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Wednesday 28 November 2007

प्रिय पापा आपके बिना.......

आज महफिल में एक बेटी का दर्द.....

हमारे साहित्य में माता को बहुत सम्मान दिया गया है, उतना शायद पिता को नहीं मिलता। परन्तु बेटियाँ पिता की ज्यादा प्यारी होती है। शायद सभी महिलाएं इस बात से सहमत होंगी... सांभळो छो लावण्या बेन..?

आज गुजराती साईट्स को खोजते समय अचानक ही एक बहुत ही मधुर गुजराती गीत मिल गया। यह गीत सुरत के प्रसिद्ध साईकियाट्रिस्ट और कवि डॉ मुकुल चोकसी ने लिखा है। मुकुल चोकसी के पिता मनहर लाल चोकसी भी गुजराती के सुप्रसिद्ध कवि थे।

प्रस्तुत गीत में एक बेटी अपने विवाह के बाद सुसराल में अपने पिता को याद करते हुए कह रही है .. प्रिय पप्पा हवे तो तमारा वगर. मनने गमतो नथी गाम, फळीयु के घर... यानि प्रिय पापा आपके बिना मेरे मन को कुछ भी अच्छा नहीं लगता ना गाँव, ना मोहल्ला और ना घर। प्रस्तुत गीत जब मैने पहली बार सुना इतना पसन्द आया कि कई बार सुनते ही रहा और यकीन मानिये अंतिम पंक्तियों को सुनते समय आंख से आंसु निकल आये। मैने फटाफट अपने गुजराती चिट्ठे पर लिखा कि मुझे इस गीत के बारे में जानकारी चाहिये, परन्तु किसी का जवाब नहीं मिला। आखिरकार मैने खुद ही कई घंटों की मेहनत के बाद इसे ढूंढ निकाला। यह गीत मिला एक गुजराती ब्लोग पर और वह भी प्लेयर के साथ। मैं जयश्रीबेन का धन्यवाद करना चाहता हूँ कि उन्होने इस गीत को टहुको नामक सुप्रसिद्ध गुजराती ब्लॉग पर लगाया, और आखिरकार यह हिन्दी के पाठकों और श्रोताऒं के लिये सुलभ हो सका।

मैं गुजराती के साथ उनका सरल हिन्दी अनुवाद लिख रहा हूँ, आशा है आपको यह गीत बहुत पसन्द आयेगा। यह गीत नयना भट्ट ने गाया है और इसके प्रतिभावान संगीतकार हैं सुरत के ही... मेहुल सुरती।





પ્રિય પપ્પા હવે તો તમારા વગર
પ્રિય પપ્પા હવે તો તમારા વગર
(प्रिय पापा आपके बिना)
મનને ગમતું નથી, ગામ ફળિયું કે ઘર
(मन को कुछ अच्छा नहीं लगता गाँव, मोहल्ला और घर)
આ નદી જેમ હું પણ બહુ એકલી
( इस नदी की तरह मैं भी बहुत अकेली हूँ)
શી ખબર કે હું તમને ગમું કેટલી
( क्या पता मैं आपकी कितनी लाड़ की हूँ)
આપ આવો તો પળ બે રહે છે અસર
( आप जब आते हो तो पल दो पल असर रहता है)
જાઓ તો લાગે છો કે ગયા ઉમ્રભર
( जाते हो तो यों लगता है कि उम्रभरके लिये जा रहे हों)
…મનને ગમતું નથી, ગામ ફળિયું કે ઘર …
યાદ તમને હું કરતી રહું જેટલી
( आपको मैं जितनी याद करती हूँ)
સાંજ લંબાતી રહે છે અહીં એટલી
( यहाँ शाम उतनी ही लंबी होती जाती है)
વ્હાલ તમને ય જો હો અમારા ઉપર
( अगर आपको हम पर लाड़ हो)
અમને પણ લઇને ચાલો તમારે નગર
( तो हमें भी ले चलो अपने/आपके नगर)
…મનને ગમતું નથી, ગામ ફળિયું કે ઘર …

यहाँ व्हाल शब्द का अनुवाद लाड़ लिखा है... क्यों कि शायद प्रेम शब्द उतना सही नहीं होता। पिता पुत्री के बीच में जो नेह का नाता होता है उसके लिये यही शब्द ज्यादा सही लगा मुझे।

Tuesday 20 November 2007

मशहूर गायक जिन्हें अंतिम दिनों में भीख तक मांगनी पड़ी

पिछले दिनों मेरे अनुरोध पर यूनुस भाई ने अपने लेख में हमें बताया कि किस तरह मशहूर संगीतकार रामलाल ने मुफलिसी में अपने अंतिम दिन गुजारे। मैने नेट पर इस तरह के अन्य गायकों के बारे में जानकारी पाने की कोशिश की तो नलिन शाह के एक लेख से कई ऐसे गायक संगीतकारों के बारे में पता चला जिन्होने अपने अंतिम दिन भीख मांगते हुए गुजारे।

मशहूर अभिनेता मास्टर निसार जिन्होने फिल्म शीरी फरहाद 1931 से लोगों को अपनी मधुर आवाज से लोगों को दीवाना बनाया, अपने जीवन के अंतिम दिन ब्रेड के एक-एक टुकड़े के लिये भीख मांगते हुए गुजारे। आपने राजकुमारी का नाम तो सुना ही होगा जिन्होने महल फिल्म में घबरा जो हम सर को टकरा दें तो अच्छा हो और बावरे नैन के सुन बैरी सच बोल जैसे सुन्दर गीत गाये थे, और फिल्म जगत में अपनी आवाज से छा गई थी, अंतिम दिनों में बहुत गरीबी में लगभग भिखारी की तरह गुजारे। मास्टर परशुराम ने फिल्म दुनिया ना माने 1937 में भिखारी का रोल निभाया और मन साफ तेरा है या नहीं पूछ ले दिल से गाना गाया, बाद में अपनी असली जिंदगी में भिखारी बने।

रतन बाई जो फिल्म भारत की बेटी फिल्म में तेरे पूजन को भगवान बना मन मंदिर आलीशान जैसा गाना गाकर प्रसिद्ध हुई अपने आखिरी दिनों में हाजी अली की दरगाह के बाहर भीख मांगती पाई गई। मशहूर संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश जी की दूसरी पत्नी भी मशहूर संगीतकार नौशाद को भीख मांगती मिली। कहीं पढ़ा था कि हमराज फिल्म की सुन्दर नायिका विम्मी के अंतिम दिन भी बहुत बुरे गुजरे। भारत भूषण और भगवान दादा जैसे सुपर स्टारों का हाल भी बहुत बुरा हुआ।

मैं इस लेख में खास जिनका जिक्र करना चाह रहा हूँ वे थे मशहूर संगीतकार एच खान मस्ताना (H. Khan Mastana) जिन्होने मोहम्मद रफी साहब के साथ फिल्म शहीद में वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हो जैसे कई शानदार गीत गाये और मुकाबला 1942 जैसी कई फिल्मों में संगीत भी दिया; एक दिन मोहम्मद रफी साहब को हाजी अली की दरगाह के बाहर भीख मांगते मिले। मैं आज आपको उनके गाये दो गाने सुनवा रहा हूँ जिनमें एक तो यही है वतन की राह... इस गीत के संगीतकार गुलाम मोहम्मद हैं।

वतन की राह में

दूसरा गाना फिल्म मुकाबला 1942 का है गीत के बोल हैं हम अपने दर्द का किस्सा सुनायें जाते हैं। गीतकार एम करीम और संगीतकार खुद खान मस्ताना हैं।

Friday 16 November 2007

चार महान गायकों के पहले गाने

 

मित्रों, आज महफिल में प्रस्तुत है हिन्दी फिल्मों के चार महान गायकों के गाये हुए पहले गाने। ये गाने क्रमश: मुकेश, मोहम्मद रफी लता मंगेशकर और किशोरकुमार ने गाये हैं।

मुकेश जी के बारे में कहा जाता है कि उन्होने स्व. कुन्दन लाल सहगल की शैली में अपना पहला गाना गाया तब सहगल साहब ने उन्हें बुला कर समझाया और अपनी खुद की आवाज में गाने की सलाह दी, और बाद में मुकेश ने अपनी शैली में  गाना शुरु किया। यहाँ प्रस्तुत गाना जो पहली नजर फिल्म (1945) का है, इस फिल्म  का संगीत दिया है मेरे पसंदीदा संगीतकार  अनिल बिश्वास ने और फिल्म के गीतकार हैं आह सीतापुरी। फिल्म में मुख्य भूमिका थी मोती लाल की।

इस गाने को पहली बार सुनने पर एक बार तो यही लगता है कि यह स्व. सहगल साहब ने ही गाया होगा।

आंसू ना बहा ना फरियाद ना कर दिल जलता है तो जलने दे....

 

दूसरा गाना स्व. मोहम्म्द रफी ने गाया है, ए आर कारदार की  फिल्म पहले आप (1944) के लिये।  मोहम्मद रफी ने इससे बाद  फिल्म  शाहजहाँ (1946) स्व. कुन्दन लाल सहगल के गाये गाने रूही रूही मेरे सपनों की रानी में  कोरस के रूप में रूही रूही रूही  मेरे सपनों की रानी पंक्तियां गाई थी। फिलहाल आप सुनिये हिन्दुस्तां के हम हैं हिन्दुस्तां हमारा।

हिनदुस्तां के हम है हिन्दुस्तां हमारा

 

तीसरा गाना स्वर कोकिला लता मंगेशकर का गाया हुआ है। लता जी ने यह गाना फिल्म आपकी सेवा में (1946)  उसए पहले  लता जी ने मराठी  फिल्म Pahili Mangalagaur (1942) अभिनय भी किया था। यानि हिन्दी फिल्मों के तीन महान गायकों की पहली फिल्म में पहला शब्द   किसी ना किसी रूप में जुड़ा रहा।

इस गाने का ओडियो उतना स्पष्ट नहीं है, इसलिये हो सकता है कि आपको उतना आनन्द नहीं आये, परन्तु लता मंगेशकरजी का पहला गाना सुनना कौन नहीं चाहेगा?

पाँव लागे कर जोरी रे...

 

इस कड़ी का अन्तिम और मस्तमौला कलाकार किशोर कुमार का गाया हुआ पहला गाना प्रस्तुत है। किशोर कुमार , सहगल साहब के बहुत बड़े प्रशंषक थे और शायद इसी वजह से अपने गायन कैरियर के शुरुआती दौर में उन्के गाये गाने  में स्व. सहगल साहब की शैली सुनाई देती है। ( खासकर इस पहले गाने में)

यह गाना किशोरकुमार ने फिल्म जिद्दी 1948 के लिये गाया था। इस के संगीत निर्देशक थे स्व. खेम चन्द्र प्रकाश और मुख्य भूमिकायें निभाई थी देवानन्द और कामिनी कौशल  ने।

मरने की दुवायें क्यों मांगू, जीने की तमन्ना कौन करे....

तो बताईये आपको कौन कौनसे गाने अच्छॆ लगे?

 

 

चिट्ठाजगत Tag: गाना, हिन्दी फिल्म

 

 

 

 

 

Sunday 28 October 2007

पाकिस्तान के महान गायक सलीम रज़ा का एक मधुर गाना

बहुत दिनों से महफिल सजी नहीं थी तो  आज  मन हुआ कुछ अच्छा सा गाना नेट से ढूंढ कर लगाया जाये और  कई घंटो की मेहनत के बाद एक ऐसा जबरदस्त गाना मिला, जिसे मैने लगातार कम से कम 20 बार सुना। गाने को सुनने पर लगता है कि इस गाने को तलत महमूद ने गाया  है। यह गाना पाकिस्तान के गायक सलीम रज़ा ( Saleem Raza) ने फिल्म सीमा Seema  (1963)के लिये गाया है। मुझे उम्मीद है आपको भी यह बहुत पसन्द आयेगा। 

सलीम रज़ा के कुछ गानों का लिंक मैने नीचे दिया है उन्हें सुनने  और देखने पर आपको यही महसूस होगा कि ये सारे गाने तलत महमूद ने ही गाये हैं।

भूल जाओगे तुम करके वादा सनम
तुम्हे दिल दिया तो ये जाना
भूल जाओगे तुम करके वादा ...
तुम्हे... भूल...

दर्द का है समां गम की तन्हाई है
जिस तरफ देखिये बेकसी छाई है-२
आज  हर साँस पर होके बेताब दिल
धड़कने लगा तो ये जाना
भूल जाओगे तुम

कैसे गुजरेगी शाम कैसे होगी सहर
अब ना वो मंजिले और ना वो हमसफर-२
देखते देखते रह गुजर ए गुजर
अंधेरा हुआ तो ये जाना
भूल जाओगे तुम

चांद को देखकर हो रहा हो है गुमां
फूल के रुख  पे छाई  हो जैसे खजां 
मुस्कुराता हुआ मेरी

उम्मीद का चमन लुट गया तो

ये जाना भूल जाओगे तुम

करके वादा सनम

इस गाने को सुनने के बाद मैने गूगल पर सलीम रज़ा के बारे में जानकारी  ढूंढी तो कुछ नहीं मिला, बहुत देर सर खपाने के बाद मुझे मेरी गलती पता चली मैं रज़ा  की स्पैलिंग Raja  लिख रहा था। बाद में Raza  लिख कर सर्च किया तो बहुत सारा खजाना मिल गया। उस खजाने के कुछ अनमोल नग्में आपके लिये पेश किये हैं। भूल जाओगे तुम ..... के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली पर बहुत सारे वीडियो मिले। उनमें से एक वीडीयो यहाँ प्रस्तुत हैं। यह  गज़ल फिल्म पायल की  झंकार   से है और इसका संगीत दिया है रशीद अत्तरे ने।

 

 

सलीम रज़ा के और बहुत सारे गाने (वीडियो) देखने के लिये आप यहाँ क्लिक करें

सलीम रज़ा के बारे में  ज्यादा जानकारी के लिये यहाँ और यहाँ तथा उनके गाये हुए सारे गानों  के बारे में जानने के लिये यहाँ क्लिक करें।

 इस गज़ल को हरिहरन ने अपने एल्बम सूकून में भी गाई है चलते चलते उसे भी सुन लीजिये यहाँ

     

 

चिट्ठाजगत Tag: गाने. संगीत

Friday 28 September 2007

गायकी में शोहरत की बुलंदियों से किराना की दुकानदारी तक: जी एम दुर्रानी




हिन्दी फिल्मों में जिस तरह किशोर कुमार और मुकेश ने कुन्दन लाल सहगल से प्रेरित हो कर गाना शुरु किया, ठीक उसी तरह मोहम्मद रफी ने गुलाम मुस्तफा दुर्रानी यानि जी एम दुर्रानी से प्रेरित हो कर अपनी गायन शैली बनाई। शायद आपने जी एम दुर्रानी की पहाडी आवाज सुनी भी होगी।
पेशावर में 1919 में जन्मे, दुर्रानी, सोलह साल की उम्र में बम्बई भाग आये, एकाद फिल्मों में काम किया परन्तु उन्हें यह काम रास नहीं आया, और बम्बई रेडियो स्टेशन पर ड्रामा आर्टिस्ट बन गये। सन 1930 में सोहराब मोदी के मिनर्वा मूवीटोन में 35/- रुपये मासिक पर नौकरी भी की, परन्तु उनके नसीब में शायद कुछ और लिखा था। मिनर्वा मूवीटोन बंद हो गया और उसके बाद आप दिल्ली चले गय। वहाँ से एक बार फिर बम्बई तबादला हो गया और यहाँ नौशाद साहब मिले और उन्हें अपनी दर्शन में गाने का मौका दिया। इस फिल्म की नायिका थी ज्योती उर्फ सितारा बेगम! ज्योती से जी एम दुर्रानी का प्रेम हो गया और बाद में विवाह कर लिया।
विवाह के बाद यानि 1943 से 1951 तक शोहरत की बुलंदियों पर रहने के बाद अचानक, दुर्रानी ने एक बार फिर गाने से किनारा कर लिया और अल्लाह की इबादत में लग गये, सारे पैसे फकीरों को दान कर दिये। फिल्मी लोगों से मुँह चुराने लगे। तब तक उन्हीं के नक्शे कदम पर चलने वाले मोहम्मद रफी बहुत मशहूर हो चुके थे। एक दिन ऐसा आया कि एक जमाने के माने हुए गायक जी एम दुर्रानी को अपनी जीविका चलाने के लिए मित्रों से उधार लेकर छोटी सी किराना की दुकान खोलनी पड़ी और इस तरह एक जमाने का माने हुए गायक किराना के दुकानदार बन गये।

एक जमाने के माने हुए गायक जी एम दुर्रानी को अपनी जीविका चलाने के लिए मित्रों से उधार लेकर छोटी सी किराना की दुकान खोलनी पड़ी और इस तरह एक जमाने का माने हुए गायक किराना के दुकानदार बन गये।

फिलहाल आपको जी एम दुर्रानी का एक मशहूर गाना सुना रहा हूँ जो फिल्म मिर्जा साहेबान (Mirza Saheban 1947) का है और जिसके गीतकार अजीज कश्मीरी और संगीत निर्देशक पंडित अमरनाथ थे। इस गाने में जी एम दुर्रानी का साथ दिया है मल्लिका ए तरन्नुम नूरजहाँ ने। फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई थी त्रिलोक कपूर और नूरजहाँ ने। इस गाने को ध्यान से सुनने पर पता चलता है कि एक बार भी नायिका/ गायिका पूरे गाने में एक बार भी यह नहीं कहती कि हाथ सीने पे रख दो... यानि संगीतकार ने धुन बनाते समय भी मर्यादा का कितना ध्यान रखा।



जी: हाथ सीने पे रख दो तो करार आ जाये
दिल के उजड़े हुए गुलशन में बहार आ जाये

नू: दिल तो कहता है कि आँखो में छुपा लूं तुझको
डर यही है मुकद्दर को नकार आ जाये

जी:हाथ सीने पे रख दो तो करार आ जाये
दिल के जख्मों में पे मेरे प्यार का मरहम रख दो
बेकरारी तो मिटे कुछ तो करार आ जाये
हाथ सीने पे रख दो तो करार आ जाये

नू: यूं खुदा के लिये छेड़ो ना मेरे होशो हवास
ऐसी नजरों से ना देखो कि खुमार आ जाये-२

जी:हाथ सीने पे रख दो तो करार आ जाये
छोड़ के तुम भी चली जाओगी किमत की तरह
बाद जाने तो अजल ही को ना प्यार आ जाये
हाथ सीने पे रख दो तो करार आ जाये
दिल के उजड़े हुए गुलशन में बहार आ जाये

फोटो Down Melody lane से साभार



Wednesday 26 September 2007

गाना जो आप बार बार सुनना चाहेंगे

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हम जब भी गानों का जिक्र करते हैं तब हमारे ध्यान में अक्सर दो ही बातें होती है, एक तो गायक-गायिका की आवाज और दूसरा संगीत। हम गीतकार यानि गीत के बोलों पर ध्यान उतना ध्यान नहीं देते या अगर दे भी देते हैं तो देते हैं पर चर्चा नहीं करते। जबकि संगीत या
गायक-गायिका की आवाज कितनी ही मधुर हो या संगीत कितना ही कर्णप्रिय हो गाना सुनने में आनंद नहीं आता। सौभाग्य से हमारे हिन्दी की पुरानी फिल्मों के गानों में ज्यादातर गीत, संगीत और गायकी तीनों ही पक्ष सुन्दर और प्रभावशाली रहे हैं।
आज मैं आपको एक ऐसा ही गाना सुनवा रहा हूँ जिसमें संगीत के तीनों ही पक्षों ने गजब का प्रभाव छोड़ा है, या सभी ने इस गाने पर बहुत मेहनत की है।
अगर प्रेम धवन जैसे गुणी गीतकार, लता जी की मधुर गायकी और महान संगीतकार खेम चन्द प्रकाश की त्रिपुटी मिले तो जिस रचना का जन्म होगा तो उसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। खेम चन्द प्रकाश जी के बारे में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने के समान होगा, परन्तु फिर भी इतना तो कहना चाहूंगा कि सुजानगढ़ (राजस्थान) के ये ही संगीतकार थे जिन्होने फिल्म महल में संगीत दिया और जिसके गाने आयेगा आने वाला से लता जी को अपार प्रसिद्धी मिली। एक बात और कि वर्ष 2007 स्व. खेम चन्द प्रकाशजी की जन्मशताब्दी का वर्ष है, पता नहीं रेडियो और टीवी के लोगों को इस बारे में पता भी होगा या नहीं!! ( यूनुस भाई सुन रहे हैं ना???

1948 में बनी फिल्म जिद्दी जिसमें देवानंद और कामिनी कौशल की मुख्य भूमिकायें थी और गीत संगीत के बारे में तो आपको उपर बता ही चुके हैं। फिल्म के निर्देशक थे शाहिद लतीफ

प्रस्तुत गाने में बिरहन नायिका अपने प्रीतम की शिकायत कर रही है और चंदा से कह रही है कि मेरा यह संदेश मेरे प्रियतम को जा कर सुनाओ। हिन्दी फिल्मों में इस थीम पर कई गाने बने हैं इसमें कभी मैना , कभी चंदा तो कभी वर्षा के पहले बादलों के माध्यम से नायिका अपना संदेश भेज रही है।


Chanda re ja re ja...

चंदा रे जारे जारे
चंदा रे जा रे जारे
पिया से संदेशा मोरा कहियो जा
चंदा रे..
मोरा तुम बिन जिया ना लागे रे पिया
मोहे इक पल चैन ना आये
चंदा रे जारे जारे

किस के मन में जाये बसे हो
हमरे मन में अगन लगाये
हमने तोरी याद में बालम
दीप जलाये दीप बुझाये
फिर भी तेरा मन ना पिघला
हमने कितने नीर बहाये
चंदा,...जारे जारे
चंदा रे जारे जारे


घड़ियाँ गिन गिन दिन बीतत हैं
अंखियों में कट जाये रैना
तोरी आस लिये बैठे हैं
हंसते नैना रोते नैना-२
हमने तोरी राह में प्रीतम
पग पग पे है नैन बिछाये
चंदा,...जारे जारे
चंदा रे जारे जारे

पिया से संदेशा मोरा कहियो जा
मोरा तुम बिन जिया ना लागे रे पिया
मोहे एक पल चैन ना आये
चंदा रे..






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Tuesday 18 September 2007

सपना बन साजन आये: वाह जमाल सेन

मुबारक बेगम के गाये दायरा फिल्म के गाने देवता तुम हो मेरा सहारे सुनने के बाद मुझे लगा कि जमाल सेन भी कमाल के संगीतकार थे पर उनका नाम रेडियो-टीवी पर इतना सुनाई क्यों नहीं देता?

मैने अन्तरजाल पर जमाल सेन के गाने ढूंढ़ने की कोशिश की तो मुझे कुछ गाने मिले, सुनने के बाद मन झूम उठा। उनमें से दो गाने आपको सुनवा रहा हूँ। पहला गाना फिल्म शोखियां SHOKHIYAN (1951) का है ।

फिल्म के मुख्य कलाकार थे, प्रेमनाथ, सुरेय्या , जीवन , कमलेश, नाजिरा शान्ता कंवर, अचला सचदेव आदि फिल्म के निर्देशक थे केदार शर्मा।

यहाँ प्रस्तुत गाने के बोल भी स्वयं केदार शर्माजी ने लिखें है। संगीत है जमाल सेन का, और गाया है लताजी ने। इस गाने की पहली दो पंक्तियाँ प्रीलूड के रूप में हैं जिसके बारे में हमें नीरज रोहिल्ला जी बता चुके हैं।

सोयी कलियाँ हँस पड़ी झुके लाज से नैन,

वीणा की झंकार से तड़पन लागे नैन

सपना बन साजन आये
हम देख देख मुस्काये
ये नैना भर आये, शरमाये-२
सपना बन साजन आये-२

बिछ गये बादल बन कर चादर-२
इन्द्रधनुष पे हमने जाकर-२
झूले खूब झुलाये-२
ये नैना भर आये, शरमाये
सपना बन साजन आये

नील गगन के सुन्दर तारे-२
चुन लिये फूल, समझ अति न्यारे -२
झोली में भर लाये -२
ये नैना भर आये, शरमाये
सपना बन साजन आये

मस्त पवन थी, हम थे अकेले-२
हिलमिल कर बरखा संग खेले-२
फूले नहीं समाये -२
ये नैना भर आये, शरमाये
सपना बन साजन आये

संभव है कि यह गाना आपको इस्निप पर सुनने में ठीक ना लगे तो आप यहाँ भी सुन सकते हैं।

01 - Lata Mangeshk...






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Thursday 13 September 2007

क्या आपने इरा नागरथ के गाने सुने हैं?

मेरी कोशिश रहती है कि महफिल में उन गायक- गायिकाओं के गाने आपको सुनाऊं जिन्हें उतनी शोहरत नहीं मिली जिनके वे हकदार थे। इस श्रेणी में आपको जो गाने सुनवा रहा हूँ उसमें पहले गाने में लता जी का साथ दिया है इरा नागरथ ने। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इरा नागरथ कौन थीं?.... इरा नागरथ; सुप्रसिद्ध संगीतकार रोशन की पत्नी थी। राजेश और राकेश रोशन की माँ तथा ऋत्विक रोशन की दादीजी।

इस गाने के बारे में कई मतभेद है कि यह गाना मीना कपूर ने गाया था, जो कि इस फिल्म के संगीतकार अनिल विश्वास की पत्नी थी। पर ध्यान से गाना सुनने पर आवाज मीना कपूर की नहीं लगती। कई लोगों का कहना है कि इरा नागरथ नहीं इरा मजूमदार ने यह गाना गाया है। शायद यूनुस भाई इस बारे में ज्यादा जानकारी दे सकें।

तब तक हम इन बातों में पड़ने की बजाय इस सुन्दर गाने का आनन्द लेते हैं।

इस गाने को लिखा है शम्स अज़ीमाबादी ने और संगीत ... मेरे प्रिय संगीतकार अनिल विश्वास ने फिल्म का नाम है अनोखा प्यार जिसमें दिलीप कुमार, नलिनी जयवन्त, और नरगिस मुख्य भूमिका में थे और फिल्म के निर्देशक थे एम आई धर्मसे। धर्मसे ने दो और भी फिल्मों का निर्देशन किया था हमारी बात १९४३ और सौदागर १९५१

लता: ऐ दिल मेरी वफ़ा में कोई असर नहीं है

मैं मर रही हूँ जिन पर उनको खबर नहीं है

ऐ दिल मेरी वफ़ा में

मेरे ही दिल में रह कर मुझ पर नज़र नहीं है

ऐ दिल मेरी वफ़ा में ...

इरा: दिल लेके अब कहाँ है दिल के जगाने वाले-२

आँखों से दूर क्यों है दिल में समाने वाले-२

कोई उन्हें बताएं मुझको खबर नहीं है

ऐ दिल मेरी वफ़ा में ...

लता: उठते हैं दिल के शोले,आँखों में है अन्धेरा

मैं हो गई किसी की, कोई हुआ न मेरा-३

जो आग इधर लगी है, वो आग उधर नहीं है

ऐ दिल मेरी वफ़ा में ...

इरा: अब याद में किसी की, मर मर के जी रही हूँ

आँसू जो आ रहें हैं, आँखों में पी रही हूँ

अब याद में किसी की, मर मर के जी रही हूँ

होती है दिल में और आँख कर रही है

ऐ दिल मेरी वफ़ा में ...

Ai Dil Meri Wafa M...
जब बात अनोखा प्यार फिल्म की चली हो तो लगे हाथ इस फिल्म के दो और सुन्दर गाने भी आपको सुनवा देता हूँ। और वह है जीवन सपना टूट गया- यह गाना जिया सरहदी ने लिखा है और इसे लता जी और मुकेश दोनो ने अलग अलग गाया है। दोनों गानों की पहली पंक्ति एक सी है - जीवन सपना टूट गया। बाकी का गाना पूरा अलग है। लीजिये दोनों गानों का आनन्द उठाईये। पहले लताजी का गाया हुआ।
Jeevan Sapna Toot ...
और मुकेशजी का गाया हुआ :
JeevanSapnaTootGay...

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Saturday 1 September 2007

एम कांई दिलीप कुमार बनातु नथी- युसुफ़ साहब की आवाज में एक गाना सुनिये

कुछ वर्षों पहले मैं चित्रलेखा गुजराती समूह की पत्रिका "जी" का विशॆषांक पढ़ रहा था, जी साप्ताहिक गुजराती फिल्म पत्रिका है, और सबसे साफ सुथरी पत्रिका कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसमें दिलीप कुमार पर एक लेख था एम कांई दिलीप कुमार बनातु नथी। इसका अर्थ है कि यों ही दिलीप कुमार नहीं बना जाता ( यानि दिलीप कुमार बनने कि लिये बहुत मेहनत करनी पड़ती है)
लेख में जिक्र था फिल्म कोहिनूर की शूटिंग के समय का जब निर्देशक एस यू. सनी साहब गाना मधुबन में राधिका नाची रे.. का फिल्मांकन कर रहे थे , इस गाने में दिलिप कुमार को सितार बजाते दिखाना था, सनी साहब ने निश्चय किया कि गाने में दिलीप कुमार के चेहरे का क्लोज अप ले लेंगे और सितार बजाते समय संगीतकार ( नाम याद नहीं आ रहा) को वही कपड़े पहन कर बिठा देंगे और उनकी शूटिंग कर लेगे। यह बात दिलिप कुमार को पता चली तो वे जिद पर अड़ गये कि इस गाने की शूटिंग एक महीने बाद कीजिये, पर क्यों यह यह दिलीप कुमार ने नहीं बताया।
सनी साहब ने दिलीप कुमार के अनुरोध को स्वीकार कर लिया।
एक महीने बाद जब उस गाने को शूट करने का समय आया तो दिलिप कुमार सितार ले कर बैठे और खुद उन्होने सितार बजाया; और इतना जबरदस्त बजाया कि गाने की शूटिंग पूरी होने के बाद जब सितार नीचे रखा तब उनकी उंगलियाँ खून से लथपथ थी। यानि दिलिप कुमार ने मात्र एक महीने में सितार बजाना सीख लिया, जिसमें लोगों को बरसों लग जाते हैं।
धन्य है ऐसे महान अभिनेता को।
महफिल में आज मैं आपको फिल्म मुसाफिर का वह सुन्दर गाना सुनाने जा रहा हूँ ,जिसमें लता जी का साथ दिया है खुद दिलीप कुमार ने, इस सुन्दर गाने को सुनने के बाद आपको महसूस होगा कि दिलीप कुमार अगर गायन जारी रखते तो एक अच्छे गायक- अभिनेता बन सकते थे।
खूबसूरत सुचित्रा सेन और दिलीप कुमार के अभिनय वाली यह सुन्दर फिल्म निर्देशित की थी ऋषिकेष मुखर्जी ने, ( ऋषि दा की फिल्म हो तो गुणवत्ता का अंदाजा वैसे भी लग जाता है)
इस फिल्म की कहानी थी राजेन्द्र सिंह बेदी की और संवाद लिखे थे ऋत्विक घटक ने। और फिल्म का संगीत दिया है सलिल(दा) चौधरी ने।

दि. कु:. लागी नाहीं छूटेऽऽऽऽ राम चाहे जिया जाये
लता: आऽऽऽऽऽ चाहे जिया जाये

दिकु: ओ मन अपनी मस्ती का जोगी
कौन इसे समझाये
लता: आऽऽऽ कौन इसे समझाये
दिकु: चाहे जिया जाये
लता: लागी नाहीं छूटे रामा चाहे जिया जाये

दिकु:रिमझिम रिंमझिम दुनियां बरसी -छिड़ी प्यार की बातें
लता: मीठी मीठी आग में सुलगी कितनी ही बरसातें
दोनों: रिमझिम रिमझिम ........

लता: जानबूझ कर दिल दीवाना बैठा रोग लगाये- चाहे जिया जाये
दिकु लागी नाहीं छूटे
लता: चाहे जिया जाये

लता: लागी नाहीं छूटे रामाऽऽऽ चाहे जिया जाये
मन अपनी मस्ती का जोगी- २
कौन इसे समझाये- चाहे जिया जाये

दिकु : तारों में मुस्कान है तेरी तेरी चांद तेरी परछाई
उतने गीते हैं जितनी रातें हमने साथ बिताई
लता: कैसे भूलूं रे सांवरियाऽऽऽ करूं मैं कौन उपाय

दोनों: चाहे जिया जाये

लता: रिमझिम रिंमझिम दुनियां बरसी -छिड़ी प्यार की बातें
मीठी मीठी आग में सुलगी कितनी ही बरसातें
रिमझिम रिमझिम ........
जाबूझ कर दिल दीवाना बैठा रोग लगाये- चाहे जिया जाये
दिकु: लागी नाहीं छूटे
लता: चाहे जिया जाये

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Thursday 30 August 2007

कुछ और ज़माना कहता है, कुछ और है जिद मेरे दिल की

कुछ वर्षों पहले रविवार की सुबह सुबह दूरदर्शन पर रंगोली देखने का मजा ही कुछ और था। धीरे धीरे केबल टी वी आया और दिन रात फिल्म फिल्म होने लगा तब से टी वी से उब हो गई। ऐसे मैं लगबग दस बारह साल पहले एक दिन मैं रंगोली देख रहा था एक गाना शुरु हुआ और थोड़ी ही देर में करंट चला गया। गाने का कुछ ही अंश मैं सुन पाया पर उस अंश ने इतना बैचेन कर दिया कि मैं पता लगाने लगा कि आखिर वह गाना था कौनसा? क्यों कि वह आवाज लता , आशा, गीता दत्त, शमशाद बेगम, मुबारक बेगम आदि किसी भी जानी मानी गायिका की नहीं थी।
अब ऐसे तो कैसे पता चलता फिर याद आया कि उस गाने में नादिराजी नाव में बैठी गा रही थी। बस इतना सा क्लू था और गाने की वह लाईन "या बात सुनुँ अपने दिल की" बस इन दो क्लू पर बहुत मेहनत करने पर मुझे वह गाना मिला और वह था मीना कपूर की आवाज में गाया हुआ गाना : कुछ और जमाना कहता है, कुछ और है जिद मेरे दिल की" मैने उस गाने को ओडियो कैसेट में रिकार्ड करवाया और उसे एक ही दिन में इतनी बार सुना कि बार रिवाईन्ड करने की वजह से कैसेट खराब हो गई ।
कुछ दिनों पहले नैट पर से उस गाने को फिर से मैने ढूंढ़ निकाला जिसे मैं आज आप सबके लिये पेश कर रहा हूँ।
मीना कपूर अनिल विश्वास की पत्नी थी। और उन्होने राजकपूर की गोपीनाथ में सारे गाने गाये थे। उनकी आवाज उस जमाने की स्थापित गायिकाऒं से कहीं उन्नीस नहीं थी पर जैसा होता आया है उगते सूरज को सलाम सब करते है। मीनाजी ने ज्यादा गाने नहीं गाये। जितने गाये वे सब अपने आप में लाजवाब हैं।
प्रस्तुत गाना फिल्म छोटी छोटी बातें 1965 का है फिल्म के निर्देशक और मुख्य अभिनेता स्वयं मोती लाल थे और फिल्म की नायिका थी नादिरा।

खैर बातें बहुत कर ली अब गाना सुन लेते हैं। पिछले कुछ गाने कुछ ज्यादा ही पुराने हो गये थे पर मुझे विश्वास है कि आपको यह गाना जरूर पसन्द आयेगा क्यों कि यह बहुत ज्यादा पुराना नहीं है। और मीना कपुर की आवाज के तो क्या कहने ???

MeenaKapoor-KuchhA...



कुछ और ज़माना कहता है,
कुछ और है जिद मेरे दिल की
मैं बात ज़माने की मानूँ,
या बात सुनूँ अपने दिल की
कुछ और ज़माना कहता है

दुनिया ने हमें बेरहमी से
ठुकरा जो दिया, अच्छा ही किया
नादान हम समझे बैठे थे
निभती है यहाँ दिल से दिल की
कुछ और ज़माना कहता है

इन्साफ़, मुहब्बत, सच्चाई
वो रहमो करम के दिखलावे
कुछ कहते ज़ुबाँ शरमाती है
पूछो न जलन मेरे दिल की
कुछ और ज़माना कहता है

गो बस्ती है इन्सानों की
इन्सान मगर ढूँढे न मिला
पत्थर के बुतों से क्या कीजे
फ़रियाद भला टूटे दिल की
कुछ और ज़माना कहता है


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Tuesday 28 August 2007

ये किसके इशारे जहाँ चल रहा है?

हेमंत कुमार संगीतकार के रूप में जितनी मधुर धुनें दी ही थी बतौर गायक उतने ही मधुर गाने गायेयहाँ प्रस्तुत गाना फिल्म पहली झलक (१९५४) का है फिल्म का संगीत दिया है सी रामचन्द्र ने और गीतकार है, राजेन्द्र कृष्णइस सुन्दर गाने में वाद्य यंत्रों का उपयोग बहुत कम हुआ है पर संगीतकार सी रामचन्द्र ने बांसुरी और तबले का उपयोग बहुत ही खूबसूरती से किया हैगाने के बोल नीचे दिये है

ज़मीं चल रही आसमां चल रहा है
ये किसके इशारे जहाँ चल रहा है
ज़मीं चल रही है...

चली जा रही है जमाने की नय्या
नजर से ना देखा किसी ने खेवैया
ना जाने ये चक्कर कहाँ चल रहा है
ये किसके इशारे ...

ये हंसना ये रोना ये आशा निराशा
समझ में ना आये ये क्या है तमाशा
ये क्यों रात दिन कारवां चल रहा है
ये किसके इशारे ...

अजब ये महफ़िल अजब दास्तां है
ना मंजिल है कोई ना कोई निशां है
तो फिर किसके लिये कारवां चल रहा है
ये किसके इशारे....

भटकते तो देखे हजारों सयाने
मगर राज कुदरत का कोई ना जाने
ये सब सिलसिला बेनिशां चल रहा है
ये किसके इशारे जहाँ चल रहा है

Zameen Chal Rahi.m...


यह गाना पहले यहाँ प्रकाशित
किया था पर पोडकास्ट की फीड में कुछ तकलीफ थी अत: किसी एग्रीग्रेटर पर यह जुड़ नहीं पाया, फिर ब्लॉगस्पॉट पर नई महफिल सजानी पड़ी ।



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