संभव है कि होम पेज खोलने पर इस ब्लॉग में किसी किसी पोस्ट में आपको प्लेयर नहीं दिखे, आप पोस्ट के शीर्षक पर क्लिक करें, अब आपको प्लेयर भी दिखने लगेगा, धन्यवाद।

Sunday 1 November 2009

दिये क्यूं जलाये चला जा रहा है- मन्नादा का एक और मधुर गीत

हमारे प्रिय मन्नादा की प्रसिद्धी में एक और यशकलगी दादा साहब फाल्के पुरस्कार के रूप में जुड़ गई, लेकिन मुझ आलसी को एक पोस्ट मन्नादा को बधाई देते हुई एक पोस्ट लिखने का समय भी नहीं मिल पाया।
मन्नादा के लगभग सभी गाने आपने सुने होंगे, लेकिन फिर भी कुछ ऐसे गाने हैं जो बहुत मधुर और कर्णप्रिय होते हुए भी ज्यादा प्रसिद्ध नहीं हो पाये।
आज ऐसा ही एक गीत मैं यहां पोस्ट कर रहा हूं, मुझे विश्‍वास है आपमें से बहुत कम ही लोगों ने इस गीत को सुना होगा। यह गीत फिल्म एक से बाद एक (ek ke baad ek) का है। इस गीत का संगीत एस.डी.बर्मन (दा) का है। इस फिल्म के मुख्य कलाकार देवानन्द, तरला मेहता और शारदा थे।
इन तरला मेहता ने रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी में सरोजिनी नायडू की और एक चादर मैली सी के अलावा कुछेक फिल्मों में भी अभिनय किया था पर पता नहीं क्यों इनका नाम इतना सुना हुआ नहीं लगता।
हां हम गीत की बात कर रहे थे.. इस फिल्म में दो तीन और भी गीत हैं पर एक प्रेम गीत ये झिझकने- ये ठिठकने ये लुभाने की अदा- तू वही , चह रही है, सर झुकाने की अदा... ठुमक-ठुमक चली है तू किधर जो मोहम्मद रफी का गाया हुआ है बहुत ही कर्णप्रिय है। परन्तु आज मैं जो गीत सुना रहा हूं उसके बोल हैं.. न तेल और न बाती न काबू हवा पर,दिये क्यों जलाये चला जा रहा है।
आईये गीत सुनते हैं।


न तेल और न बाती न काबू हवा पर
दिये क्यों जलाये चला जा रहा है

उजालों को तेरे सियाही ने घेरा
निगल जायेगा रोशनी को अन्धेरा
चिरगों की लौ पर धुआँ छा रहा है
दिये क्यों जलाये चला जा रहा है
न तेल और...

न दे दोष भगवान को भोले भाले
खुशी की तमन्ना में ग़म तूने पाले
तू अपने किये की सज़ा पा रहा है
दिये क्यों जलाये चला जा रहा है
न तेल और...

तेरी भूल पर कल यह दुनिया हँसेगी
निशानी हर इक दाग़ बनकर रहेगी
तू भरने की खातिर मिटा जा रहा है
दिये क्यों जलाये चला जा रहा है
न तेल और...


Download Link


______________________________________________________________________________________

पोस्टर चित्र posteritati से साभार

Sunday 25 October 2009

परदेसी क्यूं याद आता है.. एक दुर्लभ गीत सितारा बाई की आवाज में

मैने कई बार पहले भी जिक्र किया था कि मेरे पास दो ऑडियो कैसेट्स है जिनका नाम है The Vintage Era, इस संग्रह के कुछ गीत मैं आपको पहले सुना चुका हूं। आज बैठे बैठे एक और गीत याद आया " नगरी कब तक यूं ही बरबाद रहेगी... यह 1944 में बनी फिल्म मन की जीत का है लेकिन ओस चाटने से भला कभी प्यास बुझती है? मैं इस फिल्म के सभी गीतों को सुनना चाहता था, दो गीत तो मेरे संग्रह में पहले से थे। पहला तो उपर बता चुका हूं और दूसरा ए चांद उम्मीदों को मेरी! अन्तर्जाल के अथाह समुद्र में खोजते ही एक और गीत मिल गया, और आज वही गीत मैं आज आपको यहां सुना रहा हूँ।
फिल्म मन की जीत (1944) के संगीतकार वहीजुद्दीन ज़ियाउद्दीन अहमद (W.Z.Ahmed) हैं। गुजरात में जन्मे अहमद साहब बँटवारे के बाद पाकिस्तान में जाकर बस गये, और इनकी पत्नी नीना ने फिल्म मन की जीत के कई गीत गाये पर पता नहीं बाद में क्यों नीना के गाये गीतों की जगह दूसरे कलाकारों ने ले ली। खैर बहुत सी कहानियां हैं.. हम गीत पर आते है, यह गीत सितारा बाई कानपुरी ने गाया है। इसके गीतकार हैं जोश मलीहाबादी।

डाउनलोड लिंक


एक और प्लेयर ताकि सनद रहे (बकौल यूनुस भाई)



परदेसी क्यूँ याद आता है
परदेसी क्यूँ याद आता है

इक चाँद छमक कर जंगल में
छुप-छुप कर उंडे बदल में
जब सपना सा दिखलाता है
परदेसी क्यूँ याद आता है
परदेसी....

पूरब से पवन जब आती है
जब कोयल कूक सुनाती है
जब बादल घिर के आता है
परदेसी क्यूँ याद आता है
परदेसी....

हिरदे की घनेरी छाओं का
अरमानों का आशाओं का-२
जब घूंघट पट खुल जाता है
परदेसी क्यूँ याद आता है
परदेसी

जब बीते दिन याद आते हैं
बदल की तरह मंडलाते हैं
जब घायल दिल घबराता है
परदेसी क्यूँ याद आता है
परदेसी....

Monday 28 September 2009

स्मरशील गोकुल सारे: कुमारी फैयाज की आवाज में एक सुन्दर मराठी गीत

कुछ दिनों पहले मैं रेडियोवाणी की पुरानी पोस्ट्स देख रहा था। एक पोस्ट पर नज़र पड़ी जो हिन्दी फिल्मों की सबसे बढ़िया फिल्म दो आँखें बारह हाथ पर आधारित थी। उस पोस्ट में चालीसगांव वाले विकास शुक्लाजी ने एक बड़ी लेकिन बहुत ही जानकारीपूर्ण टिप्पणी दी थी।
उस टिप्प्णी में आपने कई मराठी गीतों का जिक्र किया था। साथ ही एक और गीत का जिक्र किया था जो अण्णा साहेब सी. रामचन्द्रजी की फिल्म घरकुल का था गीत के बोल थे "कोन्यात झोपली सतार, सरला रंग...पसरली पैंजणे सैल टाकुनी अंग ॥ दुमडला गालिचा तक्के झुकले खाली...तबकात राहिले देठ, लवंगा, साली ॥ साथ ही इस गीत की गायिका फैयाज यानि कुमारी फैयाज के बारे में बताते हुए लिखा था कि वे उपशास्त्रीयगायिका हैं और नाट्यकलाकार भी।
मैने इस गीत को नेट पर खोजना शुरु किया, कुछ मराठी मित्रों की मदद ली, पर गीत नहीं मिला। अचानक कुमारी फैयाज का एक गीत दिखा। उसे सुनते ही मैं उछल पड़ा। गीत मराठी में होने की वजह से ज्यादा समझ में नहीं आया लेकिन जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं कि गीत-संगीत किसी भाषा के मोहताज नहीं होते, वे सभी सीमाओं
से परे होते हैं, गीत सुनते ही मेरी आंखें बहने लगी।
कुमारी फैय्याज की इतनी दमदार कैसे हिन्दी संगीत प्रेमियों तक छुपी रही? क्या आप जानते हैं फैय्याज जी ने ऋषिकेश मुखर्जी दा की फिल्म आलाप में दो गीत गाये हैं ( शायद और भी गायें हो- जानकारी नहीं है) एक भूपिन्दर सिंह के साथ है और दूसरा अकेले आई ऋतु सावन की गाया है! संभव हुआ तो इस गीत को भी बहुत जल्द सुनाया जायेगा।
छाया गांगुली की आवाज में जिसने भी कोई गीत सुना है उसे एकबारगी लगेगा कि छाया जी ही गा रही हैं।
लीजिये आप गीत सुनिये।


एक और प्लेयर ताकि सनद रहे (बकौल यूनुस भाई)



Download Link-1
Download Link-2

स्मरशील गोकुळ सारे
स्मरशील यमुना, स्मरशील राधा
स्मरेल का पण कुरूप गवळण
तुज ही बंशीधरा रे ?

रास रंगता नदीकिनारी
उभी राहिले मी अंधारी
न कळत तुजला तव अधरावर
झाले मी मुरली रे !
स्मरशील गोकुळ सारे

ऐन दुपारी जमीन जळता
तू डोहोवर शिणून येता
कालिंदीच्या जळात मिळुनी
धुतले पाय तुझे रे.
स्मरशील गोकुळ सारे

Saturday 5 September 2009

खाली पीली काहे को अक्खा दिन बैठ के बोम मारता है : स्व. किशोरदा का एक शरारती गीत

किशोर कुमार भी क्या कलाकार थे, कुछ भी अगड़म बगड़म गा दें, मजेदार गीत बन जाता था! देखिये इस गीत में कैसे किशोरदा, देवानद को चिढ़ाते हुए कह रहे हैं "खाली पीली काहे को अक्खा दिन बैठ के बोम मारता है"

Tuesday 1 September 2009

प्रिय अमुचा एक महाराष्ट्र देश हा : महाराष्‍ट्र का राज्य गीत

भारत के राष्‍ट्रगान एवं राष्‍ट्र गीत की तरह के भारत के कई राज्यों ने कुछ गीतों को राज्य गीत का सा दर्जा दे रखा है। फिलहाल आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र इन दो राज्यों के राज्य गीत मेरे ध्यान में है और संयोग से मेरे संग्रह में भी है। आज आपको इसकी पहली कड़ी में महाराष्ट्र का गीत सुनवा रहा हूँ यह गीत श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर (shripad krshna kolhatkar) ने लिखा है और संगीतकार शायद पं हृदयनाथ मंगेशकर हैं। इसे गाया है लता जी, ऊषा जी और हृदयनाथ मंगेशकर ने।

आईये सुनते हैं।





Download Link

http://www.divshare.com/download/8338807-3b4


बहु असोत सुंदर संपन्न की महा
प्रिय अमुचा एक महाराष्ट्र देश हा

गगनभेदि गिरिविण अणु नच जिथे उणे
आकांक्षांपुढति जिथे गगन ठेंगणे
अटकेवरि जेथील तुरंगि जल पिणे
तेथ अडे काय जलाशय नदाविणे
पौरुषासि अटक गमे जेथ दु:सहा

प्रासाद कशास जेथ हृदयमंदिरे
( प्रस्तुत गीत में लाल रंगों से लिखी लाईने नहीं है)
सद्भावांचीच भव्य दिव्य आगरे
रत्नां वा मौक्तिकांहि मूल्य मुळी नुरे

रमणईची कूस जिथे नृमणिखनि ठरे
शुद्ध तिचे शीलहि उजळवि गृहा
नग्न खड्ग करि, उघडे बघुनि मावळे
चतुरंग चमूचेही शौर्य मावळे
दौडत चहुकडुनि जवे स्वार जेथले
भासति शतगुणित जरी असति एकले
यन्नामा परिसुनि रिपु शमितबल अहा


विक्रम वैराग्य एक जागि नांदती
जरिपटका भगवा झेंडाहि डोलती
धर्म-राजकारण समवेत चालती
शक्तियुक्ति एकवटुनि कार्य साधिती

पसरे यत्कीर्ति अशी विस्मया वहा
गीत मराठ्यांचे श्रवणी मुखी असो
स्फूर्ति दीप्ति धृतिहि जेथ अंतरी ठसो
वचनि लेखनीहि मराठी गिरा दिसो
सतत महाराष्ट्रधर्म मर्म मनि वसो
देह पडो तत्कारणि ही असे स्पृहा


अगली कड़ी में सुनिये आंध्र प्रदेश का राज्य गीत

Blog Widget by LinkWithin

गीतों की महफिल ©Template Blogger Green by Dicas Blogger.

TOPO