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बड़ा अजीब सा प्रश्न है ना? लेकिन क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि इतने गुणी गायक और संगीत के इतने बड़े ज्ञाता मुहम्मद रफी साहब ने किसी फिल्म में संगीत क्यों नहीं दिया। ये प्रश्न मेरे मन में बरसों से था और आखिरकार गुजरात समाचार के वरिष्ठ हास्य लेखक अशोक दवे की रफी साहब के गाये गैर फिल्मी सूचि से पता चला कि रफी साहब ने कुछ गानों में संगीत भी दिया है। सूचि में चार गानों के नाम दिये हैं वे निम्न है।
उठा सुराही
दूर से आये थे साकी सुनके
घटा है बाग है मय है सुबह है जाम है
चले आ रहे हैं वो ज़ुल्फ़ें बिखेरे
मैने अपना संग्रह संभाला तो पता चला कि उठा सुराही वाला गाना तो अपने पास है, पर ऑडियो क्वालिटी थोड़ी उन्नीस है सो नेट पर खोजा और आखिरकार ईस्निप्स पर ये गीत मिल भी गया।
तो पस्तुत है मुहम्मद रफी साहब द्वारा संगीतबद्ध गैर फिल्मी गीत उठा सुराही ये शीश.....
आशाताई ने अपनी गायिकी में जो जो प्रयोग किये उनमें से कई हमने देखे- सुने हैं। संजय भाई पटेल जी ने हमें आशाजी की आवाज में मियां की मल्हार में एक तराना सुनाया था जिसे आज भी मैं कई बार सुनता रहता हूँ। आज मैं आशाजी के एक नये प्रयोग के बारे में बता रहा हूँ।
मीराबाई के प्रभाव से हिन्दी फिल्म जगत की कोई गायिका अछूती नहीं रह सकी। भारत रत्न एम. एस सुब्बुलक्ष्मी, लताजी, वाणी जयराम के अलावा कई गायिकाओं ने मीराबाई को गाया, तो भला आशाताई कैसे अछूती रहती!
मीराबाई की सहज समाधि पर आधारित इस रचना को सुनिये| आपको यूं महसूस होने लगेगा मानो आपके सामने आशाजी नहीं खुद मीराबाई अपने हाथों में इकतारा लेकर बजाती हुई झूम रही हो।
फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥
बिन करताल पखावज बाजै अणहदकी झणकार रे।
बिन सुर राग छतीसूं गावै रोम रोम रणकार रे॥
सील संतोखकी केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे। उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे॥ ( ये पद प्रस्तुत गीत/भजन में नहीं है।)
घटके सब पट खोल दिये हैं लोकलाज सब डार रे।
मीराके प्रभु गिरधर नागर चरणकंवल बलिहार रे॥
चलते चलते.. यही गीत आशाताई की ही आवाज में एक और दूसरे राग में- दूसरे रंग में सुनिये, साथ ही मीराबाई के अन्य भजन आशाताई कि आवाज में यहां सुनिये
तलत महमूद का गाया हुआ एक दुर्लभ और मधुर गैर फिल्मी गीत
मखमली आवाज के मालिक तलत महमूद साहब के लिये कुछ कहने की जरूरत है? मुझे लगता है शायद उनकी लिये यहाँ कुछ शब्दों में लिखना बड़ा मुश्किल होगा। फिलहाल आप उनकी मधुर आवाज में एक दुर्लभ गीत सुनिये। यह गैर फिल्मी गीत है और इसका संगीत दिया है दुर्गा सेन ने और इसे लिखा है फ़ैयाज़ हाशमी ने.. लीजिये सुनिये।