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लताजी ने हजारों गीत गाए, लेकिन आज भी कई गीत हैं जो दुर्लभ से हैं। मैने अपनी पिछली पोस्ट्स में कई बार यथा संभव कोशिश की है कि लता जी के उन दुर्लभ गीतों को महफिल में पोस्ट करूं कि जिन लोगों ने इन्हें नहीं सुना है वे भी लताजी के उन सुमधुर गीतों को सुन कर आनंदित हो सकें। इस श्रेणी में महफिल में आज कई दिनों के बाद लता जी का एक और दुर्लभ गीत। यह गीत फिल्म गजरे (Gajare 1948) का है। इस गीत को संगीतबद्ध किया है मेरे सबसे पसंदीदा संगीतकारों में से एक अनिल विश्वाjस (अनिलदा) ने। और गीत को लिखा है जी एस नेपाली यानि गोपाल सिंह नेपाली ने। गजरे फिल्म में मुख्य भूमिकाएं सुरैया और मोतीलाल ने निभाई हैं।
घर यहाँ बसाने आए थे हम घर ही छोड़ चले अपना था जिन्हें समझा हमने, वो भी दिल तोड़ चले
सोचा था सजन आएँगे आएँगे बहारे लाएँगे हम एक चमन के दो पंछी बन जाएँगे -2 संध्या की बेला द्वार पे आ कर वो मुँह मोड़ चले घर यहाँ बसाने आए थे…. जीवन में कभी इक प्यार का दीपक जलता था मिलने के लिए दिल घुल-घुल के मचलता था -2 जब साथ पतंगा छोड़ दियाऽऽऽऽऽऽ तो दिया अकेले जले घर यहाँ बसाने आए थे Download Link
आज आपके लिए मो. रफी साहब की एक दुर्लभ गैर फिल्मी गज़ल, इसे लिखा है सुदर्शन फ़ाकि़र ने और संगीतकार के बारे में जानकारी नहीं है। अगर आप इस गज़ल के संगीतकार के बारे में जानते हैं तो टिप्पणी लिख कर बताईये। मैं उसे बाद में पोस्ट में जोड़ दूंगा।
एक ही बात जमाने की किताबों में नहीं जो ग़म-ए-दोस्त में नशा है शराबों में नहीं एक ही बात हुस्न की भीख ना मांगेगे, ना ज़लवों की कभी-2 हम फ़कीरों से मिलो, खुल के, हिज़ाबों में नहीं एक ही बात
हर जगह फिरते है, आवारा खयालों की तरह-2 ये अलग बात है, हम आपके ख्वाबों में नहीं-2 एक ही बात
ना डुबो सागर-ओ-मीना में, ये गम ए "फ़ाकिर" के मकाम इनका दिलों में है, शराबों में नहीं एक ही बात जमाने की किताबों में नहीं एक ही बात
पिछली पोस्ट में दानिश साहब ने पूछा था कि क्या ये वही वली मोहम्म्द साहब हैं जिन्होने गाँव की गोरी के गीत लिखे थे? मेरी जानकारी में ये वली साहब गीतकार नहीं है। विकीपीडिया से प्राप्त जानकारी के अनुसार वली मोहम्म्द साहब सिर्फ गायक ही थे। फिर भी यूनुस भाई शायद ज्यादा जानकारी दे सकें। इसी पोस्ट में प्रवीण जी ने दीवाना फिल्म के गीत तीर चलाते जायेंगे की फरमाईश की थी उनके लिए यह वीडियो हाजिर है।
एक और गीत- रफी साहब और हबीब वली मोहम्मद साहब आवाजों में
पिछली पोस्ट में आपने हबीब वली मोहम्म्द की आवाज में एक सुन्दर गज़ल शमशीर बरहना माँग गज़ब सुनी। चलिए आज आपको आज एक और सुन्दर गीत सुनाते हैं। आज आपके लिए एक प्रश्न है कि आप इन दोनों गीतों को सुनकर दिल से और बिना पक्षपात किए :) बताइये कि आपको कौनसी आवाज में गीत ज्यादा अच्छा लगा? भई मुझे तो हबीब वली मोहम्मद حبیب ولی محمد की आवाज यहाँ रफी साहब से इक्कीस लगी। मुझे यह समझ में नहीं आता कि जब यह गीत वली साहब की आवाज में भी इतना अच्छा बना है तो फिर फिल्म में रफी साहब की आवाज में ही क्यों रखा गया! यह गीत फिल्म दीवाना (Deewana 1952) का है। इस फिल्म के संगीतकार हैं नौशाद साहब और गीतकार हैं शकील बूँदायूनी। आपको याद होगा इस फिल्म में एक और भी बढ़िया गीत है - तीर खाते जायेंगे, आँसू बहाते जायेंगे, जिन्दगी भर अपनी किस्मत आजमाते जायेंगेऽऽऽऽ यह लता जी की आवाज में है। खैर ... गीत सुनते हैं। पहले मोहम्म्द रफी साहब की आवाज में....
तसवीर बनाता हूँ तेरी ख़ून-ए-जिगर से-2 देखा है तुझे मैं ने मुहब्बत की नज़र से अरे, मुहब्बत की नज़र से
जितने भी मिले रंग वो सभी भर दिये तुझ में हाय, भर दिये तुझ में इक रंग-ए-वफ़ा और है, लाऊँ वो किधर से अरे लाऊँ वो किधर से तसवीर बनाता हूँ तेरी...
सावन तेरी ज़ुल्फ़ों से घटा माँग के लाया हाय, माँग के लाया बिजली ने चुराई है तड़प तेरी नज़र से अरे, तड़प तेरी नज़र से तसवीर बनाता हूँ तेरी
मैं दिल में बिठा कर तुझे रुख़्सत न करूँगा हाय, रुख़्सत न करूँगा मुश्किल है तेरा लौट के जाना मेरे घर से अरे जाना मेरे घर से तसवीर बनाता हूँ तेरी
इतने दिनों तक ब्लॉग से दूर रहने के बाद कुछ लिखना बहुत मुश्किल काम है। लेकिन पिछले दिनों इनटरनेट के अमृतमंथन में संगीत रूपी कई अनमोल गीत मिले। कई दिनों से सोच रहा हूँ कि फिर से शुरुआत कैसे करूं लेकिन आखिरकार आज मौका मिल ही गया।
एकाद दिन पहले मैं हबीब वली मोहम्मद حبیب ولی محمد का एक गीत शमशीर बरहना मांग गज़ब.. सुनने में आया। यह गीत भारत के आखिरी मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र का है। लेकिन वली मोहम्म्द साहब की आवाज में यह गीत बहुत ही कर्णप्रिय लगा; और मैं इसे यहाँ पोस्ट करने से अपने आप को नहीं रोक पाया। आईये इस सुन्दर गीत को सुनते हैं। शमशीर बरहना मांग गज़ब, बालों की महक फिर वैसी है
जूड़े की गुन्धावट बहर-ए-खुदा, ज़ुल्फ़ों की लटक फिर वैसी है हर बात में उस के गर्मी, है हर नाज़ में उस के शोखी है आमद है कयामत चाल भरी छलने की फड़क फिर वैसी है महरम है हबाब-ए-आब-ए-रवा, सूरज की किरण है उस पे लिपट जाली की ये कुरती है वो बला, घोटे की धनक फिर वैसी है वो गाये तो आफ़त लाये है, सुर ताल में लेवे जान निकाल नाच उस का उठाये सौ फितने, घुन्घरू की छनक फिर वैसी है
इस गीत को वनराज भाटिया ने फिल्म मण्डी (1983) के लिए संगीतबद्ध किया है और गाया है प्रीती सागर ने। आईये इसे भी सुनते हैं
अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें कुछ दर्द कलेजे से लगने के लिये है स्व. मुकेश जी को पुण्य तिथी पर हार्दिक श्रद्धान्जली। आज मैं आपको मुकेशजी की गाई एक नायाब गैर फिल्मी गज़ल सुना रहा हूँ। इस गज़ल को लिखा है जानिंसार अख्तर ने और संगीत दिया है खैयाम साहब ने। आईये सुनते हैं।
अशआर मेरे यूं तो ज़माने के लिये है कुछ शेर फ़कत उनको सुनने के लिये है
अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिये है
आँखो में जो भर लोगे तो काँटो से चुभेंगे ये ख्वाब तो पलकों पे सजाने के लिये है
देखुं जो तेरे हाथों को लगता है तेरे हाथ मन्दिर में फ़कत दीप जलने के लिये है
सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की वर्ना तो बदन आग बुझाने के लिये है