Sunday, 11 October 2020
Monday, 13 July 2009
अब कहाँ सुनने को मिलता है ऐसा भरा-पूरा मालकौंस ?-२
पिछले दिनों संजय पटेल जी ने संगीत मार्तण्ड ओमकारनाथ ठाकुर जी के स्वर में राग मालकौंस में रची बंदिश पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे.. सुनवाई और शीर्षक में एक हल्की सी शिकायत कर दी कि अब कहाँ सुनने को मिलता है ऐसा भरा-पूरा मालकौंस ?" उनकी शिकायत जायज भी तो है।
इस कड़ी में मैं भी यही शिकायत्त करना चाहूंगा साथ ही आपको राग मालकौंस की एक और बंदिश सुनवाना चाहूंगा। यह बंदिश लता मंगेशकर जी ने खुद द्वारा निर्मित मराठी फिल्म कंचन गंगा में गाई है। संगीतकार हैं पं वसंत देसाई।
आईये सुनते हैं...
यूट्यूब लिंक
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| Shyam sundar roop ... |
क्या बंदिश सुनने के बाद भी संजय भाई जी का प्रश्न अनुत्तरित ही रहा कि अब कहाँ सुनने को मिलता है ऐसा भरा-पूरा मालकौंस?
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Posted by सागर नाहर at 8:50 am 4 टिप्पणियाँ
श्रेणी Lata Ji, Vasant Desai, लताजी, वसंत देसाई
इन्हें भी सुने...Friday, 3 October 2008
यह लता मंगेशकर की नहीं, एक बेटी की आवाज़ है…
सुरेश चिपलूनकरजी की कलम से
लता मंगेशकर का जन्मदिन हाल ही में मनाया गया। लता मंगेशकर जैसी दिव्य शक्ति के बारे में कुछ लिखने के लिये बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। उन पर और उनके बारे में इतना कुछ लिखा जा चुका है कि अब शब्दकोष भी फ़ीके पड़ जाते हैं और उपमायें खुद बौनी लगती हैं। व्यस्तता की वजह से उस पावन अवसर पर कई प्रियजनों के आग्रह के बावजूद कुछ नहीं लिख पाया, लेकिन देवी की आराधना के लिये अष्टमी का दिन ही क्यों, लता पर कभी भी, कुछ भी लिखा जा सकता है। साथ ही लता मंगेशकर के गीतों में से कुछ अच्छे गीत छाँटना ठीक उसी प्रकार है जैसे किसी छोटे बच्चे को खिलौने की दुकान में से एक-दो खिलौने चुनने को कहा जाये।
यू-ट्यूब पर यह गीत इस लिंक पर उपलब्ध है…
इस गीत को ध्यान से सुनिये, वैसे तो लता ने सभी गीत उनकी रूह के भीतर उतर कर गाये हैं, लेकिन इस गीत को सुनते वक्त साफ़ महसूस होता है कि यह गीत लता मंगेशकर उनके बचपन की यादों में बसे पिता यानी कि दीनानाथ मंगेशकर को लक्षित करके गा रही हों… उल्लेखनीय है कि दीनानाथ मंगेशकर की पुत्री के रूप में उन्हें वैसे ही ईश्वरीय आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। दीनानाथ मंगेशकर 1930 में मराठी रंगमंच के बेताज बादशाह थे। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि उस वक्त के सोलह हजार रुपये महीने आज क्या कीमत रखते होंगे? जी हाँ उस वक्त दीनानाथ जी की मासिक आय 16000 रुपये थी, भेंट-उपहार-पुरस्कार वगैरह अलग से। उनका कहना था कि यदि ऊपरवाले की मेहरबानी ऐसे ही जारी रही तो एक दिन मैं पूरा गोआ खरीद लूँगा। उच्च कोटि के गायक कलाकार दीनानाथ मंगेशकर और उनकी भव्य नाटक कम्पनी ने समूचे महाराष्ट्र में धूम मचा रखी थी। वक्त ने पलटा खाया, दीनानाथ जी नाटक छोड़कर फ़िल्म बनाने के लिये कूद पड़े और उसमें उन्होंने जो घाटे पर घाटा सहन किया वह उन्हें भीतर तक तोड़ देने वाला साबित हुआ। मात्र 42 वर्ष की आयु में सन् 1942 में उच्च रक्तदाब की वजह से उनका निधन हो गया। उस वक्त लता सिर्फ़ 13 वर्ष की थीं और उन्हें रेडियो पर गाने के अवसर मिलने लगे थे, उन पर पूरे परिवार (माँ, तीन बहनें और एक भाई) की जिम्मेदारी आन पड़ी थी, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और देवप्रदत्त प्रतिभा के साथ उन्होंने पुनः शून्य से संघर्ष शुरु किया और "भारत रत्न" के उच्च स्तर तक पहुँचीं।
मृत्युशैया पर पड़े दीनानाथ जी ने रेडियो पर लता की आवाज़ सुनकर कहा था कि "अब मैं चैन से अन्तिम साँस ले सकता हूँ…" लता के सिर पर हाथ फ़ेरते हुए उन्होंने कहा था कि "मैंने अपने जीवन में बहुत धन कमाया और गंवाया भी, लेकिन मैं तुम लोगों के लिये कुछ भी छोड़कर नहीं जा रहा, सिवाय मेरी धुनों, एक तानपूरे और ढेरों आशीर्वाद के अलावा…तुम एक दिन बहुत नाम कमाओगी…"। लता मंगेशकर ने उनके सपनों को पूरा किया और आजीवन अविवाहित रहते हुए परिवार की जिम्मेदारी उठाई। यह गीत सुनते वक्त एक पुत्री का अपने पिता पर प्रेम झलकता है, साथ ही उस महान पिता की जुदाई की टीस भी शिद्दत से उभरती है, जो सुनने वाले के हृदय को भेदकर रख देती है… यह एक जेनेटिक तथ्य है कि बेटियाँ पिता को अधिक प्यारी होती हैं, जबकि बेटे माँ के दुलारे होते हैं। गीत के तीसरे अन्तरे में जब लता पुकारती हैं "मेरे होंठों पर उनकी आवाज़ भी है…" तो लगता है कि वाकई दीनानाथ जी का दिया हुआ आशीर्वाद हम जैसे अकिंचन लोगों को भीतर तक तृप्त करने के लिये ही था।
फ़िल्म इंडस्ट्री ने कई कलाकारों को कम उम्र में दुनिया छोड़ते देखा है, जिनकी कमी आज भी खलती है जैसे गुरुदत्त, संजीव कुमार, स्मिता पाटिल आदि… मास्टर दीनानाथ भी ऐसी ही एक दिव्य आत्मा थे, एक तरह से यह गीत पूरी तरह से उन्हीं को समर्पित है… गुलज़ार – जो कि "इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त कदम रस्ते, कुछ तेज कदम राहें…" या फ़िर "हमने देखी हैं उन आँखों की महकती खुशबू…" जैसे अजब-गजब बोल लिखते हैं उन्होंने भी इस गीत में सीधे-सादे शब्दों का उपयोग किया है, गीत की जान है वसन्त देसाई की धुन, लेकिन समूचे गीत पर लता-दीनानाथ की छाया प्रतिध्वनित होती है। यह भी एक संयोग है कि फ़िल्म में सुमिता सान्याल को यह गीत गायिका के रूप में रेडियो पर गाते दिखाया गया है।
आज लता मंगेशकर हीरों की अंगूठियाँ और हार पहनती हैं, लन्दन और न्यूयॉर्क में छुट्टियाँ बिताती हैं, पुणे में दीनानाथ मंगेशकर के नाम से विशाल अस्पताल है, और मुम्बई में एक सर्वसुविधायुक्त ऑडिटोरियम, हालांकि इससे दस गुना वैभव तो उन्हें बचपन में ही सुलभ था, और यदि दीनानाथ जी का अल्पायु में निधन न हुआ होता तो??? लेकिन वक्त के आगे किसी की कब चली है, मात्र 13 वर्ष की खेलने-कूदने की कमसिन आयु में लता मंगेशकर पर जो वज्रपात हुआ होगा, फ़िर जो भीषण संघर्ष उन्होंने किया होगा उसकी तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते। पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते स्वयं अविवाहित रहना भी तो त्याग की एक पराकाष्ठा है… इस गीत में लता का खोया हुआ बचपन और पिता से बिछुड़ने का दर्द साफ़ झलकता है। दुनिया में फ़ैले दुःख-दर्द, अन्याय, शोषण, अत्याचार को देखकर कभी-कभी ऐसा लगता है कि "ईश्वर" नाम की कोई सत्ता नहीं होती, परन्तु लता मंगेशकर की आवाज़ सुनकर फ़िर महसूस होता है कि नहीं… नहीं… ईश्वर ने अपने कुछ अंश धरती पर बिखेरे हुए हैं, जिनमें से एक है लता मंगेशकर…
गीत के बोल इस प्रकार हैं…
एक तथा बचपन, एक था बचपन
बचपन के एक बाबूजी थे, अच्छे-सच्चे बाबूजी थे
दोनों का सुन्दर था बन्धन…
एक था बचपन…
1) टहनी पर चढ़के जब फ़ूल बुलाते थे
हाथ उचके तो टहनी तक ना जाते थे
बचपन के नन्हें दो हाथ उठाकर वो
फ़ूलों से हाथ मिलाते थे…
एक था बचपन… एक था बचपन
2) चलते-चलते, चलते-चलते जाने कब इन राहों में
बाबूजी बस गये बचपन की बाहों में
मुठ्ठी में बन्द हैं वो सूखे फ़ूल अभी
खुशबू है सीने की चाहों में…
एक था बचपन… एक था बचपन
3) होठों पर उनकी आवाज भी है
मेरे होंठों पर उनकी आवाज भी है
साँसों में सौंपा विश्वास भी है
जाने किस मोड़ पे कब मिल जायेंगे वो
पूछेंगे बचपन का अहसास भी है…
एक था बचपन, एक था बचपन…
छोटा सा नन्हा सा बचपन…
एक और बात गौर करने वाली है कि अब "बाबूजी" शब्द भी लगभग गुम चुका है। वक्त के साथ "बाबूजी" से पिताजी हुए, पिताजी से पापा हुए, पापा से "डैड" हो गये और अब तो बाबूजी को सरेआम धमकाया जाता है कि "बाबूजी जरा धीरे चलो, बिजली खड़ी, यहाँ बिजली खड़ी, नैनों में चिंगारियाँ, गोरा बदन शोलों की लड़ी…" बस और क्या कहूँ, मैंने पहले ही कहा कि "वक्त के आगे सभी बेबस हैं…"।
Posted by सागर नाहर at 9:00 am 12 टिप्पणियाँ
श्रेणी Lata Ji, Vasant Desai, लता जी, वसंत देसाई
इन्हें भी सुने...Monday, 18 August 2008
ना ना बरसो बादल , आज बरसे नैन से जल: लताजी
पिछली पोस्ट में मीराबाई काली घटाओ को देखकर कह रही थी बादल देख डरी!! सम्राट पृथ्वीराह चौहान की नायिका का दुख: भी कुछ ऐसा ही है वह तो बादलों को बरसने से भी मना कर रही है।
बिरहिनी नायिका के नयनों से जल बारिश की तरह बरस रहा है, उसका मन मोर घायल है। आज उसे बारिश की बूंदें भी नहीं सुहा रही,, आईये सम्राट चन्द्र गुप्त फिल्म का राग मल्हार में बना, वसंत देसाई का संगीतबद्ध और लताजी का गाया हुआ यह मधुर गीत सुनते हैं, और हाँ यह गीत रचा है भरत व्यास ने।
ना ना ना बरसो बादल
आज बरसे नैन से जल
आज मन का मोर घायल
ना ना ना...
आज बरखा है दीवानी नयन जल खोये
बादलों के ही बहाने बिरहिणी रोये
बुंदनियों की छुम छन न न न-२
बाजे रे पायल , बाजे रे पायल
ना ना
श्याम बिन श्यामल घटा मन को नहीं भाए
पिया बिन बिजली हिया में अगन सुलगाए
नीले नयनो के गगन से-२
झरे रे काजल , झरे रे काजल..
ना ना ना बरसो बादल
Posted by सागर नाहर at 10:15 am 16 टिप्पणियाँ
श्रेणी Lata Ji, Vasant Desai, लता जी, वसंत देसाई
इन्हें भी सुने...Thursday, 10 January 2008
श्याम म्हाने चाकर राखोजी- तीन स्वरों में मीरां का एक भजन
आज मैं आपको मीरा बाई का एक भजन सुनवा रहा हूँ जो तीन अलग अलग स्वरों में है। एक स्वर है लता जी का दूसरा वाणी जयराम का और तीसरा भारत रत्न और भारत कोकिला एम एस सुबलक्ष्मी का। एक ही भजन को इन तीनों ही गायिकाओं ने बहुत ही खूबसूरती से गाया है, अगर आप पुराने गीतों के प्रशंषक हैं तो आप इन तीनों ही गीतों को सुनकर झूम उठेंगे। तूफान और दिया(1956) फिल्म में गाये इस भजन का संगीत दिया है वसंत देसाई ने, वाणी जयराम के गाये भजन (मीरां- 1979) को संगीत दिया है भारत रत्न पंडित रविशंकर ने और एम एस सुबलक्ष्मी के गाये भजन ( फिल्म मीरा 1945) को संगीत दिया है एस वी वेंकटरमण ने। मीरा के इस भजन को तीनों गायिकाओं ने अलग अलग अंतरे गाये हैं, मैने तीनों ही गीतों की यहाँ लिख दिया है ताकि आप सुनने के साथ साथ गुनगुना भी सकें। प्रस्तुत भजन में मीरां बाई भगवान श्री कृष्ण से अनुरोध कर रही है कि आप मुझे अपना चाकर ( दासी- नौकर) बना लीजिये ताकि मैं नित्य आपके दर्शन कर सकूं। तूफान और दिया- लता जी- वसंत देसाई- मीरां बाई गिरिधारी मने चाकर राखो जी वाणी जयराम- पंडित रविशंकर- मीरां श्याम मने चाकर राखो जी वृंदावन की कुंज गलिन में तेरी लीला गासूं मोर मुकुट पीतांबर सोहे,गल बैजंती माला एम एस सुबलक्ष्मी- मीरां श्याम मने चाकर राखो जी योगी आया योग करन को, तप करने सन्यासी मने चाकर राखो जी
मने चाकर राखो, चाकर राखो, चाकर राखो जी
म्हाने चाकर राको, चाकर राखो, चाकर राखो.. गिरिधारी चाकर रहसूं बाग लगासूं
नित उठ दर्सन पासूं
वृंदावन की कुंज गलिन में गोविन्द लीला गासूं
ऊंचे ऊंचे महल बनाऊं
किस बिच राखूं बारी
सावंरिया के दरसन पाऊं-२
पहिर कसूंबी सारी
गिरधारी...
मीरां के प्रभु गहिर गंभीरा
हृदय रहो जी धीरा
आधी रात प्रभु दरसन दीन्हो
प्रेम ना देखे पीड़ा
चाकर रहसूं बाग लगासूं
नित उठ दर्सन पासूं
चाकरी में दरसन पाऊं सुमिरन पाऊं खरची
भाव भगत जा तेरी पाऊं, तीनों बातां करसी
श्याम मने..
वृंदावन में धेनु चरावे मोहन मुरली वाला
मीरां के प्रभु गहिर गंभीरा,सदा रहो जी धीरा
आधी रात प्रभु दरसन दीन्ही
प्रेम ना देखे पीड़ा
चाकर रहसूं बाग लगासूं
नित उठ दर्सन पासूं
श्याम मने..
मोर मुकुट पीतांबर सोहे,गल बैजंती माला
वृंदावन में धेनु चरावे मोहन मुरली वाला
चाकर राखो जी
प्रभुजी योगी आया.. तप करने सन्यासी
हरिभजन को साधू आया, वृंदावन के वासी
तेरे वृंदावन के वासी
मने चाकर..
मीरां के प्रभु गहर गंभीरा, सदा रहो जी धीरा
आधी रात प्रभु दरसन देवे, प्रेम ना देखे पीड़ा
मने चाकर राखो जी
Posted by सागर नाहर at 9:27 am 6 टिप्पणियाँ
श्रेणी Lata Ji, Pt. ravishankar, VAni Jayaram, Vasant Desai, एम एस सुबलक्ष्मी, पं रविशंकर, वसंत देसाई, वाणी जयराम
इन्हें भी सुने...







