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कई सालों पहले इस बांग्ला गीत का टुकड़ा मिला तब यह मुश्किल से तीस चालीस सैकंड का था, बरसों तक खोजने के बाद एक दिन आखिरकार यह पूरा गाना मिल गया। तब से मैं इस गीत को अगड़म बगड़म गाते हुए सुन रहा था। कुछ दिनों पहले शुभ्रा जीजी(सम्प्रति : आकाशवाणी दिल्ली) से अनुरोध किया तो उन्होंने उस गीत के सही शब्द बता दिए,और उसके बाद गाने को सुनने का आंनद अब कई गुना बढ़ गया। बहुत बहुत धन्यवाद शुभ्रा जिज्जी। आहा-आहा, तन-मन झूम रहा है। नजरुल संगीत/गायिका: कमला झारिया रूम झूम बादोलो आजि बोरोशे आकुल शिखी नाचे घनो मेघो दोरोशे। बारिरो दोर्शन आजि खोने खोने। नोवो नीरद श्याम मुख पोड़े मोने। ना जानि कोन देशे, कोन प्रिया शोने। रोयेछे भुलिया नोवो हर्षे। রুম ঝুম বাদল আজি বরষে আকুল নিশি নাচে ঘন দরশে ।। বারির দরশনে আজি ক্ষণে ক্ষণে নব নীরদ শ্যাম রূপে পড়ে মনে না জানি কোন দেশে কোন প্রিয়া সনে রয়েছে ভুলিকা নটবর সে ।।
भावार्थ: आज झूम झूम कर बादल बरस रहे हैं। घने बादलों को देख व्याकुल मोर नाच रहा है, आज क्षण क्षण पानी का दर्शन हो रहा है नए बादलों को देख श्याम की याद आ रही है जाने कौन से देश में, कौनसी प्रिया के साथ होंगे । यही सोच सोच के नया हर्ष भुलाकर रोने लगती हूं।
नलिनी जयवन्त को हमने ज्यादातर अभिनय करते ही देखा है, लेकिन उन्होने कई गीत भी गाए हैं। हिन्दी फिल्मों की शुरुआती फिल्मों की सबसे खूबसूरत और अच्छी अभिनेत्री नलिनी जयवन्त जी ने 12 वर्ष की उम्र में बतौर बाल कलाकार बहन 1941 फिल्म में अभिनय किया था और इस फिल्म में गाने भी गाए हैं। इन्हीं नलिनी जयवन्त का नाम आगे चल कर बड़ी अभिनेत्रियों में शुमार किया जाने लगा।
बहन फिल्म का निर्देशन महान निर्माता- निर्देशक महबूब खान ने किया था एवं इस फिल्म में शेख मुख्तार, प्रख्यात गायिका-अभिनेत्री , कन्हैयालाल, एवं नलिनी जयवन्त ने अभिनय किया था।
प्रस्तुत है इस फिल्म का एक अदभुत एवं दुर्लभ भजन/गीत। इसे लिखा है सफ़दर आह "सीतापुरी" नें एवं संगीत दिया है अनिल विश्वास ने।
प्रस्तुत गीत को नलिनी जयवन्त एवं हुस्न बानों ने गाया है और वीडियो में दोनों ही दिखाई भी दे रही है।
हुस्न बानो की चर्चा फिर कभी!
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ले चल अपनी नागरिया
मुझे ले चल अपनी नागरिया
गोकुल वाले साँवरिया
मुझे ले चल अपनी नागरिया
तेरे नशे में चूर रहूं
इस संसार से दूर रहूं
ये है पाप की बाजरिया
गोकुल वाले साँवरिया
शुभ दरशन दरसाता जा
राह मुझे दिखाता जा
छाई काली बादरिया
गोकुल वाले साँवरिया
शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों को एक गीत में उन के नामों का जिक्र करते हुए और उसी राग में गाना कितना मुश्किल रहा होगा ग्वालियर घराने के प्रख्यात ठुमरी गायक उस्ताद अफ़ज़ल हुसैन जयपुरी के चश्म-ओ-चिराग अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन साहब के लिए के लिए जिन्होने इस रागमाला में विभिन्न रागों के नाम लिखा और फ़िर उस अन्तरे को जिसका जिक्र उस पंक्ति में है उसी राग में गाया भी। यह है भारतीय संगीत का कमाल!
सुनिए इस सुन्दर रागमाला को।
क्या तुझपे नज़्म लिखूँ, और कैसा गीत लिखूँ
जब तेरी तारीफ़ करूँ, सुर-ताल में मीत लिखूँ
"कलावती" में तेरी छवि है, मुखड़ा रूप का दर्पण
तेरे लबों के रंग में पाए, मैंने लाली अमन
हवा में उड़ती लट का स्वागत करती "जयजयवंती"
महका-महका, खिला-खिला सा तेरा रंग बसंती
बाली कमर पे जैसे "पहाड़ी" पर घनघोर घटाएं "मेघ" से नैना सावन भादों, प्रेम का रस बरसाये
तेरी "सोहनी" मोहनी सूरत, कोमल कंचन काया
जान-ए- ग़ज़ल किस्मत से पायी, तेरे हुस्न की "छाया"
जिसमें सुखन "रागेश्वरी", रूहे-संगीत लिखूँ
क्या तुझपे नज़्म लिखूँ, और कैसा गीत लिखूं
तेरी धानर चुनरिया लहरे, जैसे मधुर बयार
प्यार का गुलशन महका-महका, तुझसे जाने बाहर
तेरी एक झलक है "काफ़ी", मुझको जान से प्यारी
चाल नशीली देखकर तेरी, रख्श करें "दरबारी"
सर से पाँव तक दिलकश, अंदाज तेरा "शहाना"
तू मेरी "गुलकली" है जानम, मैं तेरा हूँ दीवाना
तेरी चाहत दिल मे लेकर, घूमा देश-विदेश
तुझसे जब भी दूर रहा हूँ, धारा "जोगिया" भेस
सदा सुहागन "भैरवी" तुझको, प्रीत की रीत लिखूं
क्या तुझपे नज़्म लिखूं, और कैसा गीत लिखूँ
जब तेरी तारीफ़ करूं, सुरताल में मीत लिखूँ।
जुलाई महीने में सूरत में भतीजी का विवाह था और वहां पूजा घर में कौड़ियों से सजी एक इडाणी (इडोनी/इढोनी...सर पर मटकी रखने से पहले रखने वाली कपडे की रिंग) दिख गई, फोटो खींचने की वंशानुगत बीमारी के कारण मन ललचा गया तो फटाफट इडाणी के फोटो खींच लिए।
इडाणी, ईडो
रविवार को छुट्टी थी तो इडाणी के फोटो को इंस्टाग्राम पर अपलोड करने के लिए उसके विषय से मिलते जुलते टैग के लिए गूगल पर खोज की तो कुछ नहीं मिला पर अचानक वीडियो पर क्लिक हो गया और वहां जो मिला उसने मन को खुश कर दिया, वहां एक गीत मिला "मारी सवा लाख री लूम गम गई इडाणी" ।
अरे! यह गीत तो बचपन में महिलाओं को गाते बहुत सुना था। जैसे ही गीत को प्ले किया इतना आनन्द आया कि बाकी समय में उसी गीत को बार बार सुना (पहले की तरह कैसेट घिस जाने का डर नहीं था)।
इस गीत के संगीतकार पंडित शिवराम हैं जिन्होंने व्ही. शांताराम जी की "तीन बत्ती चार रास्ता" और कई फिल्मों में संगीत दिया था।
इस गीत को गाया है स्वयं पंडित शिवराम ओम पंवार (महिला स्वर) ने।
आइये सुनते हैं इस सुन्दर गीत को।
मारी सवा लाख री लूम गम गई इडाणी
इडाणी रे कारणै मैं मरूं कटारी खाय
गम गई इडाणी
मैं जाऊं किया पनघट ऊपर अब किया भरूँ मैं पाणी
हो मारूजी कियां भरूँ मैं पाणी
तू रोवै मती, घबरावै मती मारे मनड़े री तू राणी
ओ पाली रे बाजार में इडाणी जोऊँ जाय
ओ इडाणी रे कारणे मारो परण्यो पाली जाए
गम गई इडाणी.. मारी सवा री लूम
जैपर रो पौमचो ओढ़ने मैं माथे धरती इडाणी
भंवरजी माथै धरती इडाणी
बीरे ऊपर चांदी रो बैवड़ौ भर भर लाती पाणी
भंवरजी भर भर लाती पाणी
ओ इडाणी गम गया पछी मारी छाती धड़का खाय
गम गई इडाणी मारी सवा लाख ...
मारी हिवरी जड़ी मोत्यां री लड़ी सौने सूं जडूं इडाणी
हो गौरी सौने सूं जडूं इडाणी
तूं सौ नखरा सूं झूम झूम ने फेर भरेली पाणी
हो गौरी तूं फेर भरेली पाणी
ओ जैपर रा बाजार सूं इडाणी ल्यादूँ चार
ओ इडाणी रे कारणे मारो परण्यो जैपर जाए
इस बार का सावन भी यूं ही सूखा बीत गया... आँखे तरस गई उन बूंदों के लिए जिन के तन पर गिरने से तन ही नहीं मन झूम भी उठता है। लेकिन तन को शीतलता तो जब मेहा आएंगे और बरसेंगे तब ही महसूस होगी पर मन की शीतलता के लिए शास्त्रीय संगीत ने हमें बहुत से राग दिए उनमें से एक है राग "मियां की मल्हार"!
हम इस ब्लोग पर अक्सर पुराने और बहुत कम सुनाई देने वाले गीत ही सुनते हैं लेकिन इस बार नया संगीत सुनते हैं। कोक स्टूडियो में पाकिस्तान की अभिनेत्री और गायिका आयेशा ओमर ने आधुनिक वाद्य यंत्रों के साथ जुगलबन्दी का जो समा बांधा है वह मन को झूमने पर मजबूर कर देता है।
आइये सुनते हैं।
इस बार पुराने गानों की बजाय शास्त्रीय संगीत और आधुनिक वाद्ययंत्रों की जुगलबन्दी सुनते हैं। मियां की मल्हार राग आपको झूमने पर मजबूर कर देगी।
आईये सुनते हैं आयेशा ओमर को...
घन गरजत बादर आये
उमंड घुमंड कर बादर छाये
घन गरजत ...
बिजुरी चमके जियरा तरसे
मेहा बरसे छम छम छम
घन गरजत..
उमंड घुमंड घन गरजे बादर
कारे कारे
अत ही डराये
अत ही डराये कारी कारी रतियां
उमंड घुमंड घन गरजे बादर
चमक चमक
चमक चमक चमके बिजुरिया
धमक धमक धमके दामनिया
चलत पुरवाईया सनन रूम झूम
उमंड घुमंड घन गरजे बादर
झूमे बादर कारे कारे
अत ही दराये कारी कारी रतिया
मा रूम झूम
बिजुरे चमके गरजे बरसे
मेहरवा आई बदरिया
गरज गरज मोहे अतही डराये
घन गरजत ...
घनन घनन घन बिजुरी चमके
पपीहा पीहू की टेर सुनाए
का करू कित जाऊं
मोरा जियरा लरज़े
बिजुरी चमके गरजे बरसे...
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