ज़मीं चल रही आसमां चल रहा है
ये किसके इशारे जहाँ चल रहा है
ज़मीं चल रही है...
चली जा रही है जमाने की नय्या
नजर से ना देखा किसी ने खेवैया
ना जाने ये चक्कर कहाँ चल रहा है
ये किसके इशारे ...
ये हंसना ये रोना ये आशा निराशा
समझ में ना आये ये क्या है तमाशा
ये क्यों रात दिन कारवां चल रहा है
ये किसके इशारे ...
अजब ये महफ़िल अजब दास्तां है
ना मंजिल है कोई ना कोई निशां है
तो फिर किसके लिये कारवां चल रहा है
ये किसके इशारे....
भटकते तो देखे हजारों सयाने
मगर राज कुदरत का कोई ना जाने
ये सब सिलसिला बेनिशां चल रहा है
ये किसके इशारे जहाँ चल रहा है
| Zameen Chal Rahi.m... |
यह गाना पहले यहाँ प्रकाशित
किया था पर पोडकास्ट की फीड में कुछ तकलीफ थी अत: किसी एग्रीग्रेटर पर यह जुड़ नहीं पाया, फिर ब्लॉगस्पॉट पर नई महफिल सजानी पड़ी ।
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2 comments:
बढ़िया रही यह नई महफिल की रंगत भी. वाह!!!
अच्छी लग रही है ये महफ़िल ।
अन्नपूर्णा
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