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Saturday, 22 July 2023

यही दुनिया हमें ढूँढेगी हम जिस दम नहीं होंगे - मुकेश के गाये कमसुने-अनसुने गीत

हिन्दी फिल्मों के महान पार्श्व गायक, अभिनेता, निर्माता एवं संगीतकार  मुकेश जी की 100वीं जन्म जयन्ति है। मुकेश जी आज हमारे बीच होते तो 100 साल के होते। दिल्ली के माथुर कायस्थ परिवार के जोरावर चन्द एवं चाँदरानी माथुर की छठीं संतान के रूप में  मुकेश का जन्म 22 जुलाई 1923 को हुआ। मेट्रिक तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्हें भी अभिनेता बनने की इच्छा हुई और 1940 में मुंबई की ट्रेन पकड़ ली।


अभिनेता तो बने पर फिल्में चली नहीं, उनकी किस्मत  में तो कुछ और लिखा था और वे आखिरकार गायक बने और उनके गाए गीत हम आज भी गुनगुनाते हैं। उनके  गाए गीतों से उनका स्वर अमर हो गया। 



बतौर पार्श्व गायक फिल्मों में पहला ब्रेक मुकेश को महान संगीतकार अनिल विश्वास ने दिया। कहा जाता है कि पहले ही गीत की रिकॉर्डिंग के समय का ध्यान मुकेश को नहीं रहा और वे बहुत देर से स्टूडियो पहुंचे तो अनिल दा ने गुस्से में मुकेश को चाँटा मार दिया था, मुकेश रो पड़े और  बाद में राग दरबारी में निबद्ध इस गीत  को स्व. कुन्दल लाल सहगल की शैली में ऐसा गाया कि गीत और मुकेश दोनों ही अमर हो गये। जानते हैं वह गीत कौनसा है? वह गीत है पहली नज़र फिल्म का "दिल जलता है तो जलने दे"!



लेकिन मुकेश सिर्फ "दिल जता है तो जलने दे", या "आ लौट के आजा मेरे मीत" नहीं थे; मुकेश सिर्फ "एक प्यार का नग़मा" नहीं थे, मुकेश सिर्फ "हमने तुझको प्यार किया है इतना या "मैं पल तो पल का शायर हूँ", ही नहीं थे, परन्तु पर जब भी मुकेश की गायकी की चर्चा होती है उन्हें बस इन गिने चुने और सुपर हिट गीतों का गायक मान लिया जाता है। मुकेश जी के कई और भी बढ़िया गीत हैं जो अब समय की गर्द में गुमनाम हो गए हैं। कई गीत ऐसे भी हैं जो हिट नहीं हुए या जो खो गए हैं या अब दुर्लभ से हो चुके हैं। 



आज हम उन गीतों की चर्चा करेंगे जिनमें से कई गीत तो कई मुकेश प्रेमियों के लिए भी संभवत: अनसुने  होंगे। 


मुकेश के गाए सबसे पहले गीत के मामले में एक और गीत का नाम लिया जाता है और वह है  "दिल ही बुझा  हुआ हो तो फ़सले बहार क्या" यह भी  गीत (गज़ल )निर्दोष फिल्म का ही है लेकिन इसके संगीतकार हैं अशोक घोष  । 


1948 की फिल्म सुहागरात का गीत है "लखी बाबुल मोरे काहे को दिन्हीं बिदेस" जिसे अमीर खुसरो ने लिखा है। 


 आराम 1951 फिल्म का गीत "जमाने का दस्तूर है ये पुराना (लता के साथ)  एवं दूसरा लाजवाब 1949 फिल्म का "ऐ  जाने जिगर दिल मे समने आ जा" ये गीत भी आप समय निकाल कर अवश्य सुनें। 


अभिनेत्री तनुजा ने  फिल्म हमारी बेटी एवं छबीली में बतौर बाल कलाकार काम किया था लेकिन नायिका के रूप में उनकी पहली फिल्म थी 1961 की हमारी याद आएगी  और इस फिल्म का गीत है “सोचता हूँ ये क्या किया मैने" एवं  दूसरा गीत है "जवां मुहब्बत हसीन आंखों में किसलिए मुस्कुरा रही है"। इस गीत में नायक जब पहले आँखों में और फिर सीने पर अंगुली रख कर कहता है "ये चाहता है तुम्हें सजा लूं, यहां छुपा लूँ, बसा लूँ- यहाँ बिठा लूँ; और उससे पहले "ये भीगी-भीगी हसीन रातें, ये प्यारी प्यारी तिहारी बातें " पंक्तिया गाता है उसके तुरन्त बाद नायिका के लिए लता जी ने आ॒ऽऽ कर जो आलाप गाया है उससे पता चलता है कि संगीतकार स्नेहल भाटकर कितने उँचे दर्जे के संगीतकार थे जो लता जी और मुकेश जी की जुगलबन्दी से कितने सुन्दर और अमर गीत रच गए!


मुकेश सिर्फ गायक या अभिनेता ही नहीं थे वरन संगीतकार भी थे, लेकिन उन्होने इस पक्ष पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया या मौके  ही नहीं मिले यह तो अब इतिहास की बातें रह गई लेकिन जब आप उनका संगीतबद्ध एवं उनका ही गाया फ़िल्म अनुराग का यह गीत  "किसे याद रखूं किसे भूल जाऊं" सुनते हैं तो पता चलता है कि कितने अच्छे संगीतकार भी थे। इस फिल्म का निर्माण भी स्वयं मुकेश ने ही किया था।



मुकेश गीतों में सबसे दुर्लभ और मधुर गीतों में से एक पर पता नहीं क्यों उतना लोकप्रिय नहीं हुआ। इन्टरनेट डेटाबेस के अनुसार इस फ़िल्म के गीत ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड “अंधकार” फ़िल्म के नाम से रिलीज़ हुए लेकिन यह फ़िल्म “ मानो या ना मानो (1955) “ के नाम से रिलीज़ हुई थी ! मास्टर जी हंसराज बहल का एक अलग ही शैली का संगीत संयोजन।



इस गीत को बहुत से मुकेश प्रेमी भी पहली बार सुनेंगे। गीत के बोल हैं "आवाज है ये प्यार की, तड़पोगी तो मुस्कुराऊंगा , तड़पा हूँ मैं, तड़पाऊंगा"।



 


 

शब्दों और स्थान की सीमा के कारण अब हम कुछ गीतों के सिर्फ मुखड़े  ही लिखेंगे।


बदरिया बरस गई उस पार_मूर्ति 1945


तय करके  पुरपेच डगरिया, ए इश्क़ चले आए हैं हम तेरी नगरिया _पहली नज़र 1945


दूर कहीं इस जग से _ बुत तराश 1947 ( हमीदा बानो के साथ)


कागज़  की मेरी नाव और दूर किनारा है_ दो दिल 1947 (सुरैया के साथ)


किसने छेड़ा मन का तार_तोहफ़ा 1947


धरती को आकाश  पुकारे_मेला 1948 (शमशाद बेगम  के साथ)


वो तीखी नज़रो से मेरे दिल पर कुछ ऐसे बिज़ली गिरा रहे हैं  जलन तो पहले ही थी मगर अब वो दर्द दिल में बढ़ा रहे हैं _वीणा 1948


मैने देखी जग की रीत मीत सब झूठे पड़ गए, एवं लो जी सुनलो तुमसे कहते हैं अब तुम बिन चैन नहीं आए_सुनहरे दिन 1949 (सुरिन्दर कौर के साथ)


ये दुनिया है यहाँ दिल का लगाना किस को आता है_शायर 1949 (लता के साथ)


जीवन सपना टूट गया एवं अब याद न कर भुल जा ए दिल वो फ़साना_अनोखा प्यार(1948)


लुट गया दिन रात का आराम क्यूं _लेख 1949


दिल  दो नैनों में खो गया_ सुनहरे दिन 1949 (सुरिन्दर कौर के साथ) और इसी फिल्म का  दो दिलों के मिल जाने का ये बहाना हो गया_ राज मुकुट 1950


जिसे हम याद करते हैं हमें उसने भूलाया है_ प्रीत का गीत 1950


पंजाबी बोलियां शैली में, काहे नैनों में कजरा भरो_ बड़ी बहू 1951 (लता जी के साथ ) 


हमें ए दिल कहीं ले चल बड़ा तेरा करम होगा_चाँदनी चौक 1954


झुकाए झुकाए बचा बचा के निशाने लगाए जाते हैं_मिस कोका कोला 1955


दम भर का दौर था खुशी का_मान 1954 


रात निखरी हुई , ज़ुल्फ़ बिखरी हुई, हर अदा तेरी  फुलों की डाली आज सुबह नहीं होने वाली _ हम हिन्दुस्तानी 1960 


काहे पगली बरखा छाई तेरे इन दो नैनन में  _ मुट्ठी भर चावल _खैयाम 1975


मुकेश जी ने गैर फ़िल्मी गीत, गज़लें एवं भजन भी गाए हैं उनमें से कुछ प्रमुख हैं- 


सुनाऊं क्या मैं ग़म अपना जबां तक ला नहीं सकता ( यह गीत फिल्म अंदाज के लिए संगीतकार नौशाद के संगीतबद्ध  किया नहीं लेकिन फिल्म में नहीं आया) 


तुझको यूँ देखा है_चाँद ग्रहण( अप्रदर्शित फ़िल्म) 


गैर फ़िल्मी गज़लें _खैय्याम 


न हुई गर मेरे मरने से तसल्ली  


हम रश्क को अपने भी गवारा नहीं करते 


अशआर मेरे यूं तो ज़माने  के लिए हैं


भजन 


सुर की गति मैं क्या जानूं गैर फिल्मी _संगीतकार-नरेश भट्टाचार्य 



मुकेश जी ने 27  अगस्त 1976 के दिन मात्र 53 वर्ष की आयु में इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह दिया। आज उनके 100वें जन्मदिन पर हम सभी मुकेश प्रेमी उनहें नमन करते हैं।




Thursday, 19 November 2020

मोती चुगने गई रे हंसी मानसरोवर तीर - तीर

भारती सिने संगीत जगत में सबसे आदरणीय संगीतकारों में से एक हैं हंसराज बहल, जिन्हें संगीत प्रेमी प्यार और सम्मान से से मास्टरजी भी कहते थे। आज ही के दिन यानि 19 नवम्बर 1916 को अम्बाला में जन्में मास्टर जी को भी किस्मत मुंबई ले आई। आपने संगीत जगत को एक से एक अनमोल गीतों को अपने संगीत से अमर कर दिया।  

Chhin Le Azadi
आज जिक्र एक भूले-बिसरे गीत का, जो मास्टर जी की शुरुआती संगीतबद्ध फिल्मों में से एक है। यह गीत है फिल्म "छीन ले आजादी" का जिसे लिखा पंडित इन्द्र चन्द्र ने और गाया है मुकेश एवं शमशाद बेगम ने। इस गीत के पहले अंतरे को जब आप ध्यान से सुनेंगे तो लगेगा कि यह स्वर मानों कुन्दन लाल सहगल साहब का हो। 

 मोती चुगने गई रे हंसी -2 
मानसरोवर तीर - तीर
मानसरोवर तीर
पंख पंख पर राजहंस ने -2
लिख दी प्रीत की पीर-2
प्यास बुझाने आई हंसी, छलक रहा था नीर-2
प्यासी रह गईं अंखियां उसकी-3
लग गया प्रीत का तीssर -2
लग गया प्रीत का तीर-2
मोती चुगने गई रे हंसी -2
मानसरोवर तीर - मानसरोवर तीर

 कभी मिटे नहीं प्यास प्रीत की, प्यासा सदा अधीर-2
जनम जनम की प्यासी हंसी -3
कैसे धरे अब धीर - धीर
कैसे धरे अब धीर
मोती चुगने गई रे हंसी -2
 मानसरोवर तीर -2 

 

 इस फिल्म (छीन ले आजादी) में गुलाम मोहम्मद और वीणा मुख्य भूमिकाओं में थे

Monday, 19 October 2020

ताजमहल मेरे ताज : सचिन दा का अनसुना-कमसुना गीत

सचिन देव बर्मन दा के गाए गीतों की सूचि बनाए जाए तो हमें यह गीत ध्यान में आते हैं
उम्मीद भरा पंछी-8 दिन
सुन मेरे बंधु रे - सुजात
मेरे मांझी हैं उस पार - बन्दिनी
वहाँ कौन है तेरा - गाईड
अल्लाह मेघ दे - गाईड
काहे को रोये - आराधना
मेरी दुनिया है माँ तेरे आंचल में - तलाश
प्रेम के पुजारी हम हैं- प्रेम पुजारी
जिन्दगी ए जिन्दगी - जिन्दगी जिन्दगी
डोली में बिठाय के - अमर प्रेम 

 
यह सब बहुत ही हिट गीत हैं और अक्सर कहीं न कहीं सुनाई दे जाते हैं। लेकिन कुछ गीत ऐसे भी होंगे जिन्हें हमने अब तक नहीं सुने होंगे। ऐसा ही एक गीत आज आपके लिए प्रस्तुत है। यह गीत 1941 की फिल्म ताजमहल का है और इसके संगीतकार हैं मधुलाल दामोदर मास्टर! 
यह 1941 की फिल्म ताजमहल का गीत है इसमें संगीतजगत के दिग्गज संगीतकार सचिन दा ने मधुलालजी के लिए गाया है। 

 
प्रेम की प्यारी निशानी
जाग रही सर पे बादल ताज
रुक मुसाफिर आँसूओं की
भेंट चढ़ा ले आज
सर पे बादल ताज
 
आहें, आहें तुम्हारी ऎ शाहजहाँ
रख गयी ये प्रेम का निशान
मौत जीत के तुम ही बसाए
यहाँ प्रेम का राज
ताजमहल मेरे ताज-2 
 
प्रेम की रानी कहाँ मुमताज़
पिया के अभिमान
तुम्हारी याद करे करे रोये
प्यारा हिन्दुस्तान
आँसू बहावओ आगे जमुना
जमुना, जमुना
चमेली, कुसुम रोये अपना
चमेली, चमेली, चमेली
बुझ गयी शम्मा महफ़िल की
पडे रह गये साज़
ताजमहल मेरे ताज

   


मधुलाल जी हिन्दी फिल्म जगत के सबसे पहली पीढी के संगीतकारों में से एक हैं। आप के ऑरकेस्ट्रा में सज्ज़ाद साहब और नौशाद साहब जैसे दिग्गज संगीतकार वाद्ययंत्र बजाया करते थे। पंकज राग की पुस्तक "धुनों की यात्रा का यह अंश" देखिए।




 मधुलाल जी की कहानी-उन्हीं की जबानी
 

Sunday, 11 October 2020

आदमी वो है मुसीबत से परेशान ना हो: एक भूला बिसरा गीत


आपने  मिनर्वा मूवीटोन की और 1950 की फिल्म शीशमहल का गीत "हुस्न वालों की गलियों में जाना नहीं-ज़हर खाना मगर दिल लगाना नहीं" जिसे शमशाद बेगम ने गाया है; बहुत बार रेडियो पर सुना होगा, लेकिन इसी फिल्म में एक  और गीत है जो इस गीत से कहीं ज्यादा सुरीला है लेकिन (कभी कभार रेडियो शिलॉन को छोड़ कर) पता नहीं क्यों यह गाना कहीं सुनाई नहीं देता । 
इस गीत को पद्‍मश्री पुष्पा हंस ने गाया है और फिल्म में अभिनय भी किया है।
इस फिल्म की एक और खास बात यह है प्रसिद्ध गीतकार प्रेम धवन और संगीतकार ने इस फिल्म में नृत्य निर्देशन भी किया था।
आईये सुनते हैं इस मधुर गीत को।

आदमी वो है मुसीबत से परेशान ना हो-2
कोई मुश्किल नहीं ऐसी के जो आसान ना हो-2
आदमी वो है मुसीबत से परेशान ना हो 

ये हमेशा से है तक़दीर की गर्दिश का चालन-2
चाँद सूरज को भी लग जाता है एक बार ग्रहण 
वक़्त की देख के तब्दीलियां हैरान ना हो- 2 
आदमी वो है मुसीबत से परेशान ना हो 

ये है दुनियां यहाँ दिन ढलता है शाम आती है- 2 
सुबह हर रोज नया ले के पयाम आती है 
जानी बुझी हुई बातों से तू अन्ज़ान ना हो 
आदमी वो है मुसीबत से परेशान ना हो 
कोई मुश्किल नहीं ऐसी के जो आसान ना हो
आदमी वो है मुसीबत से परेशान ना हो

गीतकार : शम्स लखनवी एवं बेज़ाद लखनवी
संगीतकार: वसंत देसाई 
फिल्म: शीशमहल 1950












Saturday, 29 August 2020

इक तू के सर उठा के चला दाग़ दिखाने -मुकेश जी का भूला बिसरा गीत

            

मुकेश जी के गाए गीतों की जब भी चर्चा होती है उनके हिट गीतों की ही चर्चा होती है जिन्में मुकेश ने शंकर जयकिशन, नौशाद, अनिल विश्वास, रोशन जैसे दिग्गज संगीतकारों के लिए गाया है। वे गीत भी हिट हुए और बहुत सारी फिल्में भी।

मुकेश जी के कई और भी बढ़िया गीत हैं उनमें से कुछ अभी याद आ रहे हैं जिनमें से कुछ मैने पहले पोस्ट किए हैं जैसे  सुहागरात फिल्म का  गीत - "लखि बाबुल मेरे काहे को दिन्ही बिदेस, 1956 की फिल्म अनुराग एवं स्वयं मुकेशजी का संगीतबद्ध  गीत किसे याद रखूं, किसे भूल जाऊं। कुछ और भी हैं जैसे -सोचता हूँ ये क्या किया मैने - हमारी याद आएगीलुट गया दिन रात का आराम क्यूं  (आराम 1949) जीवन सपना टूट गया - अनोखा प्यार, अशआर मेरे यूं तो ज़माने के लिये है-गैर फ़िल्मी गज़ल आदि! लेकिन अभी भी बहुत से दुर्लभ गीत कभी कभार सुनाई दे ही जाते हैं जिन्हें सुनते ही लगता है अरे! यह तो हमने कभी सुना भी नहीं था।

शायद यूट्यूब न होता तो हम इन्हें कभी सुन भी नहीं पाते। देश विदेश में भारतीय एवं हिन्दी फिल्मों के गीतों के शौकीनों ने इन्हें यूट्यूब पर अपलोड कर इन दुर्लभ गीतों को हमें फिर से  सुनने का मौका दिया है जो कहीं खो से गए थे।

आज इस कड़ी में एक बहुत ही दुर्लभ गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह एक अप्रदर्शित फिल्म  मोनिका 1940 का है और इसे संगीतबद्ध किया है सुशान्त बनर्जी (एस बनर्जी ) ने। संभवत: अगर यह फिल्म प्रदर्शित हो जाती तो मुकेश जी का पहला गीत - "दिल जलता है तो जलने दे" न होता।

खैर इस खुबसूरत गज़ल शैली के गीत को सुनिए... एक और भूला बिसरा गीत अगली कड़ी में



एक और वीडियो


 

इक तू के सर उठा के चलाsss-2
दाग़ दिखाने
इक वो के चार चाँद, लगाये हैं हया ने
इक तू के सर उठा के चला
क्या देख लिया तूने मेरे चाँद को ए चाँद
चाँद को ए चाँद
क्या देख लिया तूने मेरे चाँद को ए चाँद
आँचल में जो बदली के चला
मुंह को छिपाने
इक तू के सर उठा के चला


तुझ को तो कुछ खबर ही नहीं -3
ए ज़मीं के चाँद
तारों की, तारों कीssss
तारों की ज़ुबान पर भी हमारे हैं फसाने
इक तू के सर उठा के चला


तू भी उसी को ढूंढ रहा है लिए चिराग़-2
आती है आती है ss
आती है जिसकी याद
मेरे दिल को दुखाने
इक वो के चार चाँद
लगाये हैं हया ने

इक तू के सर उठा के चला

दाग़ दिखाssssने

 

Thursday, 14 May 2020

हमें भाभीजी आ को मिल गई: एक मीठा-मिठाईयों वाला गीत

 हिन्दी फिल्मों के सबसे सफल और सबसे मधुर संगीत देने वाले संगीतकारों में से एक नौशाद साहब के बारे में बहुत लिखा-पढ़ा-सुना जा चुका; लेकिन उनके शुरुआती संगीतबद्ध गीतों में से बहुत से अब भी उनके चाहकों के लिए अनसुने होंगे।

 इस श्रेणी का एक मस्तीभरा गीत सुनिए।  यह गीत कोरस गीत है इसलिए इसे किस गायक ने गाया है इसकी जानकारी नहीं मिलती।

इस गीत में कलाकार भाभीजी के आने की खुशी में झूमते हुए पेठा- पतीसा-मखाने-जलेबियाँ मिलने की उम्मीद कर रहे हैं।
आईये सुनते हैं।

यह गीत फिल्म नई दुनिया 1942 का है और इसी फिल्म से हिन्दी फिल्म जगत को (बेबी) सुरैया जैसी गायिका मिली जो  बाद में बड़ी अभिनेत्री-गायिका बनीं। सुरैया ने इसमें पह्ली बार "बूट करूँ में पालिश ओ बाबूजी" गीत गाया। हालांकि इसी वर्ष (1942) की एक और फिल्म ’शारदा"; नई दुनिया से पहले रिलीज हुई थी इसलिए कई फिल्म इतिहासकार शारदा के गीत "पंछी जा पीछे रहा बचपन मेरा" को पहला गीत मानते हैं।

बोलो छूम छ न न न न न छई - 2
छ छ छई छ छ छई छ छ छई- 2
छई
हमें भाभी जी आ को मिल गई छ छ छई-2
बोलो छूम छ न न न न न छई -2

अब आएगी रोज़ मिठाई रे सजनवा
आएगी रोज़ मिठाई
हम खाएँगे प्रेम से भाई -2
कहो मैंने ये कैसी बात कही-2
ओ बोलो
छूम छ न न न न न छई -2
छई
हमें भाभी जी आ को मिल गई छ छ छई
बोलो छूम छ न न न न न छई

भाभी अपनी छे सुंदर नारी जी वाह वाह
अपनी छे सुंदर नारी
तेरी सूरत छे घणी प्यारी -2
त त थई त त थई त त त त त त थई -2
बोलो छूम छ न न न न न छई
छ छ छई छ छ छई छ छ छई- छई
हमें भाभी जी आ को मिल गई छ छ छई
बोलो छूम छ न न न न न छई

जब पेठा पतीसे आएंगा
ओ डीयर जब पेठा पतीसे आएंगा
वैल हम भी तो खूब खाएंगा- 2
हा ह ह हा ह ह ह ह ह हई -2
बोलो छूम छ न न न न न छई
छ छ छई छ छ छई छ छ छई- छई
हमें भाभी जी आ को मिल गई छ छ छई
बोलो छूम छ न न न न न छई

गरमा गरम जलेबियाँ मखाने नि जे बिंदिए
गरम जलेबियाँ मखाने
असी खवांगे हूण रब्ब जाने -2
अग्गे मिल्दी सी सानु रोटी बई -2
बोलो छूम छ न न न न न छई
छ छ छई छ छ छई छ छ छई-छई
हमें भाभी जी आ को मिल गई छ छ छई
बोलो छूम छ न न न न न छई

आ भाई अच्छा अच्छा है ये मेरा बाणी बखाना
भाई अच्छा अच्छा है ये मेरा बाणी
भाभी मिला है अति लासानी -2
पुईओ पुईओ , खाना पुईओ
खाना पुईओ, खाना पुई
पुईओ पुईओ, खाना पुईओ
खाना पुईओ, खाना पुई
बोलो छूम छ न न न न न छई
छ छ छई छ छ छई छ छ छई-छई

हमें भाभी जी आ को मिल गई छ छ छई -2
बोलो छूम छ न न न न न छई-2


फोटो एवं पोस्टर मूवीज गूगल से साभार


Saturday, 28 September 2019

लता मंगेशकर-90: कुछ कम सुने-कुछ अनसुने गीत




संसार के सबसे कठिन प्रश्नों में से एक है कि किसी को लता मंगेशकर के 5-10-15-20-25 बढिया गीत चुनने को कहा जाए। मैने भी आज इस कठिन प्रश्न पत्र को हल करने की कोशिश की है। घण्टों तक मेहनत करने के बाद इतने ही गीत याद आए।

 इन गीतों में "आएगा आने वाला" जैसे मधुर पर बहुत चर्चित गीतों को शामिल करने से बचने की कोशिश की है (कुछ हुए भी हैं), और उन गीतों को शामिल करने की कोशिश की है जो थोड़े कम प्रचलित हैं या रेडियो-टीवी पर कम सुनाई-दिखाई देते हैं।

 इस सुचि में कुछ गीत और संगीतकार तो ऐसे भी हैं जिनके न तो नाम एकदम ही अंजाने से हैं जैसे कि वी डी बर्मन, या कुछ ऐसे भी हैं जिन्होने बहुत ही कम गीतों को संगीतबद्ध किए जैसे मन्ना डे, कनु घोष एवंअमरनाथ! बहुत से दूसरी भारतीय भाषाओं के और गैर फिल्मों के गीत भी है हिन्दी के गीतों की सुचि लम्बी हो जाने की वजह से दो ही गीत शामिल हो पाए। इनमें से कई गीतों को मैने अपने इसी ब्लॉग पर भी पोस्ट किए हुए हैं।


तूने जहाँ बना कर अहसान क्या किया है?

माँ का प्यार1949/गोविंदराम/ आई.सी.कपूर


रात जा रही है नींद आ रही है

उध्दार/पं.वसंत देसाई/पं.नरेन्द्र शर्मा


 सपना बन साजन आये

शोखियाँ/जमाल सेन/केदार शर्मा


 है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ

आँधियाँ/उस्ताद अली अकबर खाँ/ पं. नरेन्द्र शर्मा


 दर्दे दिल तू ही बता

जश्न 1959/रोशन/राजेन्द्र कृष्ण


 घर आजा मोरे राजा; तेरे बिन चंदा उदास फ़िरे

गरम कोट 1955/अमरनाथ/मजरूह सुल्तानपुरी


 हमारे बाद महफ़िल में ये अफ़साने बयाँ होंगे

बागी1953/मदन मोहन /मज़रूह सुल्तानपुरी


 जब तक जागे चाँद गगन में..

शिव कन्या 1954/ मन्ना डे/भरत व्यास


 साजन बिन निन्द ना आवे बिरहा सतावे

मुनीमजी/ सचिन देव बर्मन


 बदनाम ना हो जाऊं ए आस्मां

चार पैसे 1959/वी डी वर्मन


 माझी मेरी नैया को जी चाहे जहाँ ले चल

चार पैसे1959/वी डी बर्मन


 कैसे दिन बीते कैसे बीती रतिया पिया जाने ना

अनुराधा/पण्डित रविशंकर


 दुनिया हमारे प्यार से यूं ही जवां रहे

लाहौर1949/ श्याम सुन्दर


 चंदा रे जा रे जा रे जिद्दी

1948/ खेमचन्द प्रकाश/ प्रेम धवन


 ओ लेने वाले उस देने वाले के दाता के गीत क्यूं गाता नहीं

कारीगर1958/सी रामचन्द्र/राजेन्द्र कृष्ण


 बीता हुआ एक सावन एक याद तुम्हारी

ले देके ये दो बातें दुनिया है हमारी

शोखियाँ/ जमाल सेन/(पहले कदम) (unrealides)

 


हुई ये हम से नादानी तेरी महफ़िल में जा बैठे

ज़मीन की खाक़ होकर आसमान से दिल लगा बैठे

चोर बाजार 1954/ सरदार मलिक/ शकील बूंदायूंनी


ए दिल ए बेक़रार जैसे भी हो गुज़ार

मांग1950/ गुलाम मोहम्मद/ सगीर उस्मानी


 गरीबों का हिस्सा गरीबों को दे दो

लाड़ली1949/ अनिल विश्वास /सफ़दर आह

 ना ना बरसो बादल आज बरसे नैन से जल

सम्राट पृथ्वीराज चौहान/ पं.वसन्त देसाई/ भरत व्यास

 कहाँ जाते हो, टूटा दिल, हमारा देखते जाओ

किए जाते हो हमको बेसहारा, देखते जाओ

नया जमाना 1957 /कनु घोष/ प्रेम धवन

 ऋतु आए ऋतु जाए सखी री, मन के मीत न आए

हमदर्द/ अनिल विश्वास / प्रेम धवन

 दिल-ए-नाशाद को जीने की हसरत हो गई तुम से

मुहब्बत की कसम हम को मुहब्बत हो गई तुम से

चुनरिया 1948/ हंसराज बहल

 भूल सके न हम तुम्हें, और तुम तो जाके भूल गये

रो रो के कहता है दिल , क्यों दिल को लगा के भूल गये

तमाशा1952/ मन्ना डे /भरत व्यास

 जा रे चंद्र, जा रे चंद्र, और कहीं जा रे-२

गोकुल के कृष्ण चंद्र जायेंगे सकारे

सजनी/सुधीर फड़के/पं. नरेन्द्र शर्मा

 ऐसे हैं सुख सपन हमारे

रत्नघर 1955/ सुधीर फड़के/पं. नरेन्द्र शर्मा

 ऐ प्यार तेरी दुनिया से हम बस इतनी निशानी लेके चले

एक टूटा हुआ दिल साथ रहा, एक रोती जवानी लेके चले

झांझर1953/सी रामचन्द्र/राजेन्द्र कृष्ण

 नववधू प्रिया मी बावरते, लाजते पुढ़ते सरते, फिरते

कळे मला तू प्राण सखा जरी तूज वाचूनि संसार फुका जरी

Marthi Bhav Geet

 सावन गगने घोर घनघटा

बंग्ला/Timira Daur Kholo

Monday, 2 September 2019

दाईम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं; पं.एसडी बातिश की भूली बिसरी गज़ल


हम सबने फिल्म “बरसात की रात” की मशहूर कव्वाली “ना तो कारवां की तलाश है” सुना ही है, उसे कई महान गायकों ने गाया है लेकिन उनमें एक स्वर ऐसा भी है जिनके हिस्से कुछ ही लाईनें आई है, लेकिन वे उतने में ही कमाल कर देते हैं- यह स्वर है  पंडित शिव दयाल बातिश जी का जिन्हें हम एस डी बातिश के नाम से भी जानते हैं
1914 में पटियाला में जन्मे एस डी बातिश ने कई गैर फिल्मी-फिल्मी गीत गाए-संगीतबद्ध किए, पंडित अमरनाथ के सहायक रहे अमरनाथ जी का संगीतबद्ध  “खामोश निगाहें ये  सुनाती  है कहानी, लो आज चली ठोकरे खाने को जवानी –दासी 1944 जैसे कई सुन्दर गीत गाए। 1949 में अनिल विश्वास के संगीत में फिल्म लाड़ली का गीत “इसी रंगीन दुनियां में क्या क्या जिंदगी देखी-रुला दे गम को भी एक बार ऐसी जिंदगी देखी”  एवं  “आँखे कह गई गई दिल की बात,  वो काली मतवाली आँखें/ जिनकी अनोखी घात/आँखें कह गईं दिल की बात” जैसे शानदार गीत  गाए। 


1952 में बेताब फिल्म में संगीत दिया एवं संगीतबद्ध फिल्म बेताब  में “देख लिया तूने गम का तमाशा गीत गाया। बहू बेटी फिल्म में एक गीत “मोसे चंचल जवानी संभाली नाही जाए” उस जमाने के हिसाब से अश्लील होने की वजह से हटा दिया गया। तलत महमूद से उनके सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक “खामोश है सितारे और रात रो रही है” (हार जीत-1954) गवाया। इस फिल्म में प्यारेलाल (लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल) उनके सहायक थे।
 तूफान 1952 में जलाकर आग दिल में जिंदगी बरबाद करते हैं, न हंसते हैं न  रोते हैं न कुछ फरियाद करते हैं  एवं दुनियां शिकायत कौन करे अरमान भरा दिल टूट गया ये कौन आया चुपके चुपके खु्शियों के चमन को लूट गया” बहुत ही सुंदर गीत संगीतबद्ध किए और गाए ।

शास्त्रीय संगीत के प्रकांड विद्वान बातिश जी ने भजन, गीत, गज़ल, ठुमरी एवं फिल्म संगीत सभी गाए  लेकिन उनको संगीत जगत ने उन्हें बहुत जल्दी भूला दिया। आजकल रेडियो पर न उनके गाए गीत सुनाई देते हैं न उनके संगीतबद्ध ही!
आज मैं उनकी गाई हुई एक गैर फिल्मी “दायम पड़ा हुआ तेरे सर पर नहीं हूं मैं”  गज़ल सुना रहा हूँ जिसे लिखा है “मिर्ज़ा गा़लिब” مرزا اسد اللہ خان  ने और संगीतबद्ध किया स्वयं एस डी बातिश ने।

दाईम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं
खाक़ ऐसी जिन्दगी पे के पत्थर नहीं हुँ मैं
क्यों गर्दिशें मदाम से घबरा ना जाए दिल
इन्सान  हूँ हाय इन्सान हूँ पियाला-ओ-सागर नहीं हूँ मैं
रखते हो तुम कदम मेरी आँखों से क्यूँ दरेग
रुतबे में मेहर-ओ-माह से कमतर नहीं हूँ
करते हो मुझ को मना-ए-क़दम बोस किस लिए
क्या आसमां के भी बराबर नहीं हूँ मैं

एस डी बातिश के संगीतबद्ध एवं गाए हुए अन्य गीतयहाँ सुने।

दाइम-दायम = eternal गर्दिश-ए-मदाम eternal movement हमेशा होने वाली गर्दिश या चक्कर
दरेग = hesitation /संकोच ,  मेहर-ओ-माह- सूरज-चाँद , बोस-बोसा- चूमना

अर्थ रेख़्ता के सौजन्य से

Wednesday, 21 August 2019

मोरे सैयां तो है परदेस- मैं क्या करूं सावन को- हिन्दी फिल्मों में वर्षा, सावन एवं विरहिणी नायिका




“मोरे सैयां तो है परदेस- मैं क्या करूं सावन को”
हिन्दी फिल्मों में वर्षा, सावन एवं विरहिणी नायिका

वैशाख और जेठ महीने की तपती दुपहरियों के बाद जैसे ही आषाढ़ और उसके बाद सावन का आगमन होने लगता है और धरती पर बारिश की बूंदें गिरती है, वातावरण में शीतलता छाने से भीषण गर्मी से राहत मिलती है। बारिश की बूँदें जैसे ही मिट्टी में घुलती है; सौंधी-सौंधी महक हर तरफ फैल जाती है । पेड-पौधे झूम-झूम कर मानों मेघों का-बरखा का  स्वागत करते दिखते हैं। वर्षा हर किसी को आत्मिक आनंद से  सराबोर करने लगती हैं। 
वर्षा ऋतु का भारतीय जनजीवन में बहुत बड़ा महत्व है। वर्षा की बूंदें किसानों के मन में भी  उत्साह का संचयन करती हैं। वर्षा ऋतु भारतीय जीवन परंपरा और साहित्य और फिल्मों में भी गहरा प्रभाव दिखता है। रामचरित मानस में भगवान श्रीराम अनुज लक्ष्मण से कहते हैं- 
"बरषा काल मेघ नभ छाए -  गरजत लागत परम सुहाए"
 शायर परवीन शाकिर कहती हैं – “बारिश हुई तो फूलों के तन चाक हो गए-मौसम के हाथ भीग के सफ़्फ़ाक हो गए”
मलिक मोहम्मद जायसी अपने ऋतु वर्णन में कहते हैं-
रँग-राती पीतम सँग जागी।
गरजे गगन चौंकि गर लागी॥
सीतल बूँद, ऊँच चौपारा।
हरियर सब देखाइ संसारा॥

हिन्दी फिल्मी गीतों में भी गीतकारों ने एक से एक  लाजवाब वर्षा गीत लिखे हैं और संगीतकारों ने उन्हें इतनी सुन्दरता से विभिन्न रागों में ढा़ल कर  फिल्मों में पेश किया है कि वे गीत अमर हो गए हैं, पर आज हम उन गीतों का जिक्र नहीं कर रहे, आज बात हो रही है उन हिन्दी फिल्मों के उन वर्षा-विरह गीतों की जिनमें नायक अपनी नायिका को अकेले छोड कर परदेस गया हुआ है या जा रहा है। वर्षा होने के  बाद या बादल छाने पर नायक को याद करते हुए कभी बादल, कभी पपीहे तो कभी कोयल से कहती है-“जारे जारे ओ कारी बदरिया- परदेस गए हैं मोरे साँवरिया”!

हिन्दी फिल्मों के सबसे पुराने गीतों में से सबसे पहले जो गीत याद आता है वह है १९३८ की फिल्म भाभी का गीत- झुकी आई रे बदरिया सावन की!  इस गीत में विरह की नायिका  बारिश में कूकते पपीहे को कहती है – सुन रे हठी पपीहा पापी-पी को नाम न ले-सुन पावै कोई बिरहा की नारी, पी कारन कीजे”।

१९४४ की सुपरहिट फिल्म रतन में दो  गीतों के माध्यम से दु:खी नायिका अपना दर्द बादलों/वर्षा की बूंदों/सावन के सामने व्यक्त कर रही है- पहले गीत में  नायिका कहती है  - “रुम झुम बरसे बादरवा, मस्त हवाएं आई/ पिया घर आजा आजा/ काले काले बादल घिर-घिर आ गये आ गये/ ऐसे में तुम जाके जुलमवा ढा गये-ढा गये” और दूसरे गीत “सावन के बादलों/ उनसे ये जा कहो/ तक़दीर में यही था/ साजन मेरे ना रो” में तो नायिका ही नहीं विरह का  मारा नायक भी बारिश से कहता है- “छेड़ो ना हमें आ के/ बरसो कहीं और जा के/बरसो कहीं और जा के/ वो दिन ना रहे अपने- रातें ना रहीं वो/ सावन के बादलों”।

१९४५ की फिल्म गर्ल (गाँव की गोरी) के गीत “किस तरह भूलेगा दिल” की नायिका काली घटाओं से ना बरसने को कहती है- “ओ घटा काली घटा अब के बरस तू ना बरस/ मेरे प्रीतम को अभी परदेस है भाया हुआ”।

१९४५ की ही फिल्म मूर्ति का गीत है “बदरिया बरस गई उस पार” की नायिका कोयलिया से चिढ़ कर उलाहना देती है “कूक-कूक कर कूक कोयलिया/अपना पिया बुलाए/सोए दर्द जगा मत बैरन/याद किसी की आए मेरे मन के सूने द्वार”!

१९५१ की फिल्म शोखियां जिसके संगीत महान संगीतकार  जमाल सेन साहब थे; के गीत पड़े बरखा फुहार पड़े बूंदन फुहार में नायिका कह रही है, “दैया उन बिना कछु भाए ना सखी/ नैना तपत बालम बिना- गले मिलन को ब्याकुल सारे”।

१९४९ की फिल्म लेख  में भी दो गीतों में नायिक के विरह की पीड़ा दिखती है, पहले गीत- “बदरा की छाँव तरे/ नन्हीं-नन्हीं बून्दियाँ/ हिल-मिल बैठें दोनों यहीं मन भाये रे"  नायिका गाते हुए कहती है – “आई बहार बलमा मन नाहीं माने- तुझ बिन सैयां मोहे सूना जग लागे”। इसी फिल्म के एक और गीत –“सावन की घटाओं मेरे साजन को बुला दो” में नायिका घटाओं से कहती है –“आँसू मेरे ले जाओ ले जा के दिखा दो/ सावन की घटाओं/ कहना के तेरी याद में रोती हैं ये आँखें”।

१९५३ की फिल्म हमदर्द  में संगीतकार अनिल विश्वास ने एक ४ अलग -अलग राग क्रमश: गौड सारंग-गौड मल्हार-जोगिया और बहार को मिलाकर एक सुन्दर रागमाला बनाई है, इस रागमाला के गीत ऋतु आए सखी ऋतु जाए सखी री मन के मीत न आए में नायिका दूसरे हिस्से यानि बरखा ऋतु वाले गीत में कहती है  “बरखा ऋतु बैरी हमार/ जैसे सास ननदिया/ पी दरसन को जियरा तरसे/ अँखियन से नित सावन बरसे/ रोवत है कजरा नैनन का/ बिंदिया करे पुकार/ बरखा ऋतु बैरी हमार”। यह गीत हिन्दी फिल्मों की सबसे सुन्दर रागमालाओं में से एक है और कहा जाता है कि इस गीत के लिए संगीतकार अनिल विश्वास ने लता मंगेशकर एवं मन्ना डे से १४ दिनों तक रियाज़ करवाया था।  महफिल पर  पोस्ट "ऋतु आये ऋतु जाये सखी री... चार रागों में ढ़ला एक शास्त्रीय गीत"

१९५३ की ही फिल्म मयूरपंख के गीत में नायिका शिकायत करते हुए कहती है  “ये बरखा बहार- सौतनिया के द्वार न जा साँवरे न जा मोरे साँवरे पिया”।

१९५५ की फिल्म पहली झलक के गीत “कैसे भाये सखी ऋत सावन की” में नायिका कह रही है “छम छम छम छम बरसत बदरा/ रोये रोये नैनों से बह गया कजरा/ आग लगे ऐसे सावन को/ जान जलावे जो विरहन की/ कैसे भाये सखी रुत सावन की”।

१९५५ में सलिल चौधरी ने फिल्म ताँगेवाली फिल्म के अपनी ही बांग्ला फिल्म पाशेरबाड़ी के गीत “झिर-झिर बरोशाय हाय कि बोरोशा” के संगीत पर आधारित एक गीत “ रिमझिम रिमझिम झिम बरसे- नैना मोरे तरसे” संगीतबद्द किया है, इस गीत में नायिका “आशा के द्वार खड़ी खड़ी- राह तोरी देखूँ घड़ी-घड़ी” कहते हुए अपनी पीड़ा  व्यक्त करती है –“तरसाए सावन की झड़ी तेरे बिना सूना जग साँवरिया”।

१९५५ की फिल्म आजाद के गीत “जारे जारे ओ कारी बदरिया” में नायिका को कारी बदरिया अपने साँवरिया की याद दिला रहे हैं तो वह दु:खी हो कर उनसे कहती है “मत बरसो रे मेरी नगरिया- परदेस गए हैं साँवरिया”!

१९५६ की फिल्म जागते रहो की नायिका, नायक के साथ होकर भी नहीं है! नायक को उसके होने-न-होने की कोई परवाह नहीं है और वह उसे ठुकरा कर जाने लगता है तो नायिका कहती है  “ठण्डी-ठण्डी  सावन की फुहार/ पिया आज खिड़की खुली मत छोड़ो”। इस गीत में नायिका पपीहे के प्रेम से अपने प्रेम की तुलना करती हुई कह रही है  “पपीहे ने मन की अगन बुझा ली/प्यासा रहा मेरा प्यार”!

१९५९ की फिल्म कन्हैया की नायिका की पीड़ा और अलग ही है, वह कहती है- “सावन आवन कह गए कर गए कौल अनेक/गिनते-गिनते घिस गई ऊँगलियों की रेख”!

१९६१ में नई पीढ़ी के ’छोटे नवाब’ राहुल देव बर्मन संगीतकार बने और उन्होने अपनी पहली ही फिल्म “छोटे नवाब” में कमाल कर दिखाया। जब भी इस फिल्म की बात होती है तो एक ही गीत याद आता है – घर आजा घिर आए बदरा साँवरिया/ मोरा जिया धक-धक रे चमके बिजुरिया”!

७० और ८० के दसक में सावन, वर्षा और विरह की मारी नायिकाओं के गीत उतने नहीं आए; जो आए वे इतने मधुर या लोकप्रिय नहीं थे फिर भी  बीच बीच में कुछ गीत आते रहे जैसे १९७४ की फिल्म “रोटी कपड़ा और मकान” का गीत हाय हाय ये मजबूरी इस गीत की आधुनिक नायिका की शिकायत है कि “ये मौसम और ये दूरी/मुझे पल-पल है तड़पाए/ तेरी दो टकिया की नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाए”।

१९७७ में एक और शानदार फिल्म बनी थी “आलाप” इस फिल्म में अभिनय के साथ इसके गीत “कोई गाता मैं सो जाता” की अक्सर चर्चा होती है, रेडियो पर भी सुनाई देता रहता है लेकिन इसी फिल्म में एक गीत और था “आयी ऋतु सावन की पिया मोरा जा रे/ आयी ऋतु सावन की” यह हिन्दी फिल्मों के सबसे अच्छे विरह गीतों में से एक है। इसमें जिसमें विरह की मारी नायिका की पीड़ा  इन शब्दों में व्यक्त होती है (फिल्म में नायक पर फिल्माया गया है) बैरन बिजुरी चमकन लागी/बदरी ताना मारे रे ऐसे में कोई जाए पिया तू रूठों क्यों जाए रे”। इसी गीत में नायिका- नायक से शिकायत करती हुई कहती है ऋतु सावन की आई है और जब सब घर आ रहे हैं तुम ही एक अनोखे हो जो बिदेस जा रहे हो। देखिए कितने सुन्दर शब्दों में इस पीड़ा को व्यक्त किया गया है।  “तुम ही अनूक बिदैस जवैया/ सब आये हैं द्वारे रे/ ऐसे में कोई जाए पिया/ तू रूठो क्यों जाए रे”!

फिल्मों में सावन/वर्षा और विरह पर आधारित गीतों पर इतने सारे गीत बने हैं कि इन सभी का जिक्र करने पर एक पोथी तैयार की जा सकती है पर हमने यहाँ कुछ गिने-चुने गीतों का ही जिक्र किया है। उम्मीद है कि इनमें से कई गीत आपने नहीं सुने होंगे-पहली बार सुनेंगे और वह आपके तन-मन को आनंदित जरूर करेंगे।

Tuesday, 20 August 2019

अकेले में वो घबराते तो होंगे:शर्मा जी यानि खै़याम साहब का संगीतबद्ध गीत


मधुर संगीत के दौर की आखिरी कड़ी थे ख़ैयाम साहब, इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह गए।  रहमान वर्मा के साथ मिलकर ख़ैयाम साहब ने “शर्माजी-वर्माजी के नाम से जोड़ी बनाई और 1948 में हीर रांझा  फिल्म में संगीत दिया और गाना भी गाया “दिल यूं-यूं करता है”!  बाद में वर्माजी यानि रहमान वर्मा ने पाकिस्तान जाना पसन्द किया और वहाँ बड़े संगीतकार बने और शर्माजी यानि खैय्याम साहब यहाँ रह गए।
 शर्मा जी के नाम से ख़ैयाम साहब ने कुछ फिल्मों में गाने भी गाए जो बहुत प्रसिद्ध नहीं हुए जैसे – रसीली फिल्म का गीत  “नेह लगा के मुख मोड़ गया” जो उन्होने गीतारॉय के साथ गाया था इसके संगीतकार थे –हनुमान प्रसाद।
ख़ैयाम साहब ने बहुत कम फिल्मों में संगीत दिया पर जितना भी काम किया उत्कृष्ट काम किया। ज्यादातर सुनाई देता रहता है। पर कुछ गीत  ऐसे भी हैं जो कभी सुनाई नहीं देते जैसे – आशा भोंसले का गाया हुआ फिल्म “धोबी डॉक्टर”  का “पीहू पीहू बोले पपीहरा, आजा बदली के संग  मोरा जिया डोले रे” एवं “झिलमिल झिलमिल तारे नील गगन में प्यार मेरे मन में झिलमिल”।
शर्मा जी- वर्माजी की जोड़ी के बाद भी  भी उन्होने धनीराम के साथ मिलकर गुलबहार 1954में संगीत दिया। तलत महमूद साहब के प्रशंसकों में से भी बहुतों ने  गीत “गर तेरी नवाजिश हो जाए” और तातार का चोर 1955 का गीत “कफ़स में डाला मुझेअपने राज़दारों नें” जैसे गीत नहीं सुने होंगे।
 एक गीत जो अपने दौर में बहुत हिट हुआ लेकिन आजकल कम सुनाई देता है और वह है “अकेले में वो घबराते तो होंगे-मिटा के मुझको पछताते तो होंगे” फिल्म थी
1950में बनी “बीवी”, गीतकार थे वली साहब और  संगीतकार थे वे ही जिनका जिक्र उपर किया- शर्माजी-वर्माजी!
अकेले में वो घबराते तो होंगे
मिटा  के मुझको पछताते तो होंगे
हमारी याद आ जाती तो होगी
अचानक वो तड़प जाते तो होंगे
वो दिन हाय, वो दिन हाय रे वो दिन
वो दिन उन को भी याद आते तो होंगे
पतंगे अपने दोनों पर जला कर
हमारी याद दिलवाते तो होंगे

अकेले में 

दिल ही बुझा हुआ हो तो फ़स्ले बहार क्या: मुकेश की कम सुनी-अनसुनी गज़ल

हिन्दी फिल्मों के लिए शकील बूंदायूनी, हसरत जयपुरी, साहिल लुधियानवी, नक़्श ल्यालपुरी, निदा फ़ाज़ली, नीरज, कैफ़ी आज़मी, जावेद अख्तर, मख़दूम मोईनुद्दीन, गुलज़ार, शहरयार, फ़ैज़ अहमद ’फ़ैज़’ जैसे कई गीतकारों-शायरों ने गज़लें लिखी है तो मिर्ज़ा गालिब, मीर तकी ’मीर’ ( दिखाई दिए यूं कि बेखुद किया- बाज़ार), बहादुर शाह ‘ज़फ़र’, जैसे कई legendary शायरों की गज़लें भी अक्सर फिल्मों में आती रही है- रहती हैं।
 इन गज़लों को अनिल विस्वास, मदनमोहन, नौशाद, एस. एन. त्रिपाठी, रवि, रोशन और कई संगीतकारों ने संगीतबद्ध कर अमर कर दिया है, जो बहुत चर्चित हैं और अक्सर हम उन्हें सुनते रहते हैं।
 आज मैं जिस गज़ल को पोस्ट कर रहा हूँ वह उस फिल्म की है जिससे महान गायक मुकेश जीने बॉलिवुड में अभिनेता-गायक के रूप में अपनी शुरूआत की थी। यह फ़िल्म थी 1941 में बनी "निर्दोष"। गज़ल को लिखा है नीलकांत तिवारी नेऔर संगीतकार हैं अशोक घोष।

दिल ही बुझा हुआ है तो फ़सले बहार क्या
साक़ी हँसा, शराब हँसा, अब बजार क्या
दुनिया से ले चला है जब हसरतों का बोझ
काफ़ी नहीं है, सर पे गुनाहों का बोझ क्या
बाद-ए-पना क़ुज़ून है नाम-ओ-निशां किसी के
जब हम नहीं रहे तो रहेगा मज़ार क्या

दिल ही बुझा हुआ ..







Monday, 19 August 2019

उठ लखन लाल प्रिय भाई - राम की आकुलता पर आधारित सुन्दर गीत


प्रेम अदीब एवं शोभना समर्थ की जोड़ी ने 1938 में अपनी पहली फिल्म industrial India के बाद 1954 तक कई फिल्मों में एक साथ काम किया। पौराणिक एवं धार्मिक फिल्मों का दौर था सो ज्यादातर फिल्में इन्हीं विषयों पर आधारित होती थी। प्रेम अदीब एवं शोभना समर्थ की जोड़ी उस समय राम एवं सीता की जोड़ी के रूप में बहुत प्रसिद्ध हुई। दोनों ने साथ में तथा अलग-अलग भी कई फिल्मों में राम एवं सीता के पात्र अदा किए। 


प्रस्तुत गीत फिल्म मेघनाद एवं लक्ष्मण युद्ध के दौरान लक्ष्मण के मूर्छित होने एवं हनुमान जी द्वारा सुषेण वैद्य के कहने पर संजीवनी बूटी लाने के समय के दौरान हो रही  देर पर राम की आकुलता- विकलता आधारित है। इसमें राम अपने भाई लक्ष्मण को उठने को कह रहे हैं। यह गीत फिल्म रामबाण 1948 का है । इसके निर्देशक विजय भट्ट थे एवं राम सीताके पात्र जैसा उपर बताया प्रेम अदीब एवं शोभना समर्थ ने अदा किए 

ज्यादातर हम गायक की एवं संगीत की चर्चा करते हैं, गीत के हिट या चलने या ना चलने का पैमाना भी स्वर और संगीत ही मानते हैं; लेकिन पता नहीं क्यों गीतकार की मेहनत को उतना नहीं आंखा जाता, जबकि उनका योगदान किसी से भी कम नहीं होता। प्रसिद्ध गीत भी उसी तरह का माना जा सकता है। गीतकार मोती बीए  ने कितने सुन्दर शब्दों में राम की व्यथा का वर्णन किया है, आईये गीत सुनते हैं। 



स्वर-शंकर दास गुप्ता
संगीत-पं.शंकर राव व्यास
गीतकार- मोती बीए

उठ लखन लाल प्रिय भाई
दशा तुम्हारी देख राम की
अंखियां भर भर आयी
उठ लखन लाल प्रिय भाई

मात-पिता पत्नि की माया
भाई के कारण सब बिसराया
छोड़ आयोध्या का सुख तुमने
जोगी रूप बनाया
जिस भाई के लिए युद्ध में
प्राण की बाजी लगाई
उठ लखन लाल प्रिय भाई

पहले मुझे खिला कर खाते
और सुला कर सोते
अलग तुम्हारे कौन सभी तो
बाद राम के होते
स्वर्गपुरी के सुख (?)  से
पहले पहुंची जाई
उठ लखन लाल प्रिय भाई

मात कौशल्या और सुमित्रा
जोवत बाट तिहारी
पंथ हेरती हाय उर्मिला  
की अंखिया बेचारी
आँख मूँद के हुए तुम्ही क्या
तनिक दया ना आई
उठ लखन लाल प्रिय भाई

सीता रावण के घर बंदी
मेघनाठ चढ़ आयो
जगत कहेगा नारी के कारण राम ने बंधु गवाँयो
धीरज छूटो जात सभी का, कब से टेर लगाई
उठ लखन लाल प्रिय भाई

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