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Friday 8 February 2008

दिले नाशाद को जीने की हसरत हो गई तुमसे... एक खूबसूरत मुजरा (गज़ल)

हिन्दी फिल्मों में महफिल (कोठे)में गाये एक से एक खुबसूरत गीतों और गज़लों की लम्बी फेहरिस्त है। मजबूर नायिका जब कोठे पर तवायफ बन कर गज़ल गाती है, तो दर्शकों की आंखे नम हो जाती है। आम बोल चाल की भाषा में इन्हें मुजरा कहा जाता है। वैसे मुजरा एक प्रकार की नृत्य शैली का नाम है।
कुछ प्रसिद्ध मुजरा इस प्रकार हैं नजर लागी राजा तोरे बंगले पर, फिल्म जहाँआरा में जब जब तुम्हे भुलाया,तुम और याद आये। फिल्म उमराव जान की दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिये.. फिल्म निराला में महफिल में जल उठी शमा परवाने के लिये और .. भी बह्त सारे इस तरह के मुजरा है जिनकी सूचि बहुत लम्बी है।
प्रदीप कुमार और नरगिस की फिल्म अदालत (1958) में कई (गीत) गज़लें हैं जो नायिका नरगिस पर फिल्माई और लता जी की गाई गज़ल- उनको ये शिकायत है कि हम कुछ नहीं कहते और यूं हसरतों के दाग मुहब्बत में धो लिये और जा जा रे साजना काहे सपनों में आये प्रमुख हैं।
पिछले दिनों पारुल जी ने मदन मोहन का संगीतबद्ध एक खूबसूरत मुजरा हमें सुनवाया साथ ही मुजरे के बारे में जानकारी भी दी
आज मैं आपको एक खूबसूरत मुजरा गज़ल सुनवा रहा हूँ जो फिल्म चुनरिया (1948) में लता जी ने हंसराज बहल के संगीत निर्देशन में गाई है।

Dile nashad ko jin...

दिल-ए-नाशाद को जीने की हसरत हो गई तुम से
मुहब्बत की कसम हम को मुहब्बत हो गई तुम से

दम-ए-आख़िर चले आये बड़ा एहसाँ किया तुम ने
हमारी मौत कितनी ख़ूबसूरत हो गई तुम से

कहाँ तक कोई तड़पे मान जाओ, मान भी जाओ
कि दिल की बात कहते एक मुद्दत हो गई तुम से

दिल-ए-नाशाद को जीने की हसरत हो गई तुम से
मुहब्बत की कसम हम को मुहब्बत हो गई तुम से

6 टिप्पणियाँ/Coments:

उमराव जान said...

मुजरों पर पी.एच.डी. कर रखी है आपने लगता है. खूब ...

anitakumar said...

ये आप ने बहुत अच्छा सोचा, सच में मुजरे पर कई सुन्दर सुन्दर गाने हैं प्लीज सब सुनवाइए। इस गाने में तो लता जी की आवाज एकदम अलग लग रही है।

डॉ. अजीत कुमार said...

"....मुहब्बत की कसम हम को मुहब्बत हो गई तुम से."
क्या बात है नाहर भाई!
दिल खुश हो गया.
लता जी के गाए मुजरों में से एक और बेहतरीन नमूना.
बार-बार सुन रहा हूँ. आपके प्लेयर पर बज नहीं रहा है तो सीधे ईस्निप्स पर जाकर सुन रहा हूँ.
धन्यवाद.

राजेंद्र said...

Shadow of Noorjahan is evident on Lataji's voice although lesser than her earlier songs.

yunus said...

वाह सागर भाई । ये वो दौर था जब लता जी शुरूआत कर रही थीं । इस आवाज़ पर मलिका ए तरन्‍नुम नूरजहां का असर साफ नजर आ रहा है । 1948 कई मायनों में अहम था । सहगल का जाना । रफी साहब का आना । यही दौर किशोर की शुरूआत का भी था ।
सुंदर प्रस्‍तुति

MUFLIS said...

Lataji ki khanakdaar awaaz mei bahut hi dilksh geet sun`ne ko mila, halaanke H R Behal fitr`tn aisi tarzeiN nhi diya karte tthe, lekin iss composition mei kmaal kiya hai unhone.. film "milan" ka geet "haae jiya roe " bhi Behalji ki dhun hi hai na ? muddat ho gyi uss geet ko sune hue.... ---MUFLIS---

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