मित्रों, आज महफिल में प्रस्तुत है हिन्दी फिल्मों के चार महान गायकों के गाये हुए पहले गाने। ये गाने क्रमश: मुकेश, मोहम्मद रफी लता मंगेशकर और किशोरकुमार ने गाये हैं।
मुकेश जी के बारे में कहा जाता है कि उन्होने स्व. कुन्दन लाल सहगल की शैली में अपना पहला गाना गाया तब सहगल साहब ने उन्हें बुला कर समझाया और अपनी खुद की आवाज में गाने की सलाह दी, और बाद में मुकेश ने अपनी शैली में गाना शुरु किया। यहाँ प्रस्तुत गाना जो पहली नजर फिल्म (1945) का है, इस फिल्म का संगीत दिया है मेरे पसंदीदा संगीतकार अनिल बिश्वास ने और फिल्म के गीतकार हैं आह सीतापुरी। फिल्म में मुख्य भूमिका थी मोती लाल की।
इस गाने को पहली बार सुनने पर एक बार तो यही लगता है कि यह स्व. सहगल साहब ने ही गाया होगा।
आंसू ना बहा ना फरियाद ना कर दिल जलता है तो जलने दे....
दूसरा गाना स्व. मोहम्म्द रफी ने गाया है, ए आर कारदार की फिल्म पहले आप (1944) के लिये। मोहम्मद रफी ने इससे बाद फिल्म शाहजहाँ (1946) स्व. कुन्दन लाल सहगल के गाये गाने रूही रूही मेरे सपनों की रानी में कोरस के रूप में रूही रूही रूही मेरे सपनों की रानी पंक्तियां गाई थी। फिलहाल आप सुनिये हिन्दुस्तां के हम हैं हिन्दुस्तां हमारा।
हिनदुस्तां के हम है हिन्दुस्तां हमारा
तीसरा गाना स्वर कोकिला लता मंगेशकर का गाया हुआ है। लता जी ने यह गाना फिल्म आपकी सेवा में (1946) उसए पहले लता जी ने मराठी फिल्म Pahili Mangalagaur (1942) अभिनय भी किया था। यानि हिन्दी फिल्मों के तीन महान गायकों की पहली फिल्म में पहला शब्द किसी ना किसी रूप में जुड़ा रहा।
इस गाने का ओडियो उतना स्पष्ट नहीं है, इसलिये हो सकता है कि आपको उतना आनन्द नहीं आये, परन्तु लता मंगेशकरजी का पहला गाना सुनना कौन नहीं चाहेगा?
पाँव लागे कर जोरी रे...
इस कड़ी का अन्तिम और मस्तमौला कलाकार किशोर कुमार का गाया हुआ पहला गाना प्रस्तुत है। किशोर कुमार , सहगल साहब के बहुत बड़े प्रशंषक थे और शायद इसी वजह से अपने गायन कैरियर के शुरुआती दौर में उन्के गाये गाने में स्व. सहगल साहब की शैली सुनाई देती है। ( खासकर इस पहले गाने में)
यह गाना किशोरकुमार ने फिल्म जिद्दी 1948 के लिये गाया था। इस के संगीत निर्देशक थे स्व. खेम चन्द्र प्रकाश और मुख्य भूमिकायें निभाई थी देवानन्द और कामिनी कौशल ने।
मरने की दुवायें क्यों मांगू, जीने की तमन्ना कौन करे....
तो बताईये आपको कौन कौनसे गाने अच्छॆ लगे?
7 comments:
मुझे मुकेशजी का गाया गाना सबसे अच्छा लगा. वो मैंने पहले भी सुना हुआ है.
रोचक जानकारी के लिए धन्यवाद.
नाहर साहब,
सर जी छा गए हैं आप. मज़ा आ गया बस. बड़ी अजीब सी बात है कि आज तक आप का ब्लॉग मेरी नज़रों के सामने से नहीं गुज़रा. हद है. सर जी मैं ने अपनी ज़िंदगी में कोई काम इतनी संजीदगी से नहीं किया जितना हिन्दी फिल्मी गाने सुनना. वैसे आम तौर पे १९७० के बाद के गानों से कुछ ख़ास लगाव नहीं रहा कुछ चुनिंदा गीतों को छोड़ कर. आप के ब्लॉग पर तो अब हर दिन का आना जाना रहेगा.
शुक्रिया इस ब्लॉग की हर चीज़ के लिए.
सागर भाई
बढ़िया है । गाने सुनकर मज़ा आ गया। इतने पुराने गाने और उनके बारे में इतनी जानकारी देने के लिए शुक्रिया ।
वाह! क्या बात है !
अच्छा उपहार दिया आपने .
सागर भाई मुझे मुकेश और किशोर सबसे अच्छे लगे। इस सगींत अमृत को चटाने के लिए शुक्रिया।
शुक्रिया इस प्रस्तुति के लिए। अगर आवाज़ साफ रहती तो सायद लता जी का गीत ही सबसे बेहतरीन लगता। ये बात तो स्पष्ट है कि इनमें से सबसे लोकप्रिय मुकेश का गीत ही रहा।
सागर भाई जिंदगी के पचड़ों और हड़बड़ी की वजह से यहां तक जरा देर से आया लेकिन बधाई देना चाहता हूं । बेहतरीन प्रस्तुति है । खासकर लता जी वाला गीत तो मैं जाने कब से खोज रहा था । आप सही मायनों में असली अन्वेषक हैं । यहां मैं ये रेखांकित करना चाहता हूं कि उस दौर के सभी गायकों पर सहगल की आवाज़ का कितना गहरा असर था । मुझे तो किशोर के इस गाने पर हमेशा से हैरत होती रही है । बहुत ही ज्यादा सहगलियाना आवाज है उनकी इस गाने में । मैं कल्पना ही नहीं कर पाता कि इस पर देव आनंद ने कैसे अभिनय किया होगा । एक बार फिर से धन्यवाद इस अनमोल पेशकश के लिए । जल्दी ही बात भी होगी ।
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