो रो के कहता है दिल क्यों दिल को लगा के भूल गये भूल सके न हम तुम्हें
बेवफ़ा ये क्या किया दिल के बदले गम दिया मुस्कुरायी थी घड़ी भर रात दिन अब रोऊँ पिया एक पलक चन्दा मेरे यूँ झलक दिखा के भूल गये भूल सके न हम तुम्हें
कौन सी थी बैरन घड़ी वो जबके तुझ से उलझे नयन सुख के मीठे झूले में रुमझुम झूम उठा था पावन सा मन दिन सुनहरे रातें रुपहली तुम मिले मैं हुई मगन आँख खुली तो मैं ने देखा देखा था एक झूठा सपन सपनों के संसार में मेरा मन भरमाके भूल गये भूल सके न हम तुम्हें
महफिल में मैने शुरू से कोशिश की है कि अनाम कलाकारों के बढ़िया गानों को सुनवा सकूं। आज इस कड़ी में लताजी के एक गाये को प्रस्तुत कर रहा हूँ।
यह गाना एक बहुत कम चर्चित फिल्म चार पैसे (1959) का है। इस फिल्म के मुख्य कलाकार किशोर कुमार, रूपमाला और निम्मी थे। फिल्म के निर्देशक एन के ज़िरी और संगीत निर्देशक थे वी डी बर्मन जिनका एस डी दा से कोई रिश्ता नहीं था। वीडी बर्मन के बारे में बहुत खोजने पर और कोई जानकारी नहीं मिली।
इस गीत को लिखा है सरताज ने जिनके बारे में भी कहीं कोई अन्य जानकारी उप्लब्ध नहीं है। अगर किसी श्रोता /पाठक को इन कलाकारों के बारे में कोई जानकारी हो तो हमें जरूर बतायॆं।
फिलहाल आप सुनिये इस मधुर गीत को जिसके बोल हैं "माझी मेरी नैया को जी चाहे जहाँ ले चल" यह गीत निम्मी पर फिल्माया गया है।
माझी नेरी नैया को जी चाहे जहाँ ले चल ले चल... ले चल.. माझी मेरी नैया को जी चाहे जहाँ ले चल.. ले चल... चांद तारों के नगर में ले चल अपने साथ मेरी किस्मत मेरा जीवन अब है तेरे हाथ ले चल ... ले चल.. माझी जिंदगी के दो किनारे साहिल या मंझधार इक तरफ है सारी दुनियाँ एक तरफ प्यार ले चल.. ले च... माझी मेरी नैया को जी चाहे जहाँ ले चल माझी
किशोर कुमार और लता जी का गाये सबसे मधुर गीतों में से एक!
आज मैं आपको मेरे सबसे पसंदीदा गीतों में से एक सुनवा रहा हूँ। यह गाना है आ मुहब्बत की बस्ती बसायेंगे हम. यह गीत फिल्म फरेब (1953) का है और फिल्म के गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी और संगीतकार मेरे सबसे पसंदीदा संगीतकारों में से एक अनिल बिश्वास हैं। फिल्म के निर्देशक है शाहिद लतीफ और इस फिल्म की लेखिका है इस्मत आपा यानि इस्मत चुगताई।
इस गाने में किशोर दा का साथ दिया है लता जी ने।
किशोर कुमार: आ मुहब्बत की बस्ती बसायेंगे हम इस ज़मीं से अलग, आसमानों से दूर मुहब्ब्त की बस्ती लता जी मैं हूं धरती तू आकाश है ओ सनम देख धरती से आकाश है कितनी दूर तू कहाँ-मैं कहाँ, है यही मुझको गम देख धरती
किशोर कुमार: दूर दूनिया से कोई नहीं है जहाँ मिल रहे हैं वहां पर ज़मीं-आसमां छुप के दुनिया से फिर क्यूं ना मिल जायें हम इस ज़मीं से अलग आसमानों से दूर लताजी: तेरे दामन तलक हम तो क्या आयेंगे यूं ही हाथों को फैला के रह जायेंगे कोई अपना नहीं बेसहारे हैं हम देख धरती से आकाश है कितनी दूर
हम जब भी गानों का जिक्र करते हैं तब हमारे ध्यान में अक्सर दो ही बातें होती है, एक तो गायक-गायिका की आवाज और दूसरा संगीत। हम गीतकार यानि गीत के बोलों पर ध्यान उतना ध्यान नहीं देते या अगर दे भी देते हैं तो देते हैं पर चर्चा नहीं करते। जबकि संगीत या गायक-गायिका की आवाज कितनी ही मधुर हो या संगीत कितना ही कर्णप्रिय हो गाना सुनने में आनंद नहीं आता। सौभाग्य से हमारे हिन्दी की पुरानी फिल्मों के गानों में ज्यादातर गीत, संगीत और गायकी तीनों ही पक्ष सुन्दर और प्रभावशाली रहे हैं। आज मैं आपको एक ऐसा ही गाना सुनवा रहा हूँ जिसमें संगीत के तीनों ही पक्षों ने गजब का प्रभाव छोड़ा है, या सभी ने इस गाने पर बहुत मेहनत की है। अगर प्रेम धवन जैसे गुणी गीतकार, लता जी की मधुर गायकी और महान संगीतकार खेम चन्द प्रकाश की त्रिपुटी मिले तो जिस रचना का जन्म होगा तो उसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। खेम चन्द प्रकाश जी के बारे में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने के समान होगा, परन्तु फिर भी इतना तो कहना चाहूंगा कि सुजानगढ़ (राजस्थान) के ये ही संगीतकार थे जिन्होने फिल्म महल में संगीत दिया और जिसके गाने आयेगा आने वाला से लता जी को अपार प्रसिद्धी मिली। एक बात और कि वर्ष 2007 स्व. खेम चन्द प्रकाशजी की जन्मशताब्दी का वर्ष है, पता नहीं रेडियो और टीवी के लोगों को इस बारे में पता भी होगा या नहीं!! ( यूनुस भाई सुन रहे हैं ना??? 1948 में बनी फिल्म जिद्दी जिसमें देवानंद और कामिनी कौशल की मुख्य भूमिकायें थी और गीत संगीत के बारे में तो आपको उपर बता ही चुके हैं। फिल्म के निर्देशक थे शाहिद लतीफ।
प्रस्तुत गाने में बिरहन नायिका अपने प्रीतम की शिकायत कर रही है और चंदा से कह रही है कि मेरा यह संदेश मेरे प्रियतम को जा कर सुनाओ। हिन्दी फिल्मों में इस थीम पर कई गाने बने हैं इसमें कभी मैना , कभी चंदा तो कभी वर्षा के पहले बादलों के माध्यम से नायिका अपना संदेश भेज रही है।
चंदा रे जा रे जारे पिया से संदेशा मोरा कहियो जा चंदा रे.. मोरा तुम बिन जिया ना लागे रे पिया मोहे इक पल चैन ना आये चंदा रे जारे जारे
किस के मन में जाये बसे हो हमरे मन में अगन लगाये हमने तोरी याद में बालम दीप जलाये दीप बुझाये फिर भी तेरा मन ना पिघला हमने कितने नीर बहाये चंदा,...जारे जारे चंदा रे जारे जारे
घड़ियाँ गिन गिन दिन बीतत हैं अंखियों में कट जाये रैना तोरी आस लिये बैठे हैं हंसते नैना रोते नैना-२ हमने तोरी राह में प्रीतम पग पग पे है नैन बिछाये चंदा,...जारे जारे चंदा रे जारे जारे
पिया से संदेशा मोरा कहियो जा मोरा तुम बिन जिया ना लागे रे पिया मोहे एक पल चैन ना आये चंदा रे..