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Monday, 10 August 2009

सप्‍त सुरन तीन ग्राम गाओ


भले ही खाँ साहब ने शुद्ध बिलावल सही नहीं गाया हो, भले ही पखावजी का बांया अंगूठा नकली हो,भले ही तबले पर थाप हल्की पड़ी हो.... पर ज़ुईन खां साहब ने जितना भी गाया; बेदाला ही गया .. हमें तो उतना ही मधुर लगा जितना तानसेन ने गाया।

सप्‍त सुरन तीन ग्राम....

सप्‍त सुरन तीन ग्राम गावो सब गुणीजन
इक्कीस मूर्छना तान-बान को मिलावो-२
औढ़व संकीरण सुर सम्पूरण राग भेद
अलंकार भूषण बन-२
राग को सजावो...सप्‍त सुरन

सा सुर साधो मन, रे अपने रब को ध्यान-२
गांधार तजो गुमान-२
मध्यम मोक्ष पावो
पंचम परमेश्‍वर, धैवत धरो ध्यान-२
नी नित दिन प्रभु चरण शीतल आवो

सप्‍त सुरन तीन ग्राम गावो सब गुणीजन
इक्कीस मूर्छना तान-बान को मिलावो
सप्‍त....

Tuesday, 27 May 2008

प्रीत में है जीवन: सहगल साहब का एक और यादगार गीत !!!

मैने पिछ्ली बार महफ़िल में सहगल साहब का गीत "राजा का बेटा" प्रस्तुत था जिसकी आप सभी ने काफ़ी सराहना की । आपकी टिप्पणियाँ हमारे सर माथे पर ।
आज भी मैं सहगल साहब का ही एक गीत आपको सुनवा रहा हूँ । गीत १९३९ की फ़िल्म दुश्मन का है, इस फ़िल्म के संगीतकार श्री पंकज मलिक जी हैं ।

आज सुनने वालों से एक छोटी से पहेली भी पूछता हूँ । आपको बताना है कि ये गीत शास्त्रीय संगीत के किस राग पर आधारित है ।



प्रीत में है जीवन झोकों
कि जैसे कोल्हू में सरसों
प्रीत में है जीवन जोखों

भोर सुहानी चंचल बालक,
लरकाई (लडकाई) दिखलाये,
हाथ से बैठा गढे खिलौने,
पैर से तोडत जाये ।

वो तो है, वो तो है
एक मूरख बालक,
तू तो नहीं नादान,

आप बनाये आप बिगाडे
ये नहीं तेरी शान, ये नहीं तेरी शान

ऐसा क्यों, फ़िर ऐसा क्यों...

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