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आपने मिर्ज़ा गालिबمرزا اسد اللہ خان की सुप्रसिद्ध गज़लदिलेनादांतुझेहुआक्याहै... कई गायकों की आवाज में सुनी होगी। लगभग सभी गायकों ने इस सुन्दर गज़ल को अपने अपने तरीके से गाया। कुछ बहुत प्रसिद्ध हुई और कुछ गुमनामी के अंधेरे में खो गई। आज सुनिए इस सुन्दर गज़ल को सुमन कल्याणपुर की आवाज में। यह भी एकदम दुर्लभ है।
दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है आखिर इस दर्द की दवा क्या है
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार या इलाही, ये माजरा क्या है
मैं भी मुँह में ज़ुबान रखता हूँ काश पूछो की मुद्दआ क्या है
हमको उनसे वफ़ा कि है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
सालों पहले मेरे फैमिली कैसेट विक्रेता ( हाँ, वैसे ही जैसे फैमेली डॉक्टर होते हैं) ने मुझे जबरन एक चार कैसेट का सैट थमा दिया, और बोला यार ये सैट बरसों से बिक नहीं रहा। मैं उस सैट को देख कर उछल ही पड़ता पर उसके सामने मैने अपनी खुशी जाहिर नहीं होने दी क्यों कि मुझे उस कैसेट को अपने दाम पर खरीदना और अहसान भी जताना था। ( भई उन दिनों जेब में पैसे उतने ही होते थे) आखिरकार शायद सौ या अस्सी रुपये में सौदा पटा और मैं वो सैट लेकर घर आया।
मेरे खुशी से उछल पड़ने का राज यह था कि उस सैट में ख़ैयाम साहब द्वारा संगीतबद्ध की हुई गैर फिल्मी रचनायें थी, मुकेश, मो. रफी, तलत महमूद और उस समय के लगभग सभी जाने माने गायकों ने उस एल्बम के लिये अपना स्वर दिया था। मैने उस एल्बम को बहुत सुना, इतना कि एक दो कैसेट तो घिस गये, और एकाद को मित्र मांग कर ले गये, अब तो टेप भी नहीं है, पता नहीं यह दुर्लभ एल्बम वापस मिलेगा भी कि नहीं।
उस संग्रह में तलत महमूद की गाई हुई दो गज़लों में से एक तो आप पहले सुन चुके हैं "कौन कहता है तुझे ..." और दूसरी गज़ल थी चचा गालिब की "नक़्श फ़रियादी है शोखी-ए-तहरीर का" ये दो गज़लें मुझे बहुत पसन्द है। बरसों से मै गज़ल को सुनता रहा हूँ। लीजिये आज आप भी सुनिये।
गज़ल के अशआर के ऊर्दू शब्दों के अर्थ नैट से खोज कर अंग्रेजी में ही लिख दिये हैं।
नक़्श फ़रियादी है शोखी-ए-तहरीर का
काग़जी है पैराहन, हर पैकर-ए- तस्वीर का
कावे-कावे सख्त जानी, हाय तन्हाई ना पूछ
सुबह करना शाम का, लाना है जू-ए-शीर का
जज़्बा-ए-बे- इख्तियार-ए-शौक़ देखा चाहिये
सीना-ए-शमशीर से बाहर है दम शमशीर का
(उक्त शेर इस गज़ल में तलत साहब ने नहीं गाया है पर मूल रचना में है सो यहां लिख रहा हूँ) आगही दाम-ए-शुनीदन जिस क़दर चाहे बिछाये मुद्दा अनका़ है अपने आलम-ए-तकरीर का
बस के हूँ ग़ालिब असीरी में भी आतिश जे़र-ए-पा
मू-ए-आतिश दीदा है हल्का मेरी ज़ंजीर का।
(नक़्श = Copy, तहरीर- Hand Writting, काग़जी= Delicate, पैराहन= Dress, पैकर= Apperance,
कावे-कावे Hard Work, सख्त जानी- Hard Life, जू- Canal/Stream, शीर -Milk, जू-ए-शीर to create a canal of milk, here means to perform an impossible work,इख्तियार- Authority/Power, शमशीर= Sword,आगही-Knowledge, दाम- Net/Trap, शुनीद- Conversation, अनका- Rare,असीरी- impeisonment, जेर-ए-पा- Under the feet, मू- Hair, आतिश-दीदा- Rosted on fire, हल्क़ा- Ring/Circle)
मित्रों आज प्रस्तुत है आपके लिये मिरजा ग़ालिब की गज़ल ये ना थी हमारी किस्मत.. यह गज़ल आपने कई कलाकारों की आवाज में सुनी होगी। परन्तु मुझे सबसे ज्यादा बढ़िया लगती है स्व. तलत महमुद साहब के द्वारा गाई हुई भारत भूषण और सुरैया अभिनित फिल्म मिर्जा गालिब फिल्म की यही गज़ल.. ये ना थी। कुछ दिनों पहले मैने सलीम रज़ा और मल्लिका-ए-तरन्नुम (मैडम) नूरजहां के द्वारा गाई हुई 1961 में बनी पाकिस्तानी फिल्म गालिब की यह गज़ल सुनी। सुनने के बाद इस गज़ल का संगीत भी बहुत पसन्द आया तो आज आपके लिये यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस फिल्म की एक खास बात और है, और वह ये कि यह फिल्म नूरजहाँ की आखिरी फिल्म है।