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Tuesday 25 August 2009

द फर्स्ट इंडियल आईडल: मास्टर मदन

द फर्स्ट इंडियल आईडल: मास्टर मदन ( The first Indian Idol: Mr. Madan)इस शीर्षक से परसों ( दिनांक 23.08.2009 को) हिन्दुस्तान टाइम्स में एक लेख छपा है। स्व. मास्टर मदन (singer Master Madan) पर इस लेख के लिये हि.टा के वरिष्‍ठ लेखक श्री प्रवीण कुमार दोंती (Praveen Kumar Donthi) इस महान गायक पर बहुत खोजबीन की। शिमला में उनके भाई मोहन जी का पता लगाया और मोहन जी के पुत्र जसपाल सिंह और पुत्री रविन्दर कौर से भी मदन जी के बारे में बात चीत की।
कुछ दिनों पहले मैने स्व. मोहम्मद रफी साहब को समर्पित एक ब्लॉग पर मा. मदन (Mr. Madan) पर एक लेख पढ़ा; चुंकि मेरे पास उनके गाये हुए ये आठों गाने थे और ये उनके कई प्रशंसकों के लिये आज भी दुर्लभ थे। मैने उस पोस्ट पर टिप्प्णी छोड़ी कि जिन्हें यह गीत चाहिये कृपया मुझे मेल करें, मैं आठों गीत भेज दूंगा। इस टिप्पणी के बाद कई लोगों के मेल मिले और मैने उन्हें ये गीत भेजे।
प्रवीण कुमार जी ने इस टिप्पणी को देखकर मुझे मेल किया और मेरा फोन नंबर लेकर मुझसे बात की, और मैने उन्हें भी गीत भेजे। उसके बाद यह लेख छपा और कई लोगों ने हिन्दुस्तान टाइम्स के उक्‍त लेख से मेरा पता जानकर गाने भेजने की फरमाईश की।
मुझे लगा कि आज भी आठ में से छ: गीत कई लोगों ने नहीं सुने, उनके लिये आज भी ये गीत दुर्लभ हैं, तो क्यों ना इस पर एक पोस्ट लिख दी जाये ताकि जब भी लोग गूगल से सर्च करेंगे , उन्हें ये गीत मिल जायेंगे। मास्टर मदन पर हिन्दी में पहले कुछ पोस्ट्स आ चुकी हैं तो पोस्ट में मास्टर मदन के बारे में जानकारी देना मुझे उचित नहीं लगता।
तो प्रस्तुत है स्व. मास्टर मदन के वे आठों गीत डाउनलोड लिंक के साथ। आप इन्हें सुन भी सकते हैं और डाउनलोड भी कर सकते हैं। गीत डाउनलोड करने के लिये हिन्दी में लिखे गीत के शब्दों पर क्लिक कीजिये।


यूं ना रह रह के हमें तरसाईये


बांगा विच..


चेतना है तो चेत ले


गोरी गोरी बैंया, श्याम सुन्दर.
.


हैरत से तक रहा है




मन की रही मन में


मोरी बिनती मानो कान्ह रे


रावी दे परले कन्डे वे मितरा


Download Link/डाउनलोड
यूं ना रह रह के हमें तरसाईये

बांगा विच..

चेतना है तो चेत ले

गोरी गोरी बैंया, श्याम सुन्दर..

हैरत से तक रहा है

मन की रही मन में

मोरी बिनती मानो कान्ह रे

रावी दे परले कन्डे वे मितरा


Related Links:
Forgotten voice: Master Madan - His music added.
Master Madan, one last time: Thumri.com

Wednesday 12 August 2009

बचपन की शरारतों की याद दिलाता एक अफ़लातून गीत… (Kitab, Gulzar, Masterji)

-- सुरेश चिपलूनकर

हिन्दी फ़िल्मों में बाल मानसिकता और बच्चों की समस्याओं से सम्बन्धित फ़िल्में कम ही बनी हैं। बूट पॉलिश से लेकर मासूम और मिस्टर इंडिया से होते हुए फ़िलहाल बच्चों की फ़िल्म के नाम पर कूड़ा ही परोसा जा रहा है जो बच्चों के मन की बात समझने की बजाय उन्हें “समय से पहले बड़ा करने” में समय व्यर्थ कर रहे हैं। बाल मन को समझने, उनके मुख से निकलने वाले शब्दों को पकड़ने और नये अर्थ गढ़ने में सबसे माहिर हैं सदाबहार गीतकार गुलज़ार साहब। “लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा, घोड़े की दुम पे जो मारा हथौड़ा” तो अपने आप में एक “लीजेण्ड” गाना है ही, इसी के साथ “जंगल-जंगल बात चली है पता चला है, चड्डी पहन के फ़ूल खिला है…” जैसे गीत भी गुलज़ार की पकड़ को दर्शाते हैं।

हालांकि हिन्दी फ़िल्मों में विशुद्ध बालगीत कम ही लिखे गये हैं, फ़िर भी मेरी पसन्द का एक गीत यहाँ पेश कर रहा हूँ… जो सीधे हमें-आपको बचपन की शरारतों में ले जाता है, वह क्लास रूम, वह यार-दोस्त, वह स्कूल, वह मास्टरजी, वह शरारतें और मस्ती सब कुछ तत्काल आपकी आँखों के सामने तैर जाता है… गीत है फ़िल्म “किताब” का, बोल हैं “अ आ इ ई, अ आ इ ई मास्टर जी की आ गई चिठ्ठी…”। गाया है पद्मिनी और शिवांगी कोल्हापुरे ने तथा धुन बनाई है पंचम दा ने। फ़िल्म में इसे फ़िल्माया गया है मास्टर राजू और अन्य बच्चों पर। मास्टर राजू गुलज़ार के पसन्दीदा बाल कलाकार रहे हैं और बच्चों के विषय पर ही बनी एक फ़िल्म परिचय में भी मास्टर राजू को लिया गया है, जब वे बहुत ही छोटे थे। फ़िल्म “किताब” एक बच्चे की कहानी पर आधारित है जिसका मन पढ़ाई में नहीं लगता था और एक दिन वह घर से भाग जाता है, लेकिन दुनिया की कठिनाईयों और संघर्षों को देखकर फ़िर से उसे अपना घर और माता-पिता की याद आती है और वह वापस आ जाता है।

इस गीत के बारे में गुलज़ार ने एक इंटरव्यू में कहा था कि यह लिखते समय मैंने खुद को बच्चा समझकर लिखा। बच्चे कैसी और किस प्रकार की तुकबन्दी कर सकते हैं और कितनी शरारतें कर सकते हैं यह कल्पना करके लिखा। आरडी बर्मन ने भी एक बार गुलज़ार के बारे में कहा है कि “हो सकता है कि यह आदमी किसी दिन अखबार की कटिंग लाकर कहे कि ये रहे गीत के बोल, इस पर धुन बनाओ…”, तो भाईयों और बहनों, अपने बचपन में खो जाईये और यह चुलबुला लेकिन मधुर, शरारती तुकबन्दियों से भरपूर फ़िर भी लय-ताल के ठेके देने वाला गीत सुनिये, तब पंचम दा तथा गुलज़ार जैसे लोग दिग्गज और महान क्यों हैं इसे समझना बेहद आसान हो जायेगा…

गीत के बोल कुछ इस प्रकार से हैं –

धुम तक तक धुम,
धुम तक तक धुम… (2)
अ आ इ ई, अ आ इ ई
मास्टर जी की आ गई चिठ्ठी
चिठ्ठी में से निकली बिल्ली… (2)
बिल्ली खाये जर्दा-पान
काला चश्मा पीले कान… (2)

अ आ इ ई, अ आ इ ई
मास्टर जी की आ गई चिठ्ठी
चिठ्ठी में से निकली बिल्ली… (2)
कान में झुमका, नाक में बत्ती…(2)
हाथ में जैसे अगरबत्ती
(नहीं मगरबत्ती, अगरबत्ती, मगरबत्ती, अगर-अगरबत्ती)
अगर हो बत्ती कछुआ छाप
आग पे बैठा पानी ताप… (2)
ताप चढ़े तो कम्बल तान
वीआईपी अंडरवियर-बनियान
वीआईपी अंडरवियर बनियान… (2)

धुम तक तक धुम,
धुम तक तक धुम… (2)
अ आ इ ई, अ आ इ ई
मास्टर जी की आ गई चिठ्ठी
चिठ्ठी में से निकला मच्छर
चिठ्ठी में से निकला मच्छर

मच्छर की दो लम्बी मूंछें
मूंछ पे बांधे दो-दो पत्थर
पत्थर पे एक आम का झाड़
मूंछ पे लेकर चढ़ा पहाड़
पहाड़ पे बैठा बूढ़ा जोगी,
जोगी की एक जोगन होगी

(गठरी में लागा चोर मुसाफ़िर देख चांद की ओर)
पहाड़ पे बैठा बूढ़ा जोगी,
जोगी की एक जोगन होगी
जोगन कूटे कच्चा धान

वीआईपी अंडरवियर-बनियान
वीआईपी अंडरवियर बनियान… (2)

धुम तक तक धुम,
धुम तक तक धुम… (2)
अ आ इ ई, अ आ इ ई
मास्टर जी की आ गई चिठ्ठी
चिठ्ठी में से निकला चीता
चिठ्ठी में से निकला चीता… (2)
थोड़ा काला थोड़ा पीला
चीता निकला है शर्मीला
थोड़ा-थोड़ा काला, थोड़ा-थोड़ा पीला

(अरे वाह वाह, चाल देखो)

घूंघट डाल के चलता है
मांग में सिन्दूर भरता है
माथे रोज लगाये बिन्दी
इंग्लिश बोले, मतलब हिन्दी

(इफ़ अगर इज़ है बट पर व्हाट, मतलब क्या)
माथे रोज लगाये बिन्दी
इंग्लिश बोले, मतलब हिन्दी
हिन्दी में अलजेब्रा छान…
वीआईपी अंडरवियर-बनियान
वीआईपी अंडरवियर बनियान… (2)

सावधान…

यह गीत इस जगह पर आकर अचानक थम जाता है, क्योंकि क्लास रूम में मास्टरजी आ जाते हैं और बच्चों की मस्ती बन्द हो जाती है, लेकिन मेरा दावा है कि यदि इसी गीत को गुलज़ार लगातार लिखते रहते तो कम से कम 40-50 पेज का गीत तो लिख ही जाते और वह भी बच्चों की उटपटांग, लेकिन भोली और प्राकृतिक तुकबन्दियों में। विश्वास नहीं होता कि यही गीतकार इसी फ़िल्म में “धन्नो की आँखों में रात का सुरमा…” लिखता है जिसमें “सहर भी तेरे बिना रात लगे, छाला पड़े चांद पे जो हाथ लगे…” जैसी गूढ़ पंक्ति भी लिखता है… है ना गजब का “कंट्रास्ट”, लेकिन इसीलिये तो गुलज़ार साहब महान हैं…

(सम्प्रति पद्मिनी कोल्हापुरे अपने बेटे के लिये फ़िल्मों में ज़मीन तलाश रही हैं, शिवांगी कोल्हापुरे का विवाह शक्ति कपूर के साथ हुआ है जबकि इनकी एक और छोटी बहन तेजस्विनी कोल्हापुरे भी फ़िल्मों में ही हैं, जबकि सबके प्यारे गुलज़ार साहब “बन्दिनी” से लेकर “कमीने” तक का सफ़र लगातार जारी रखे हुए हैं एक से बढ़कर एक हिट गीतों के साथ…)

इस गीत को सुनने के लिये नीचे प्ले बटन पर चटका लगायें…



इस गीत के लिये यू-ट्यूब की वीडियो लिंक यह है, तथा इसे सीधे यहाँ भी देखा जा सकता है…






इसकी Audio link यह है…



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Monday 10 August 2009

सप्‍त सुरन तीन ग्राम गाओ


भले ही खाँ साहब ने शुद्ध बिलावल सही नहीं गाया हो, भले ही पखावजी का बांया अंगूठा नकली हो,भले ही तबले पर थाप हल्की पड़ी हो.... पर ज़ुईन खां साहब ने जितना भी गाया; बेदाला ही गया .. हमें तो उतना ही मधुर लगा जितना तानसेन ने गाया।

सप्‍त सुरन तीन ग्राम....

सप्‍त सुरन तीन ग्राम गावो सब गुणीजन
इक्कीस मूर्छना तान-बान को मिलावो-२
औढ़व संकीरण सुर सम्पूरण राग भेद
अलंकार भूषण बन-२
राग को सजावो...सप्‍त सुरन

सा सुर साधो मन, रे अपने रब को ध्यान-२
गांधार तजो गुमान-२
मध्यम मोक्ष पावो
पंचम परमेश्‍वर, धैवत धरो ध्यान-२
नी नित दिन प्रभु चरण शीतल आवो

सप्‍त सुरन तीन ग्राम गावो सब गुणीजन
इक्कीस मूर्छना तान-बान को मिलावो
सप्‍त....

Saturday 8 August 2009

न जी भर के देखा ना कुछ बात की: एक गीत पहेली


दूरदर्शन के दीवानों के लिये आज एक गीत पहेली! चंदन दास की इस सुन्दर गज़ल को पहचानिये...
न.. न.. न.. इस पहेली में कोई पुरुस्कार नहीं मिलेगा सो अनुरोध है कि गूगल बाबा की शरण लिये बिना इस पहेली को हल करने की कोशिश कीजिये कि यह गज़ल आपने कहां सुनी है?
दूसरा और तीसरा हिंट दे रहा हूं कि यह आपने कम से कम बीस साल पहले सुनी होगी तब शाहिद कपूर बहुत छोटे बच्चे रहे होंगे!!! एक और पहेली यह है कि अगर यह दूसरा हिंट है तो पहला और तीसरा हिंट कौनसा है?


न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की

कई साल से कुछ ख़बर ही नही कई साल से कुछ ख़बर ही नही
कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की

उजालों कि परियां नहाने लगीं उजालों कि परियां नहाने लगीं
नदी गुनगुनाये ख़यालात की नदी गुनगुनाये ख़यालात की

मैं चुप था तो चलती हवा रुक गयी मैं चुप था तो चलती हवा रुक गयी
ज़बाँ सब समझते है जज़्बात की ज़बाँ सब समझते है जज़्बात की

सितारों को शायद खबर ही नही सितारों को शायद खबर ही नही
मुसाफ़िर ने जाने कहाँ रात की मुसाफ़िर ने जाने कहाँ रात की

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