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Friday, 17 May 2019

रूम झूम बादोलो आजि बोरोशे: कमला झारिया

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कई सालों पहले इस बांग्ला गीत का टुकड़ा मिला तब यह मुश्किल से तीस चालीस सैकंड का था, बरसों तक खोजने के बाद एक दिन आखिरकार यह  पूरा गाना मिल गया। तब से मैं इस गीत को अगड़म बगड़म गाते हुए सुन रहा था। कुछ दिनों पहले शुभ्रा जीजी (सम्प्रति : आकाशवाणी दिल्ली)
 से अनुरोध किया तो उन्होंने उस गीत के सही शब्द बता दिए,और उसके बाद गाने को सुनने का आंनद अब कई गुना बढ़ गया। बहुत बहुत धन्यवाद शुभ्रा जिज्जी।
आहा-आहा, तन-मन झूम रहा है। 
नजरुल संगीत/गायिका: कमला झारिया

रूम झूम बादोलो आजि बोरोशे
आकुल शिखी नाचे घनो मेघो दोरोशे।
बारिरो दोर्शन आजि खोने खोने। 
नोवो नीरद श्याम मुख पोड़े मोने। 
ना जानि कोन देशे, कोन प्रिया शोने। 
रोयेछे भुलिया नोवो हर्षे।

রুম ঝুম বাদল আজি বরষে
আকুল নিশি নাচে ঘন দরশে ।।

বারির দরশনে আজি ক্ষণে ক্ষণে
নব নীরদ শ্যাম রূপে পড়ে মনে
না জানি কোন দেশে কোন প্রিয়া সনে
রয়েছে ভুলিকা নটবর সে ।।



भावार्थ: आज झूम झूम कर बादल बरस रहे हैं। घने बादलों को देख व्याकुल मोर नाच रहा है, आज क्षण क्षण पानी का दर्शन हो रहा है  नए बादलों को देख श्याम की याद आ रही है  जाने कौन से देश में, कौनसी प्रिया के साथ होंगे ।  यही सोच सोच के नया हर्ष भुलाकर रोने लगती हूं।






एक और वर्जन

 

Monday, 2 June 2014

सावन गगने घोर घनघटा-एक सुंदर बांग्ला गीत

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45-46 डिग्री की गर्मी से हाल बेहाल है। इंतजार है कब बादल आएं और बरसे जिससे तन और मन को शीतलता मिले। लेकिन कुदरत के खेल कुदरत जाने, जब इन्द्र देव की मर्जी होगी तभी बरसेंगे। गर्मी से परेशान तन को शीतलता भी तब ही मिल पाएगी लेकिन मन की शीतलता! 

उस का ईलाज तो है ना हमारे पास। सुन्दर गीत सुन कर भी तो मन को शीतलता दी जा सकती है ना तो आईये आज एक ऐसा ही सुन्दर गीत सुनते हैं जिससे सुन कर मेरे तपते-तरसे मन को बहुत सुकून मिलता है, आप भी सुनिए और आनन्द लीजिए। 

 यह सुन्दर बांग्ला गीत लता जी ने गाया है और लिखा है भानु सिंह ने.. यह तो पता होगा ही कि गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगौर अपनी प्रेम कवितायेँ भानुसिंह के छद्‍म नाम से लिखते थे। यह भी भानु सिंहेर पदावली का हिस्सा है।  

इस सुन्दर गीत के बोल के लिए व्योमा मिश्रा जी को और बोल के साथ इसका सरल अनुवाद बताने के लिए शुभ्रा शर्मा दी का बहुत-बहुत धन्यवाद  

सावन गगने घोर घन घटा निशीथ यामिनी रे  
कुञ्ज पथे सखि कैसे जावब अबला कामिनी रे।  

उन्मद पवने जमुना तर्जित घन घन गर्जित मेह  
दमकत बिद्युत पथ तरु लुंठित थरहर कम्पित देह  
घन-घन रिमझिम-रिमझिम-रिमझिम बरखत नीरद पुंज  
शाल-पियाले ताल-तमाले निविड़ तिमिरमय कुञ्‍ज।  

कह रे सजनी, ये दुर्योगे कुंजी निर्दय कान्ह  
दारुण बाँसी काहे बजावत सकरुण राधा नाम  
मोती महारे वेश बना दे टीप लगा दे भाले  
उरहि बिलुंठित लोल चिकुर मम बाँध ह चम्पकमाले।
 गहन रैन में न जाओ, बाला, नवल किशोर क पास  
गरजे घन-घन बहु डरपावब कहे भानु तव दास।  

भावार्थ  

लता जी के गीत को सुनते हुए पढ़िए तो पूरा दृश्य आँखों के सामने आ जायेगा। सावन की घनी अँधेरी रात है, गगन घटाओं से भरा है और राधा ने ठान लिया है कि कुंजवन में कान्हा से मिलने जाएगी। सखी समझा रही है, मार्ग की सारी कठिनाइयाँ गिना रही है - देख कैसी उन्मद पवन चल रही है, राह में कितने पेड़ टूटे पड़े हैं, देह थर-थर काँप रही है। राधा कहती हैं - हाँ, मानती हूँ कि बड़ा कठिन समय है लेकिन उस निर्दय कान्हा का क्या करूँ जो ऐसी दारुण बांसुरी बजाकर मेरा ही नाम पुकार रहा है। जल्दी से मुझे सजा दे। तब भानुसिंह कहते हैं ऐसी गहन रैन में नवलकिशोर के पास न जाओ, बाला।

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