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Friday 3 October 2008

यह लता मंगेशकर की नहीं, एक बेटी की आवाज़ है…

सुरेश चिपलूनकरजी की कलम से
लता मंगेशकर का जन्मदिन हाल ही में मनाया गया। लता मंगेशकर जैसी दिव्य शक्ति के बारे में कुछ लिखने के लिये बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। उन पर और उनके बारे में इतना कुछ लिखा जा चुका है कि अब शब्दकोष भी फ़ीके पड़ जाते हैं और उपमायें खुद बौनी लगती हैं। व्यस्तता की वजह से उस पावन अवसर पर कई प्रियजनों के आग्रह के बावजूद कुछ नहीं लिख पाया, लेकिन देवी की आराधना के लिये अष्टमी का दिन ही क्यों, लता पर कभी भी, कुछ भी लिखा जा सकता है। साथ ही लता मंगेशकर के गीतों में से कुछ अच्छे गीत छाँटना ठीक उसी प्रकार है जैसे किसी छोटे बच्चे को खिलौने की दुकान में से एक-दो खिलौने चुनने को कहा जाये।

साथ ही लता मंगेशकर के गीतों में से कुछ अच्छे गीत छाँटना ठीक उसी प्रकार है जैसे किसी छोटे बच्चे को खिलौने की दुकान में से एक-दो खिलौने चुनने को कहा जाये।
फ़िर भी कई-कई-कई पसन्दीदा गीतों में से एक गीत के बारे में यहाँ कुछ कहने की गुस्ताखी कर रहा हूँ। गीत है फ़िल्म "आशीर्वाद" का, लिखा है गुलज़ार जी ने तथा धुन बनाई है वसन्त देसाई ने। गीत के बोल हैं "एक था बचपन…एक था बचपन…", यह गीत राग गुजरी तोड़ी पर आधारित है और इसे सुमिता सान्याल पर फ़िल्माया गया है। पहले आप गीत सुनिये, उसकी आत्मा और गुलज़ार के बोलों को महसूस कीजिये फ़िर आगे की बात करते हैं…



यू-ट्यूब पर यह गीत इस लिंक पर उपलब्ध है…

इस गीत को ध्यान से सुनिये, वैसे तो लता ने सभी गीत उनकी रूह के भीतर उतर कर गाये हैं, लेकिन इस गीत को सुनते वक्त साफ़ महसूस होता है कि यह गीत लता मंगेशकर उनके बचपन की यादों में बसे पिता यानी कि दीनानाथ मंगेशकर को लक्षित करके गा रही हों… उल्लेखनीय है कि दीनानाथ मंगेशकर की पुत्री के रूप में उन्हें वैसे ही ईश्वरीय आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। दीनानाथ मंगेशकर 1930 में मराठी रंगमंच के बेताज बादशाह थे। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि उस वक्त के सोलह हजार रुपये महीने आज क्या कीमत रखते होंगे? जी हाँ उस वक्त दीनानाथ जी की मासिक आय 16000 रुपये थी, भेंट-उपहार-पुरस्कार वगैरह अलग से। उनका कहना था कि यदि ऊपरवाले की मेहरबानी ऐसे ही जारी रही तो एक दिन मैं पूरा गोआ खरीद लूँगा। उच्च कोटि के गायक कलाकार दीनानाथ मंगेशकर और उनकी भव्य नाटक कम्पनी ने समूचे महाराष्ट्र में धूम मचा रखी थी। वक्त ने पलटा खाया, दीनानाथ जी नाटक छोड़कर फ़िल्म बनाने के लिये कूद पड़े और उसमें उन्होंने जो घाटे पर घाटा सहन किया वह उन्हें भीतर तक तोड़ देने वाला साबित हुआ। मात्र 42 वर्ष की आयु में सन् 1942 में उच्च रक्तदाब की वजह से उनका निधन हो गया। उस वक्त लता सिर्फ़ 13 वर्ष की थीं और उन्हें रेडियो पर गाने के अवसर मिलने लगे थे, उन पर पूरे परिवार (माँ, तीन बहनें और एक भाई) की जिम्मेदारी आन पड़ी थी, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और देवप्रदत्त प्रतिभा के साथ उन्होंने पुनः शून्य से संघर्ष शुरु किया और "भारत रत्न" के उच्च स्तर तक पहुँचीं।



मृत्युशैया पर पड़े दीनानाथ जी ने रेडियो पर लता की आवाज़ सुनकर कहा था कि "अब मैं चैन से अन्तिम साँस ले सकता हूँ…" लता के सिर पर हाथ फ़ेरते हुए उन्होंने कहा था कि "मैंने अपने जीवन में बहुत धन कमाया और गंवाया भी, लेकिन मैं तुम लोगों के लिये कुछ भी छोड़कर नहीं जा रहा, सिवाय मेरी धुनों, एक तानपूरे और ढेरों आशीर्वाद के अलावा…तुम एक दिन बहुत नाम कमाओगी…"। लता मंगेशकर ने उनके सपनों को पूरा किया और आजीवन अविवाहित रहते हुए परिवार की जिम्मेदारी उठाई। यह गीत सुनते वक्त एक पुत्री का अपने पिता पर प्रेम झलकता है, साथ ही उस महान पिता की जुदाई की टीस भी शिद्दत से उभरती है, जो सुनने वाले के हृदय को भेदकर रख देती है… यह एक जेनेटिक तथ्य है कि बेटियाँ पिता को अधिक प्यारी होती हैं, जबकि बेटे माँ के दुलारे होते हैं। गीत के तीसरे अन्तरे में जब लता पुकारती हैं "मेरे होंठों पर उनकी आवाज़ भी है…" तो लगता है कि वाकई दीनानाथ जी का दिया हुआ आशीर्वाद हम जैसे अकिंचन लोगों को भीतर तक तृप्त करने के लिये ही था।

फ़िल्म इंडस्ट्री ने कई कलाकारों को कम उम्र में दुनिया छोड़ते देखा है, जिनकी कमी आज भी खलती है जैसे गुरुदत्त, संजीव कुमार, स्मिता पाटिल आदि… मास्टर दीनानाथ भी ऐसी ही एक दिव्य आत्मा थे, एक तरह से यह गीत पूरी तरह से उन्हीं को समर्पित है… गुलज़ार – जो कि "इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त कदम रस्ते, कुछ तेज कदम राहें…" या फ़िर "हमने देखी हैं उन आँखों की महकती खुशबू…" जैसे अजब-गजब बोल लिखते हैं उन्होंने भी इस गीत में सीधे-सादे शब्दों का उपयोग किया है, गीत की जान है वसन्त देसाई की धुन, लेकिन समूचे गीत पर लता-दीनानाथ की छाया प्रतिध्वनित होती है। यह भी एक संयोग है कि फ़िल्म में सुमिता सान्याल को यह गीत गायिका के रूप में रेडियो पर गाते दिखाया गया है।

आज लता मंगेशकर हीरों की अंगूठियाँ और हार पहनती हैं, लन्दन और न्यूयॉर्क में छुट्टियाँ बिताती हैं, पुणे में दीनानाथ मंगेशकर के नाम से विशाल अस्पताल है, और मुम्बई में एक सर्वसुविधायुक्त ऑडिटोरियम, हालांकि इससे दस गुना वैभव तो उन्हें बचपन में ही सुलभ था, और यदि दीनानाथ जी का अल्पायु में निधन न हुआ होता तो??? लेकिन वक्त के आगे किसी की कब चली है, मात्र 13 वर्ष की खेलने-कूदने की कमसिन आयु में लता मंगेशकर पर जो वज्रपात हुआ होगा, फ़िर जो भीषण संघर्ष उन्होंने किया होगा उसकी तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते। पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते स्वयं अविवाहित रहना भी तो त्याग की एक पराकाष्ठा है… इस गीत में लता का खोया हुआ बचपन और पिता से बिछुड़ने का दर्द साफ़ झलकता है। दुनिया में फ़ैले दुःख-दर्द, अन्याय, शोषण, अत्याचार को देखकर कभी-कभी ऐसा लगता है कि "ईश्वर" नाम की कोई सत्ता नहीं होती, परन्तु लता मंगेशकर की आवाज़ सुनकर फ़िर महसूस होता है कि नहीं… नहीं… ईश्वर ने अपने कुछ अंश धरती पर बिखेरे हुए हैं, जिनमें से एक है लता मंगेशकर…

गीत के बोल इस प्रकार हैं…

एक तथा बचपन, एक था बचपन
बचपन के एक बाबूजी थे, अच्छे-सच्चे बाबूजी थे
दोनों का सुन्दर था बन्धन…
एक था बचपन…

1) टहनी पर चढ़के जब फ़ूल बुलाते थे
हाथ उचके तो टहनी तक ना जाते थे
बचपन के नन्हें दो हाथ उठाकर वो
फ़ूलों से हाथ मिलाते थे…
एक था बचपन… एक था बचपन

2) चलते-चलते, चलते-चलते जाने कब इन राहों में
बाबूजी बस गये बचपन की बाहों में
मुठ्ठी में बन्द हैं वो सूखे फ़ूल अभी
खुशबू है सीने की चाहों में…
एक था बचपन… एक था बचपन

3) होठों पर उनकी आवाज भी है
मेरे होंठों पर उनकी आवाज भी है
साँसों में सौंपा विश्वास भी है
जाने किस मोड़ पे कब मिल जायेंगे वो
पूछेंगे बचपन का अहसास भी है…
एक था बचपन, एक था बचपन…
छोटा सा नन्हा सा बचपन…

एक और बात गौर करने वाली है कि अब "बाबूजी" शब्द भी लगभग गुम चुका है। वक्त के साथ "बाबूजी" से पिताजी हुए, पिताजी से पापा हुए, पापा से "डैड" हो गये और अब तो बाबूजी को सरेआम धमकाया जाता है कि "बाबूजी जरा धीरे चलो, बिजली खड़ी, यहाँ बिजली खड़ी, नैनों में चिंगारियाँ, गोरा बदन शोलों की लड़ी…" बस और क्या कहूँ, मैंने पहले ही कहा कि "वक्त के आगे सभी बेबस हैं…"।

12 टिप्पणियाँ/Coments:

परमजीत बाली said... Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

बहुत सुन्दर पोस्ट है।गीत सुनवानें के लिए आभार।

गरिमा said... Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

बडे भईया... नगीना तलाश लाये आप... कित्ती बार सुन चुकी... हर हर समय ये लग रहा है कि एक बार और... कान थकते नही सुनने मे... और लता जी के बारे गहरी जानकारी भी दी... बहुत बढिया

रंजना [रंजू भाटिया] said... Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

बहुत सुंदर ..पता नही क्यों आँखे नम हो गई इसको सुनते हुए ..शुक्रिया इतने सुंदर लेख और गीत के लिए

AVADH said... Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

Sureshji,
Aapka lekh padh kar aankhen bhar aayin.Ittefaq se main apne pitaji ko babuji kah kar hi sambodhit karta tha.
Pehli baar jab yeh marmasparshi geet dekha/suna tha tab se hi iska prabhav avismaraniya raha hai.Lata didi, Pt. Vasant Desai aur Gulzar saheb ka sangam aur parde par Hrishikesh da ke nirdeshan mein Sumita Sanyal ka abhinay - Kya khoob saman bandha hai.
Lekin aapne jo Pt. Dinanathji ke baare mein jo jankari di uske karan main ab geet ka prasang aur achchhi tarah se anubhav kar paya ( visheshkar - "mere honthon par unki awaz bhi hai").
Itni sundar aur sarthak vyakhya aur anubhuti ke liye bahut bahut dhanyavad. Aapke svayam Chiplun se sambandhit hone aur sthaniya lagav ki vajah se itni achchhi abhivyakti
humein mili.
Ek baar phir aabhar sahit,
Avadh Lal

राज भाटिय़ा said... Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

बहुत ही सुन्दर , यु टुब पर जा कर सुनना पढा, आप का लिंक तो चला ही नही, गीत के साथ साथ जानकारी भी बहुत अच्छी लगई
धन्यवाद

सागर नाहर said... Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

इस गीत को कई बार सुना परन्तु आपका यह लेख पढ़ने के बाद जब दुबारा सुना... पढ़ते पढ़ते सुना; एक अलग ही आनन्द आया। उस आनंद/अनुभव का वर्णन कर पाना मुश्किल है। बस... क्या कहूं सही शब्द ही नहीं मिल रहे।
पं दीनानाथजी के बारे में इतना सब कुछ नहीं पता था। आपने जो जानकारी दी वो अद्‍भुद है।
बहुत बहुत धन्यवाद सुरेशजी

महेन said... Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

सुरेश जी, बेहद अच्छी पोस्ट लगी। गीत से लता जी के अतीत को रिलेट करके नये अर्थ निकल रहे हैं गीत में। आपको और सागर जी को धन्यवाद।

महेन said... Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates
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Anonymous said... Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

bahut madhur geet hai . one of my favourites .dhanyawaad yahan sunane ke liye
manjot bhullar

दिलीप कवठेकर said... Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

लता जी पर कई आलेख पढ़े, यहाँ कुछ हटके लिखा गया.

बड़े मार्मिक शब्दों में गीत की परिकल्पना और पृष्ठ भूमि का जीवंत वर्णन हमें पढ़ने को मिला . पिता के पावन रिश्ते की गहराई समझा गया यह गीत हमें.
इस गीत को पूरा सुनना और आँख में आंसू ना आए, ये कभी नही हो सका , आज भी नही.

सुरेश जी की प्रस्तुति मन लुभा गयी.

अभिषेक ओझा said... Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

बड़ी अच्छी लगी ये पोस्ट. ये गाना भला किसे पसंद नहीं होगा?

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