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Wednesday, 28 May, 2008

मिला दिल, मिल के टूटा जा रहा है

स्व. अनिल दा संगीत का भी कमाल होता है कुछ गीत तो (बकौल यूनुस भाई) इतने संक्रामक है कि एक बार सुनना शुरु करने के बाद दस बीस बार सुनने पर भी चैन नहीं आता। लीजिये आज प्रस्तुत है लता जी की आवाज में एक ऐसा ही मधुर गीत, मिला कर टूटा जा रहा है। यह गीत सुनने के बाद हम अन्जाने में यह गीत गुनगुनाते रहते हैं, और हमें पता ही नहीं होता।
यह गीत फिल्म फ़रेब 1953 का है , इस फिल्म के मुख्य कलाकार हैं किशोर कुमार और शकुन्तला। गीतकार हैं मजरूह सुल्तानपुरी। फ़रेब फिल्म का; किशोर कुमार और लताजी का गाया हुआ एक गीत आ मुहब्बत की बस्ती बसायेंगे हम....आप पहले सुन चुके हैं, और यह गीत भी आपको बहुत पसन्द आया था।
मिला दिल मिलके टूटा जा रहा है
नसीबा बन के फूटा जा रहा है..
नसीबा बन के फूटा जा रहा है
दवा-ए-दर्द-ए-दिल मिलनी थी जिससे
वही अब हम से रूठा जा रहा है
अँधेरा हर तरफ़, तूफ़ान भारी
और उनका हाथ छूटा जा रहा है
दुहाई अहल-ए-मंज़िल की, दुहाई
मुसाफ़िर कोई लुटा जा रहा है

6 टिप्पणियाँ/Coments:

मीत said... Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

अरे कमाल सागर भाई. अभी दफ्तर में हूँ सुन नहीं सकता घर पहुँचते ही सबसे पहले सुनूंगा इस गीत को.... ये कहाँ से ढूँढ निकाला आप ने ? "फरेब" के गाने सारे गाने जुगाड़ करने हैं .... "आ मुहब्बत की बस्ती" तो आप ने सुनवा दिया, अब आज ये .... एक और गीत है "मेरे सुख दुःख का संसार तेरे दो नयनन में .." वो कहाँ मिलेगा सर जी ?

और हाँ, अनिल दा के दो गीत पोस्ट किए थे मैं ने भी यहाँ http://kisseykahen.blogspot.com/2008/05/blog-post_25.html

..... वक़्त मिले तो सुनियेगा ...

Udan Tashtari said... Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

सुन लिया जी, पसंद आ गौआ. आभार.

Udan Tashtari said... Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

सुन लिया जी, पसंद आ गौआ. आभार.

DR.ANURAG ARYA said... Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

बहुत बढ़िया .......

Lavanyam - Antarman said... Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

सुरीला गीत सुनवाने के लिये आपका आभार !

sanjay patel said... Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

सागर भाई आपने इस गीत से वह दौर ज़िंदा कर दिया जब जीवन और संगीत में फ़िज़ूल के चोचले नहीं थे. अनिल दा शायद मजरूह साहब के क़लम की रूह को बेहतर इसलिये पकड़ पाए क्योंकि वे ख़ुद (अनिल दा)ग़ज़ल के अचछे जानकार थे. गज़ले’र रोंग (ग़ज़ल के रंग)शीर्षक से उनका बांग्ला ग्रंथ अत्यंत आदरणीय है.और लताजी ...वे तो क़ुदरत का वह नायाब करिश्मा हैं जिसकी दमक से हम सब के दामन मालामाल हैं.जब मैने ये गीत अपने पिचहत्तर बरस के पिताश्री को सुनाया तो वे बोले संजय मध्यमवर्ग और संघर्ष के उस दौर में ये गीत सुनने हम शहर इन्दौर की पान की दुकानों और होटलों के चक्कर लगाया करते थे.
सुबह कॉलेज जाते और दिन में नौकरी करते ..और जब ये गीत कान पर पड़ जाते तो लगता ज़िन्दगी के संघर्ष का एक और दिन शांति और आनंद से गुज़र गया. आज के टॉप-टेन वाले लंपटों के नसीब में कहाँ मौसिक़ी के ये ख़ुशबूदार स्वर-फ़ूल ?

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