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रहस्यवादी कवि सूरदास का साहित्य जगत में बहुत ऊंचा स्थान है। बचपन से हम सूरदास के बारे में पढ़ते आये हैं सो उनके बारे में हम सब जानते ही हैं, सो सीधे सीधे उनके एक भजन दीनन दुख: हरन देव सुनते हैं। यह सुंदर भजन जगजीत सिंह और पी. उन्नी कृष्णन ने गाया है। पहले जगजीत सिंह की आवाज में सुनते हैं।
मैं बरसों से जगजीत सिंह के स्वर में यह भजन सुनता आ रहा था पर आज इस्निप पर खोजने पर पी उन्नीकृष्णन की आवाज में भी यह गीत मिला। कर्नाटक शैली के गायक पी. उन्नीकृष्णन की आवाज में इस भजन को सुन कर एक अलग अनूभूति हुई। आप भी इसे सुनिये और दो अलग अलग शैलियों में इस भजन का आनन्द उठाईये।
दीनन दुख:हरन देव सन्तन हितकारी। अजामील गीध व्याध, इनमें कहो कौन साध। पंछी को पद पढ़ात, गणिका-सी तारी ।।१।। ध्रुव के सिर छत्र देत, प्रहलाद को उबार लेत। भक्त हेत बांध्यो सेत, लंक-पुरी जारी ।।२।। तंदुल देत रीझ जात, साग-पातसों अधात। गिनत नहीं जूठे फल, खाटे मीठे खारी ।।३।। ( यह पद प्रस्तुत रचना में नहीं है) गज को जब ग्राह ग्रस्यो, दु:शासन चीर खस्यो। सभा बीच कृष्ण कृष्ण द्रौपदी पुकारी ।।४।। इतने हरि आये गये, बसनन आरूढ़ भये। सूरदास द्वारे ठाड़ौ आंधरों भिखारी ।।५।। दीनन दुख: हरन देत, संतन हितकारी..
जगजीत- चित्रा की जोड़ी ने भी क्या खूब गज़लें गाई है, ज्यादातर तो आपने सुनी होगी पर कुछ ऐसी भी है जो आजकल कहीं सुनाई नहीं देती।जैसे कि यह..
तारीफ़ उस ख़ुदा की जिसने जहां बनाया, कैसी ज़मीं बनाई क्या आसमां बनाया, मिट्टी से बेलबूटे क्या ख़ुशनुमा उग आये, पहना के सब्ज़ ख़िल्लत, उनको जवां बनाया, सूरज से हमने पाई गर्मी भी रोशनी भी, क्या खूब चश्मा तूने, ए महरबां बनाया, हर चीज़ से है उसकी कारीगरी टपकती, ये कारख़ाना तूने कब रायबां बनाया,
आसपास घटने वाली कुछ घटनायें मन मे अमित प्रभाव छॊड देती हैं । बात है तो बहुत साधारण सी लेकिन एक नन्हें से बालक का प्रशन और उसके पिता का उत्तर शायद बहुतों के लिये सोचने का सबब बन सके । कल दोपहर क्लीनिक मे जब जोहर की अजान का स्वर पास वाली मस्जिद से उभरा तो मेरे सामने बैठे एक नन्हें से बालक ने अपने पिता से पूछा कि यह क्या कह रहे हैं । उसके पिता ने उसको अपनी गोदी मे बैठाते और समझाते हुये कहा कि जैसे हम घर मे पूजा करने के लिये सबको बुलाते हैं वैसे ही यह भी पूजा करने के लिये ही बुला रहे हैं । एक छोटी सी बात मे उस बालक की जिज्ञासा पर विराम सा लग गया । गाड , अल्लाह , ईशवर , भगवान नाम अनेक लेकिन मकसद सिर्फ़ एक । सत्य की खोज । उपासना के ढंग और रास्ते अलग –२ हो सकते हैं , लोगों के मन मे उनकी छवियाँ अलग-२ हो सकती हैं लेकिन सत्य सिर्फ़ एक ।
जगजीत सिंह की गायी और निदा फ़ाजली द्वारा लिखी गयी यह नज्म (दोहे) मुझे बहुत पसन्द है।
मै रोया परदेस मे भीगा माँ का प्यार । दु:ख मे दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार ॥ छोटा कर के देखिये जीवन का विस्तार । आँखो भर आकाश है बाँहों भर संसार ॥ ले के तन के नाप को घूमें बस्ती गाँव । हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव ॥ सब की पूजा एक सी अलग- 2 हर रीति । मस्जिद जाये मौलवी कोयल गाये गीत ॥ पूज़ा घर मे मूर्ति मीरा के संग शयाम । जिसकी जितनी चाकरी उतने उसके दाम ॥ नदिया सींचें खेत को तोता कुतरे आम । सूरज ढेकेदार सा सबको बाँटे काम ॥ साँतों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर । जिस दिन सोये देर तक भूखा रहे फ़कीर ॥ अच्छी संगत बैठ कर संगी बदले रूप । जैसे मिलकर आम से मीठी हो गयी धूप ॥ सपना झरना नींद का जाकी आँखीं प्यास । पाना खोना खोजना साँसों का इतिहास ॥ चाहिये गीता बाँचिये या पढिये कुरान । मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान ॥