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Thursday 29 January 2009

यही बहार है, दुनिया को भूल जाने की, खुशी मनाने की- लताजी का एक और मधुर गीत

लताजी की आवाज की एक खास बात पर आपने ध्यान दिया होगा, जब वे कोई वियोग, दुखी: या दर्द भरा गीत गाती है तो उनके स्वर में बहुत दर्द सुनाई देता है मानो लता जी उस गीत के भावों को अपने मन में चित्रित कर गाती है। ठीक इसी तरह लता जी के गाये शोख, मस्ती भरे गीतों में उनके स्वरों में यही भाव साफ सुनाई देता है।
आज जो गीत मैं सुनवाने जा रहा हूँ, आप ध्यान से सुनेंगे तो पायेंगे मानों लता जी एक अल्हड़ युवती की तरह नाचती- इठलाती- मचलती हुई गा रही हों।
मैने पहले भी कहा था कि पता नहीं कैसे इतने मधुर गीत रेडियो- टीवी पर सुनाई नहीं देते! आईये आज इसी श्रेणी में बड़े दिनों के बाद लताजी का एक और मधुर और दुर्लभ गीत सुना रहा हूँ। पता नहीं लता जी के गाये इस तरह के और कितने गीत होंगे जो हमारे लिये अनसुने ही हैं।
यह गीत लताजी ने फिल्म रागरंग Raagrang (1952)के लिये गाया था। गीत को संगीत दिया है रोशन ने और गीतकार हैं कैफ़ इरफ़ानी।




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ला ला ला लाऽ
यही बहार है, यही बहार हैऽ
यही बहार है दुनिया को भूल जाने की
खुशी मनाने की
यही घडी है जवानी के गुनगुनाने की
हाँ, मुस्कुराने की

ये प्यारे प्यारे नज़ारे ये ठंडी ठंडी हवा
ये हल्का हल्का नशा
ये काली काली घटाओं की मस्त मस्त अदा
ये कोयलों की सदा
मचल के आ गयी, रुत मस्तियाँ लुटाने की
झूम जाने की।
यही बहार हैऽऽ

कली कली से ये भंवरे ने मुस्कुरा के कहा
नज़र मिला के कहा
नज़र से काम न निकला तो गुदगुदा के कहा
गले लगा के कहा
किया है प्यार तो, किया है प्यार तोऽ
किया है प्यार तो परवा न कर ज़माने की
हँसी उडाने की
यही बहार है...

ओ ओ ओऽऽऽऽ
जो टूटता है रुबांऽऽऽऽ
जो टूटता है रुबां, उसको टूट जाने दे
मेरे शबाब को जी भर के गीत गाने दे
हाँ, गीत गाने दे-२
तड़प उठी हैं, तड़प उठी हैंऽ
तड़प उठी हैं तमन्नाएं झूम जाने की
हाँ, लगी बुझाने की

Monday 26 January 2009

मिट्टी की सौंधी खुशबू वाले मेरे पसन्दीदा गीत… (भाग-2)

Teesri Kasam, Raj Kapoor, Shailendra, Waheeda Rahman

सबसे पहले क्षमा चाहूँगा कि दो महीने के अम्बे अन्तराल के बाद दूसरा गीत पेश कर रहा हूँ, असल में व्यस्तता कुछ ऐसी रही कि गीतों पर लिख नहीं पाया… मिट्टी की सौंधी खुशबू वाले मेरे पसन्दीदा गीतों की श्रृंखला में यह गीत पाठकों की सेवा में पेश करना चाहता हूँ… यह गीत है 1966 में आई फ़िल्म “तीसरी कसम” का, जिसके निर्माता थे प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र। इस गीत को लिखा भी उन्होंने ही है और संगीत दिया है उनकी अटूट टीम का हिस्सा शंकर-जयकिशन ने। फ़िल्म में इसे फ़िल्माया गया है राजकपूर, वहीदा रहमान और एक्स्ट्रा कलाकारों पर, जबकि आवाज़ है मन्ना डे और साथियों की।

मजे की बात यह है कि इस गीत में बोलों के नाम पर सिर्फ़ छः से आठ पंक्तियाँ हैं, लेकिन गीत को खास बनाती है इसकी धुन और इसका संगीत। यह गीत व्यक्ति को भीतर तक मस्त कर देता है, इस गीत के इंटरल्यूड्स सुनकर उसकी तबियत फ़ड़कने लगती है। दिन भर की थकान उतारने के लिये, दुनियादारी के झंझटों से मुक्त होकर, गाँव की चौपाल पर रात के वक्त, मुक्त कण्ठ से जो गीत गाये जाते हैं उनमें से यह एक है। जी करता है कि बस चार-छः “सहज-सीधे” दोस्तों की महफ़िल सजी हुई हो, कहीं से एक ढोलकी मिल जाये और यह गीत कम से कम 20 बार गाया जाये तब जाकर कहीं आत्मा तृप्त हो… ऐसा अदभुत गीत है यह। गीत का फ़िल्मांकन भी कुछ इसी तरह की “सिचुएशन” में है कि नाचने-गाने वाली “नचनिया” यानी कि वहीदा रहमान, राजकपूर की बैलगाड़ी में सवार होकर कहीं जा रहे हैं और बीच में एक गाँव में रात्रि विश्राम के लिये गाड़ी रुकती है… तब तक फ़िल्म में भोलेभाले गाड़ीवान राजकपूर और नाचने वाली वहीदा रहमान के बीच खुले तौर पर प्रेमांकुर तो नहीं फ़ूटा है, लेकिन दोनों के मन में “कुछ-कुछ होता है” वाली भावनायें हैं, ऐसे में गीत के बोलों में “पिंजरे वाली मुनिया…” एक तरह से वहीदा रहमान की स्थिति को प्रदर्शित करते हैं कि वह नाचने वाली है लेकिन एक अदृश्य “पिंजरे” में कैद है और भोलाभाला ग्रामीण गाड़ीवाला (जिसे “चलत मुसाफ़िर” की संज्ञा दी गई है) उसे पा नहीं सकेगा… इस गीत के बोल भी उत्तरप्रदेश-बिहार के ग्रामीण बोलचाल से प्रेरित हैं, जिसे हम अवधी, भोजपुरी कुछ भी नाम दे सकते हैं… पहले यह गीत सुनिये…

मुखड़ा है- चलत मुसाफ़िर मोह लिया रे पिंजड़े वाली मुनिया…





अब इस गीत का वीडियो देखिये… जिसमें आभिजात्य वर्ग के गोरे-चिट्टे राजकपूर आपको ग्रामीण वेशभूषा में दिखाई देते हैं। राजकपूर या शैलेन्द्र चाहते तो इस गीत में मुख्य कलाकार राजकपूर ही होते, लेकिन चूंकि फ़िल्म में गाना राह चलते एक पड़ाव पर हो रहा है, इसलिये इसे एक्स्ट्रा कलाकारों पर फ़िल्माया गया है। एक्स्ट्रा कलाकारों के सम्बन्ध में एक बात कहना चाहता हूँ कि इनका भी रोल फ़िल्मों में बहुत महत्वपूर्ण होता है और कई एक्स्ट्रा कलाकारों के सम्बन्ध बड़े-बड़े फ़िल्मकारों से ऐसे बन जाते हैं कि उनकी प्रत्येक फ़िल्म में वह कलाकार छोटे-छोटे रोल्स में दिखाई दे जाते हैं। इस गीत में जो कलाकार आपको मुख्य रूप से दिखाई दे रहे हैं (इनका नाम मैं ढूँढने की कोशिश में हूँ), यह सज्जन राजकपूर की फ़िल्मों में कई बार दिखाई दिये हैं, याद कीजिये फ़िल्म “राम तेरी गंगा मैली” में जो “नकली अंधा” व्यक्ति मन्दाकिनी को कोठे पर ले जाता है, वह रोल इन्हीं कलाकार ने निभाया है… बहरहाल यह गीत आप देखें या सुनें, “ढोलकी की तर्ज के जो नायाब टुकड़े” इसमें बीच-बीच में लगातार डाले गये हैं, उससे आपकी मुंण्डी खुद-ब-खुद हिलने लगेगी… और यही होती है कालजयी गीत की पहचान…






गीत के बोल इस प्रकार से हैं…

चलत मुसाफ़िर मोह लिया रे
पिंजड़े वाली मुनिया…
1) उड़-उड़ बैठी हलवैया दुकनिया…
बरफ़ी के सब रस ले लिया रे
पिंजड़े वाली मुनिया…

हे हे हे हे हे होय रामा हा…

2) उड़-उड़ बैठी बजजवा दुकनिया हा
कपड़ा के सब रस ले लिया रे
पिंजड़े वाली मुनिया हा

हे हे हे हे हे जियो-जियो, होय रामा

3) उड़-उड़ बैठी पनवड़िया दुकनिया
बीड़ा के सब रस ले लिया रे
पिंजड़े वाली मुनिया…

- सुरेश चिपलूनकर

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Saturday 3 January 2009

महफ़िल के चाहने वालों के लिये एक छोटी सी क्विज, :-)

हिन्दी फ़िल्म संगीत में बहुत से गीत ऐसे हैं जिनकी शुरूआत गायक मद्धम सुर में गुनगुनाते (Humming) हुये करते/करती है । इस पोस्ट का उद्देश्य है कि ऐसे गीतों को याद किया जाये ।

उदाहरण के लिये:
रफ़ी साहब का मस्ताने अंदाज में "दीवाना हुआ बादल" की शुरूआत में गुनगुनाना, या फ़िर "साथी न कोई मंजिल", "हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये" । मैं बहुत से अन्य गीतों को जुटाने का काम अपने पाठकों को सौंपता हूँ :-)

इसके अलावा कुछ गीत ऐसे भी हैं जो गुनगुनाने के लिये बडे मुफ़ीद हैं । जैसे "मेरे महबूब तुझे मेरी मोहब्ब्त की कसम", "कुछ दिल न कहा, कुछ भी नहीं", "मैं दिल हूँ इक अरमान भरा" आदि । आप ऐसे गीतों को भी अपनी टिप्पणी में स्थान दे सकते हैं । फ़िर देर किस बात की है, अपने विचार हमें लिख भेजिये ।

Thursday 1 January 2009

देवा प्रेमल द्वारा गाया गया मूलमंत्र और गायत्री मंत्र

क्या संगीत को धर्म और सीमाओं से बाँध कर  रखा जा सकता है ? कदापि नहीं । अब देवा प्रीमेल को ही लें ।  मूलत: जर्मनी की रहने वाली देवा और उनके पति मिटैन का झुकाव भारतीय संगीत और विशेषकर भक्ति संगीत की तरफ़ साफ़ देखा जा सकता है । देवा प्रेमल के अधिकतर ऐलबम वैदिक मंत्रोचारों पर केन्द्रित रहे हैं । हाल ही मे रिलीज हुआ उनका ऐलबम“ मूलमंत्र “ चेन्नई के Oneness University मे ध्यान प्रक्रियाओं के द्वारान मिटैन के साथ प्रस्तुत किया गया । “ गीतों की महफ़िल “ मे नववर्ष की बहुत सी शुभकामनायें और नववर्ष की सुबह  की शुरुआत में क्यों नही  मीडीटेशन संगीत का आनन्द “ देवा प्रीमेल “ के साथ ही लिया जाये । नीचे दिया गया  आडियो और वीडियो “ मूलमंत्र” से  लिया गया है ।

ॐ सच्चिदान्द पराब्रह्मा पुरुषोत्तम परमात्मा ।
श्री भगवती समेत:।
श्री भगवती नम: ॥
हरी ओम तत्सत।
हरि ओम तत्सत ॥


Oneness University मे ही मिटैन के साथ प्रस्तुत किया गया " गायत्री मंत्र "
ऒम भूर्भुव : स्व : ऒम
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो न : प्रचोदयात ||

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