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Saturday, 26 March 2011

शमशीर बरहना मांग गज़ब

बहादुर शाह ज़फ़र की एक गज़ल- दो आवाजों में
इतने दिनों तक ब्लॉग से दूर रहने के बाद कुछ लिखना बहुत मुश्किल काम है। लेकिन पिछले दिनों इनटरनेट के अमृतमंथन में संगीत रूपी कई अनमोल गीत मिले। कई दिनों से सोच रहा हूँ कि फिर से शुरुआत कैसे करूं लेकिन आखिरकार आज मौका मिल ही गया।

एकाद दिन पहले मैं हबीब वली मोहम्मद حبیب ولی محمد का एक गीत शमशीर बरहना मांग गज़ब.. सुनने में आया। यह गीत भारत के आखिरी मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र का है। लेकिन वली मोहम्म्द साहब की आवाज में यह गीत बहुत ही कर्णप्रिय लगा; और मैं इसे यहाँ पोस्ट करने से अपने आप को नहीं रोक पाया। आईये इस सुन्दर गीत को सुनते हैं।
शमशीर बरहना मांग गज़ब, बालों की महक फिर वैसी है
जूड़े की गुन्धावट बहर-ए-खुदा, ज़ुल्फ़ों की लटक फिर वैसी है
हर बात में उस के गर्मी, है हर नाज़ में उस के शोखी है
आमद है कयामत चाल भरी छलने की फड़क फिर वैसी है
महरम है हबाब-ए-आब-ए-रवा, सूरज की किरण है उस पे लिपट
जाली की ये कुरती है वो बला, घोटे की धनक फिर वैसी है
वो गाये तो आफ़त लाये है, सुर ताल में लेवे जान निकाल
नाच उस का उठाये सौ फितने, घुन्घरू की छनक फिर वैसी है



इस गीत को वनराज भाटिया ने फिल्म मण्डी (1983) के लिए संगीतबद्ध किया है और गाया है प्रीती सागर ने। आईये इसे भी सुनते हैं







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