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Sunday, 7 December 2008

फ़िल्म ममता का लता जी आवाज में एक नायाब गीत

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१९६६ की फ़िल्म ममता में संगीतकार रोशन ने बेहतरीन संगीत दिया था | इसी फ़िल्म का एक प्रसिद्ध गीत है "रहे न रहे हम" | इस गीत को रोशन साहब ने सचिन देव बर्मन के गीत "ठंडी हवाएं लहरा के आयें" की धुन पर बर्मन जी की सहमति से रचा था | लेकिन आज जो गीत हम आपके लिए लेकर आए हैं वो विशेष है | कव्वालियों के सरताज रोशन साहब ने "विकल मोरा मनवा" गीत में जितनी सरलता से लोक गीतों के शब्दों को लेकर ताना बाना बुना है वो बस सुनते ही बनता है |




हम गवनवा न जाइवे हो बिना झूलनी,
हम गवनवा न जाइवे हो बिना झूलनी...

अम्बुआ की डारी पड़ रही बुंदिया,
अचरा से उलझे लहरिया,
लहरिया...बिना झूलनी.
हम गवनवा न जाइवे हो बिना झूलनी,

सकल बन गगन पवन चलत पुरवाई री,
माई रुत बसंत आयी फूलन छाई बेलरिया
डार डार अम्बुअन की कोहरिया
रही पुकार और मेघवा बूंदन झर लाई..
सकल बन गगन पवन चलत पुरवाई री

विकल मोरा मनवा, उन बिन हाय,
आरे न सजनवा रुत बीती जाए,
विकल मोरा मनवा, उन बिन हाय,

भोर पवन चली बुझ गए दीपक
चली गयी रैन श्रृंगार की
केस पे विरह की धूप ढली
अरी ऐ री कली अँखियाँ की
पड़ी कुम्हलाई...
विकल मोरा मनवा....

युग से खुले हैं पट नैनन के मेरे
युग से अँधेरा मोरा आंगना
सूरज चमका न चाँद खुला
अरी ऐ री जला रही अपना,
तन मन हाय
विकल मोरा मनवा...

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