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बहुत दिनों के बाद ही सही पर जो कुछ आप सुनेंगे, आनंदित हुए बिना नहीं रह पायेंगे। यह एक मराठी नाट्य संगीत का गीत है। इसे गाया है बकुल पण्डित ने। और १९४६ में प्रदर्शित हुए नाटक पाणिग्रहम में गाया जाता था। आप भाषा भले ही ना समझ पायें लेकिन आपको इस गीत को सुनने के बाद एक अलग तरह का सुकून मिलेगा।
कुछ दिनों पहले मैं रेडियोवाणी की पुरानी पोस्ट्स देख रहा था। एक पोस्ट पर नज़र पड़ी जो हिन्दी फिल्मों की सबसे बढ़िया फिल्म दो आँखें बारह हाथ पर आधारित थी। उस पोस्ट में चालीसगांव वाले विकास शुक्लाजी ने एक बड़ी लेकिन बहुत ही जानकारीपूर्ण टिप्पणी दी थी।
उस टिप्प्णी में आपने कई मराठी गीतों का जिक्र किया था। साथ ही एक और गीत का जिक्र किया था जो अण्णा साहेब सी. रामचन्द्रजी की फिल्म घरकुल का था गीत के बोल थे "कोन्यात झोपली सतार, सरला रंग...पसरली पैंजणे सैल टाकुनी अंग ॥ दुमडला गालिचा तक्के झुकले खाली...तबकात राहिले देठ, लवंगा, साली ॥ साथ ही इस गीत की गायिका फैयाज यानि कुमारी फैयाज के बारे में बताते हुए लिखा था कि वे उपशास्त्रीयगायिका हैं और नाट्यकलाकार भी।
मैने इस गीत को नेट पर खोजना शुरु किया, कुछ मराठी मित्रों की मदद ली, पर गीत नहीं मिला। अचानक कुमारी फैयाज का एक गीत दिखा। उसे सुनते ही मैं उछल पड़ा। गीत मराठी में होने की वजह से ज्यादा समझ में नहीं आया लेकिन जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं कि गीत-संगीत किसी भाषा के मोहताज नहीं होते, वे सभी सीमाओं
से परे होते हैं, गीत सुनते ही मेरी आंखें बहने लगी।
कुमारी फैय्याज की इतनी दमदार कैसे हिन्दी संगीत प्रेमियों तक छुपी रही? क्या आप जानते हैं फैय्याज जी ने ऋषिकेश मुखर्जी दा की फिल्म आलाप में दो गीत गाये हैं ( शायद और भी गायें हो- जानकारी नहीं है) एक भूपिन्दर सिंह के साथ है और दूसरा अकेले आई ऋतु सावन कीगाया है! संभव हुआ तो इस गीत को भी बहुत जल्द सुनाया जायेगा।
छाया गांगुली की आवाज में जिसने भी कोई गीत सुना है उसे एकबारगी लगेगा कि छाया जी ही गा रही हैं।
लीजिये आप गीत सुनिये।
स्मरशील गोकुळ सारे
स्मरशील यमुना, स्मरशील राधा
स्मरेल का पण कुरूप गवळण
तुज ही बंशीधरा रे ?
रास रंगता नदीकिनारी
उभी राहिले मी अंधारी
न कळत तुजला तव अधरावर
झाले मी मुरली रे !
स्मरशील गोकुळ सारे
ऐन दुपारी जमीन जळता
तू डोहोवर शिणून येता
कालिंदीच्या जळात मिळुनी
धुतले पाय तुझे रे.
स्मरशील गोकुळ सारे
हिन्दी अनुवाद: दिलीप कवठेकर जी
प्रस्तुत गीत गोकुल की एक ग्वालन द्वारा कान्हा के लिये गाया गया है. ये ग्वालन कुरुप है, असुंदर है, इसलिये मन में एक दीन भाव लिये वह कान्हा से पूछ बैठी कि----
तुझे सारा गोकुल याद ही होगा, और याद होगी वह यमुना और वह राधा, मगर हे बंसीधर, क्या तुझे यह कुरूप ग्वालन याद है? जब तुम नदी किनारे रास में रंगे थे, मैं वहीं अंधेरे में खडी हुई थी.. और फ़िर तुम्हारे अनजाने में मैं तुम्हारे अधरों पर मुरली बन गयी थी... क्या तुम्हे ये सभी याद होगा? ऐन दोपहरी में जब ज़मीन तप रही थी, और तुम जमुमा के तट पर थकान मिटाने आ पहुंचे, तब कालिंदी के जल में मिल कर मैने ही तो तुम्हारे चरण धोये थे... कया तुम्हे ये सभी याद होगा ? वह कुरूप ग्वालन याद होगी?
भारत के राष्ट्रगान एवं राष्ट्र गीत की तरह के भारत के कई राज्यों ने कुछ गीतों को राज्य गीत जैसा दर्जा दे रखा है। फिलहाल आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र इन दो राज्यों के राज्य गीत मेरे ध्यान में है और संयोग से मेरे संग्रह में भी है। आज आपको इसकी पहली कड़ी में महाराष्ट्र का गीत सुनवा रहा हूँ यह गीत श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर (shripad krshna kolhatkar) ने लिखा है और संगीतकार शायद पं हृदयनाथ मंगेशकर हैं। इसे गाया है लता जी, ऊषा जी और हृदयनाथ मंगेशकर ने। आईये सुनते हैं।
बहु असोत सुंदर संपन्न की महा
प्रिय अमुचा एक महाराष्ट्र देश हा
गगनभेदि गिरिविण अणु नच जिथे उणे
आकांक्षांपुढति जिथे गगन ठेंगणे
अटकेवरि जेथील तुरंगि जल पिणे
तेथ अडे काय जलाशय नदाविणे पौरुषासि अटक गमे जेथ दु:सहा प्रासाद कशास जेथ हृदयमंदिरे सद्भावांचीच भव्य दिव्य आगरे रत्नां वा मौक्तिकांहि मूल्य मुळी नुरे रमणईची कूस जिथे नृमणिखनि ठरे शुद्ध तिचे शीलहि उजळवि गृहा नग्न खड्ग करि, उघडे बघुनि मावळे चतुरंग चमूचेही शौर्य मावळे दौडत चहुकडुनि जवे स्वार जेथले भासति शतगुणित जरी असति एकले यन्नामा परिसुनि रिपु शमितबल अहा
विक्रम वैराग्य एक जागि नांदती
जरिपटका भगवा झेंडाहि डोलती
धर्म-राजकारण समवेत चालती
शक्तियुक्ति एकवटुनि कार्य साधिती
पसरे यत्कीर्ति अशी विस्मया वहा
गीत मराठ्यांचे श्रवणी मुखी असो
स्फूर्ति दीप्ति धृतिहि जेथ अंतरी ठसो
वचनि लेखनीहि मराठी गिरा दिसो
सतत महाराष्ट्रधर्म मर्म मनि वसो
देह पडो तत्कारणि ही असे स्पृहा