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Thursday, 23 February 2012

रातें थी चाँदनी, जोबन पे थी बहार- हबीब वली मोहम्मद

मेरी चाहत में तो कोई भी कमी भी नहीं थी। मैने हर पल तुम्हें ही चाहा, हर पल तुम्हें ही पूजा। फिर भी जैसे ही मौका मिला तुमने मुझे टुकरा दिया।



वह दिन मुझे आज भी याद है
जब जब मेरी गोदी में सर रख कर सोते
और कहते कि
तुम्हारी गोद में दुनिया का सूकून है
मैं इतराती
अपनी ही किस्मत से इर्ष्या करती
क्या सुन्दर दिन होते थे वे
और रातें सुहानी
फिर अचानक एक दिन
शायद तुमने किसी और का दामन थाम लिया
सूकून किसी और में पा लिया
मेरी सुन्दर दुनियां तुमने उजाड़ी और
किसी और की बसा ली
मेरे सारे सपने बिखर गए
मुझे लगा इस गुलाब और
मेरी किस्मत में क्या फर्क है
उसकी दुनियां किसी भँवरे ने बर्बाद की
और मेरी भी !


रातें थी चाँदनी और जोबन पे थी बहार
स्वर : हबीब वली मोहम्मद

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Wednesday, 28 September 2011

बाँध प्रीत फूल डोर- एक मधुर गीत

दुनियाँ की सबसे सुरीली आवाज, लता मंगेशकर का आज तिरासीवां जन्म दिन है। लता जी पर इतने शब्द लिखे जा चुके कि और कुछ लिखना सही नहीं होगा। हमने श्रोता बिरादरी ब्लॉग पर लता उत्सव के रूप में पिछले १२ दिनों से कई सुन्दर गीत आपको सुनवाये, पर लता उत्सव मनाने के लिए १२ दिन बहुत कम हैं, अगर मैं अपनी पसन्द के लताजी के गाए गीत भी अगर रोज के एक के हिसाब से पोस्ट करूं तो उनका समापन करने में महीनों लग जायेंगे।

अब तक मैने महफिल ब्लॉग पर भी लता जी के कई दुर्लभ/ कम सुने जाने वाले गीत सुनाएं हैं। पर आज मैं एक ऐसा गीत सुनवाना चाह रहा हूं जो दुर्लभ और अनसुना नहीं है, लता जी अक्सर सुनाई देने वाले गीतों में से एक है।
आइये गीत सुनते हैं।


फिल्म: मालती माधव 1951
संगीत: सुधीर फड़के
गीत: पण्डित नरेन्द्र शर्मा


बाँध प्रीति फूल डोर, मन लेके चित्तचोर
दूर जाना ना, दूर जाना ना
मन के किवाड़ खोल, मीत मेरे अनमोल
भूल जाना ना, भूल जाना ना
कैसे सहूँ विछोहन, मन में रमा है मोहन
रूठ जाना ना, रूठ जाना ना

लता जी का फोटो पं नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री लावण्या शाह के सौजन्य से

Saturday, 23 July 2011

घर यहाँ बसाने आए थे, हम घर ही छोड चले

लताजी ने हजारों गीत गाए, लेकिन आज भी कई गीत हैं जो दुर्लभ से हैं। मैने अपनी पिछली पोस्ट्स में कई बार यथा संभव कोशिश की है कि लता जी के उन दुर्लभ गीतों को महफिल में पोस्ट करूं कि जिन लोगों ने इन्हें नहीं सुना है वे भी लताजी के उन सुमधुर गीतों को सुन कर आनंदित हो सकें। इस श्रेणी में महफिल में आज कई दिनों के बाद लता जी का एक और दुर्लभ गीत।
यह गीत फिल्म गजरे (Gajare 1948) का है। इस गीत को संगीतबद्ध किया है मेरे सबसे पसंदीदा संगीतकारों में से एक अनिल विश्वाjस (अनिलदा) ने। और गीत को लिखा है जी एस नेपाली यानि गोपाल सिंह नेपाली ने। गजरे फिल्म में मुख्य भूमिकाएं सुरैया और मोतीलाल ने निभाई हैं।

घर यहाँ बसाने आए थे
हम घर ही छोड़ चले
अपना था जिन्हें समझा हमने, वो भी दिल तोड़ चले

सोचा था सजन आएँगे आएँगे बहारे लाएँगे
हम एक चमन के दो पंछी बन जाएँगे -2
संध्या की बेला द्वार पे आ कर वो मुँह मोड़ चले
घर यहाँ बसाने आए थे….

जीवन में कभी इक प्यार का दीपक जलता था

मिलने के लिए दिल घुल-घुल के मचलता था -2
जब साथ पतंगा छोड़ दियाऽऽऽऽऽऽ तो दिया अकेले जले
घर यहाँ बसाने आए थे
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Wednesday, 6 April 2011

एक ही बात ज़माने की किताबों में नहीं

रफी साहब की एक दुर्लभ गज़ल
आज आपके लिए मो. रफी साहब की एक दुर्लभ गैर फिल्मी गज़ल, इसे लिखा है सुदर्शन फ़ाकि़र ने और संगीतकार के बारे में जानकारी नहीं है। अगर आप इस गज़ल के संगीतकार के बारे में जानते हैं तो टिप्पणी लिख कर बताईये। मैं उसे बाद में पोस्ट में जोड़ दूंगा।


एक ही बात जमाने की किताबों में नहीं
जो ग़म-ए-दोस्त में नशा है शराबों में नहीं
एक ही बात
हुस्‍न की भीख ना मांगेगे, ना ज़लवों की कभी-2
हम फ़कीरों से मिलो, खुल के, हिज़ाबों में नहीं
एक ही बात

हर जगह फिरते है, आवारा खयालों की तरह-2
ये अलग बात है, हम आपके ख्वाबों में नहीं-2
एक ही बात

ना डुबो सागर-ओ-मीना में, ये गम ए "फ़ाकिर"
के मकाम इनका दिलों में है, शराबों में नहीं
एक ही बात जमाने की किताबों में नहीं
एक ही बात

पिछली पोस्ट में दानिश साहब ने पूछा था कि क्या ये वही वली मोहम्म्द साहब हैं जिन्होने गाँव की गोरी के गीत लिखे थे? मेरी जानकारी में ये वली साहब गीतकार नहीं है। विकीपीडिया से प्राप्त जानकारी के अनुसार वली मोहम्म्द साहब सिर्फ गायक ही थे। फिर भी यूनुस भाई शायद ज्यादा जानकारी दे सकें।
इसी पोस्ट में प्रवीण जी ने दीवाना फिल्म के गीत तीर चलाते जायेंगे की फरमाईश की थी उनके लिए यह वीडियो हाजिर है।

Tuesday, 29 March 2011

तस्वीर बनाता हूँ तेरी, खून-ए-जिगर से- एक गीत दो आवाजों में

एक और गीत- रफी साहब और हबीब वली मोहम्मद साहब आवाजों में

पिछली पोस्ट में आपने हबीब वली मोहम्म्द की आवाज में एक सुन्दर गज़ल शमशीर बरहना माँग गज़ब सुनी। चलिए आज आपको आज एक और सुन्दर गीत सुनाते हैं। आज आपके लिए एक प्रश्‍न है कि आप इन दोनों गीतों को सुनकर दिल से और बिना पक्षपात किए :) बताइये कि आपको कौनसी आवाज में गीत ज्यादा अच्छा लगा?

भई मुझे तो हबीब वली मोहम्मद حبیب ولی محمد की आवाज यहाँ रफी साहब से इक्कीस लगी। मुझे यह समझ में नहीं आता कि जब यह गीत वली साहब की आवाज में भी इतना अच्छा बना है तो फिर फिल्म में रफी साहब की आवाज में ही क्यों रखा गया!
यह गीत फिल्म दीवाना (Deewana 1952) का है। इस फिल्म के संगीतकार हैं नौशाद साहब और गीतकार हैं शकील बूँदायूनी। आपको याद होगा इस फिल्म में एक और भी बढ़िया गीत है - तीर खाते जायेंगे, आँसू बहाते जायेंगे, जिन्दगी भर अपनी किस्मत आजमाते जायेंगेऽऽऽऽ यह लता जी की आवाज में है।
खैर ... गीत सुनते हैं।

पहले मोहम्म्द रफी साहब की आवाज में....


तसवीर बनाता हूँ तेरी ख़ून-ए-जिगर से-2
देखा है तुझे मैं ने मुहब्बत की नज़र से
अरे, मुहब्बत की नज़र से

जितने भी मिले रंग वो सभी भर दिये तुझ में
हाय, भर दिये तुझ में
इक रंग-ए-वफ़ा और है,
लाऊँ वो किधर से
अरे लाऊँ वो किधर से
तसवीर बनाता हूँ तेरी...

सावन तेरी ज़ुल्फ़ों से घटा माँग के लाया
हाय, माँग के लाया
बिजली ने चुराई है तड़प तेरी नज़र से
अरे, तड़प तेरी नज़र से
तसवीर बनाता हूँ तेरी

मैं दिल में बिठा कर तुझे रुख़्सत न करूँगा
हाय, रुख़्सत न करूँगा
मुश्किल है तेरा लौट के जाना मेरे घर से
अरे जाना मेरे घर से
तसवीर बनाता हूँ तेरी

और अब हबीब वली मोहम्म्द साहब की आवाज में....

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