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भले ही खाँ साहब ने शुद्ध बिलावल सही नहीं गाया हो, भले ही पखावजी का बांया अंगूठा नकली हो,भले ही तबले पर थाप हल्की पड़ी हो.... पर ज़ुईन खां साहब ने जितना भी गाया; बेदाला ही गया .. हमें तो उतना ही मधुर लगा जितना तानसेन ने गाया।
मैने पिछ्ली बार महफ़िल में सहगल साहब का गीत "राजा का बेटा" प्रस्तुत था जिसकी आप सभी ने काफ़ी सराहना की । आपकी टिप्पणियाँ हमारे सर माथे पर । आज भी मैं सहगल साहब का ही एक गीत आपको सुनवा रहा हूँ । गीत १९३९ की फ़िल्म दुश्मन का है, इस फ़िल्म के संगीतकार श्री पंकज मलिक जी हैं ।
आज सुनने वालों से एक छोटी से पहेली भी पूछता हूँ । आपको बताना है कि ये गीत शास्त्रीय संगीत के किस राग पर आधारित है ।
प्रीत में है जीवन झोकों कि जैसे कोल्हू में सरसों प्रीत में है जीवन जोखों
भोर सुहानी चंचल बालक, लरकाई (लडकाई) दिखलाये, हाथ से बैठा गढे खिलौने, पैर से तोडत जाये ।
वो तो है, वो तो है एक मूरख बालक, तू तो नहीं नादान,
आप बनाये आप बिगाडे ये नहीं तेरी शान, ये नहीं तेरी शान